लेकिन सबसे पहले सावधानी जरूरी है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध दावा एक गोपनीय रूसी सैन्य-खुफिया प्रस्ताव पर आधारित रिपोर्टिंग से आता है, किसी आधिकारिक रूप से पुष्टि किए गए और पूरे हो चुके ट्रांसफर से नहीं । मार्च में क्रेमलिन ने ईरान को अटैक ड्रोन भेजने से जुड़ी एक अलग रिपोर्ट का खंडन भी किया था; इससे नई रिपोर्ट अपने आप गलत साबित नहीं होती, लेकिन यह बताता है कि उपलब्ध सबूतों पर अभी विवाद बाकी है ।
रिपोर्टों के अनुसार यह दस पन्नों का प्रस्ताव रूस की सैन्य खुफिया एजेंसी GRU ने ईरान को दिखाने के लिए तैयार किया था । इसमें तीन मुख्य हिस्सों का जिक्र किया गया:
कई रिपोर्टों ने संभावित लक्ष्य-क्षेत्र के रूप में फारस की खाड़ी में अमेरिकी बलों का उल्लेख किया है; कुछ रिपोर्टें अन्य इलाकों में संभावित उपयोग की बात भी करती हैं । एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्ताव में ईरान के तट के पास द्वीपों को दिखाने वाला मानचित्र भी था, जिससे यह साफ होता है कि खाड़ी क्षेत्र इस खतरे की तस्वीर के केंद्र में है ।
सामान्य ड्रोन-रोधी रक्षा में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध यानी जैमिंग बड़ी भूमिका निभाती है। कई सिस्टम ड्रोन के रेडियो कंट्रोल लिंक या नेविगेशन सिग्नल को बाधित करने की कोशिश करते हैं। लेकिन रिपोर्टों के अनुसार ये फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन रेडियो सिग्नल के बजाय एक भौतिक केबल से नियंत्रित होते हैं । इसका मतलब है कि डिफेंडर के पास जैम करने या स्पूफ करने के लिए कम रेडियो संकेत बचते हैं ।
इसका अर्थ यह नहीं कि ऐसे ड्रोन अजेय हैं। लेकिन अमेरिकी बलों के लिए इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग पर भरोसा कम हो जाएगा। ज्यादा जोर लॉन्च टीमों का पता लगाने, अहम ठिकानों को सुरक्षित करने, ड्रोन को भौतिक रूप से रोकने, बलों को फैलाकर तैनात करने और नजदीकी लॉन्च क्षेत्रों से खतरा कम करने पर आ सकता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार ऐसे केबल-नियंत्रित ड्रोन 40 किलोमीटर से अधिक दूरी तक सटीक हमलों में मदद कर सकते हैं । फारस की खाड़ी जैसे सीमित और सैन्य रूप से संवेदनशील इलाके में यह दूरी महत्वपूर्ण है, लेकिन यह फिर भी छोटी दूरी के युद्धक्षेत्र सिस्टम जैसा खतरा है, न कि ऐसा हथियार जो पूरे मध्य पूर्व में हर अमेरिकी ठिकाने को सीधे निशाना बना सके ।
सबसे बड़ा ऑपरेशनल बदलाव यही होगा कि अमेरिकी रक्षा की एक परिचित परत कम भरोसेमंद हो सकती है। अगर ड्रोन का कमांड लिंक फाइबर-ऑप्टिक केबल से चलता है, तो रेडियो कंट्रोल लिंक को बाधित करने वाले जैमर उतने प्रभावी नहीं रहेंगे । इसका मतलब है कि जवाबी रणनीति को पहले से ज्यादा बहु-स्तरीय बनाना होगा—जल्दी पहचान, भौतिक इंटरसेप्शन, हार्डनिंग, बलों का फैलाव और लॉन्च टीमों पर कार्रवाई।
5,000 ड्रोन की रिपोर्टेड संख्या अपने आप में चिंता का कारण है । अगर इतने सिस्टम ईरान तक पहुंचते हैं और ऑपरेशनल हो जाते हैं, तो उनका इस्तेमाल बार-बार टोह लेने, छोटे-छोटे हमलों, बड़े ड्रोन झुंडों या पॉइंट-डिफेंस सिस्टम को थकाने के लिए किया जा सकता है। कम दूरी और सीमित वारहेड वाले ड्रोन भी बड़ी संख्या में आएं, तो डिफेंडर के लिए उन्हें रोकना महंगा और कठिन हो सकता है।
रिपोर्टिंग बार-बार इस कथित पैकेज को फारस की खाड़ी में अमेरिकी बलों से जोड़ती है । चूंकि 5,000 फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन छोटी दूरी के बताए गए हैं, इसलिए सबसे यथार्थवादी खतरा उन अमेरिकी जहाजों, सुविधाओं, उपकरणों और तैनाती पर होगा जो ईरान के नजदीकी लॉन्च क्षेत्रों की सामरिक पहुंच में आते हों ।
इसी पैकेज में बताए गए लंबी दूरी के सैटेलाइट-गाइडेड ड्रोन अलग समस्या होंगे। वे फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन की छोटी दूरी से बाहर के लक्ष्यों के लिए ज्यादा प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक रिपोर्टिंग में यह साफ नहीं है कि ऐसे कितने लंबी दूरी वाले ड्रोन शामिल थे ।
सिर्फ ड्रोन होना काफी नहीं होता। उन्हें लॉन्च करना, गाइड करना, रखरखाव करना और हमलों को समन्वित करना भी उतना ही जरूरी है। इसलिए कथित प्रस्ताव में ऑपरेटर ट्रेनिंग का हिस्सा महत्वपूर्ण है । अलग रिपोर्टिंग में यह भी कहा गया है कि रूस ने ईरान को ड्रोन रणनीति पर अधिक विशिष्ट सलाह दी, जिसमें यूक्रेन युद्ध से लिए गए टारगेटिंग तरीके भी शामिल थे ।
अगर रूस से जुड़े सिस्टम और ट्रेनिंग बाद में अमेरिकी बलों के खिलाफ इस्तेमाल होती है, तो यह सिर्फ सैन्य नहीं, राजनीतिक समस्या भी बनेगी। Times Now ने ऐसी रिपोर्टिंग को मॉस्को-तेहरान सैन्य समन्वय के गहराने से जुड़ी चिंता के रूप में पेश किया, जिसका उद्देश्य अमेरिकी और सहयोगी बलों को निशाना बनाने की ईरान की क्षमता बढ़ाना हो सकता है । ऐसे हालात में वॉशिंगटन को यह तय करना कठिन होगा कि प्रतिक्रिया लॉन्च यूनिट्स पर केंद्रित हो, ईरानी कमांड ढांचे पर, सप्लाई नेटवर्क पर या रूसी समर्थन से जुड़े पहलुओं पर।
रिपोर्टेड 5,000 फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन अपने आप ईरान को अमेरिका जैसा सैन्य प्रतिद्वंद्वी नहीं बना देंगे। वे छोटी दूरी के सिस्टम बताए गए हैं । उन्हें नजदीकी ऑपरेटर, लॉन्च पहुंच, लक्ष्य की जानकारी और प्रशिक्षित क्रू की जरूरत होगी।
इसी तरह, इस रिपोर्टिंग को यह मानकर नहीं पढ़ना चाहिए कि ट्रांसफर पूरा हो चुका है। सार्वजनिक रिकॉर्ड में मुख्य आधार अभी भी एक गोपनीय प्रस्ताव पर आधारित रिपोर्टिंग है, जबकि मॉस्को ने ईरान को ड्रोन भेजने से जुड़ी अलग रिपोर्टों का खंडन किया है । इसलिए समझदारी भरा निष्कर्ष यह है: अगर यह पैकेज वास्तविक और ऑपरेशनल हुआ, तो यह गंभीर सामरिक खतरा होगा; लेकिन इसे अभी पुष्टि की हुई तैनात क्षमता मानना जल्दबाजी होगी।
रूस के कथित प्रस्ताव की अहमियत इस बात में है कि यह आधुनिक ड्रोन-रोधी रक्षा की एक कमजोरी को छूता है: इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग पर निर्भरता। छोटी दूरी के 5,000 फाइबर-ऑप्टिक ड्रोन ईरान को फारस की खाड़ी के आसपास ऐसे नजदीकी हमलों का विकल्प दे सकते हैं जिन्हें जैम करना कठिन हो, और जो अमेरिकी रक्षा प्रणालियों पर संख्या के दबाव से असर डाल सकें । फिर भी सबसे अहम चेतावनी वही है: दावा गोपनीय दस्तावेज़ पर आधारित रिपोर्टिंग से आता है, सार्वजनिक रूप से पुष्टि किए गए डिलीवरी रिकॉर्ड से नहीं ।