चीन की फैक्ट्रियों की ऊर्जा सहनशक्ति को समझने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं कि बिजली कितनी सस्ती है। असली बात यह है कि बिजली कितनी उपलब्ध, कितनी नियंत्रित और वैश्विक ईंधन कीमतों से कितनी बची हुई है। 2021–2023 के वैश्विक ऊर्जा संकट में चीन की कोयला-प्रधान बिजली व्यवस्था ने विनिर्माण क्षेत्र के लिए एक व्यावहारिक “बफर” का काम किया। इसने जोखिम खत्म नहीं किए, लेकिन चीन की फैक्ट्रियों को अंतरराष्ट्रीय प्राकृतिक गैस कीमतों और यूरोप जैसी बिजली मूल्य उछाल से सीधे टकराने से कुछ हद तक बचाया।
2023 में चीन में कोयले से 5,350 टेरावॉट-घंटे (TWh) बिजली पैदा हुई, जो कुल बिजली उत्पादन का 58.2% था।[34] अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी यानी IEA ने भी कहा है कि दुनिया की आधे से अधिक कोयला बिजली चीन में बनती है।[
4] इसका मतलब है कि जब प्राकृतिक गैस, कोयला और बिजली की कीमतें दुनिया भर में ऊपर गईं, तब चीन के विनिर्माण के पीछे अभी भी एक बहुत बड़ा, घरेलू कोयले पर आधारित और मांग के अनुसार चलाया जा सकने वाला बिजली ढांचा मौजूद था।
कोयला बिजली फैक्ट्रियों के लिए बफर कैसे बनी
पहला बफर ईंधन सुरक्षा से आया। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक है और उसका उत्पादन दूसरे सबसे बड़े उत्पादक भारत से लगभग पांच गुना है। चीन सभी जीवाश्म ईंधनों का शुद्ध आयातक है और 2022 में उसने अपने कोयला आपूर्ति का करीब 7% आयात भी किया, फिर भी उसके विशाल घरेलू उत्पादन से समझ आता है कि कोयला वहां की ऊर्जा व्यवस्था के केंद्र में क्यों है।[32]
यह उन बाजारों से अलग स्थिति है जो आयातित प्राकृतिक गैस पर अधिक निर्भर हैं, या जहां गैस से चलने वाले बिजली संयंत्र बिजली की सीमांत कीमतों को ज्यादा प्रभावित करते हैं। IEA की 2023 की बिजली बाजार रिपोर्ट के अनुसार, कोविड के बाद आर्थिक सुधार के दौर में दुनिया रिकॉर्ड ऊर्जा कीमतों से जूझी; प्राकृतिक गैस और कोयले जैसी ऊर्जा वस्तुओं की कीमतें तेज बढ़ीं, जिससे बिजली उत्पादन लागत बढ़ी और महंगाई को बल मिला।[12] ऐसे माहौल में घरेलू कोयले की बड़ी हिस्सेदारी वाला बिजली तंत्र अंतरराष्ट्रीय गैस कीमतों का औद्योगिक बिजली लागत पर सीधा असर कुछ कम कर सकता है।
दूसरा बफर कोयला बिजली की “डिस्पैचेबल” प्रकृति है—यानी जरूरत पड़ने पर इसे चलाकर बिजली आपूर्ति बढ़ाई जा सकती है। जब जलविद्युत उत्पादन कमजोर हो, मांग चरम पर हो या ग्रिड पर दबाव हो, कोयला बिजली खाली जगह भर सकती है। IEA की Electricity 2024 रिपोर्ट बताती है कि 2023 में भारत और चीन में सूखे ने जलविद्युत उत्पादन घटाया, जिसके बाद कोयला बिजली उत्पादन बढ़ा और इसने अमेरिका तथा यूरोपीय संघ में कोयला बिजली की गिरावट के असर को पीछे छोड़ दिया।[4]
फैक्ट्रियों के लिए ऊर्जा लचीलापन सिर्फ “बिजली की कम कीमत” नहीं है। यह लगातार उत्पादन, समय पर डिलीवरी और उत्पादन लाइन की स्थिरता का सवाल भी है। चीन का औद्योगिक क्षेत्र देश की कुल ऊर्जा खपत का लगभग दो-तिहाई हिस्सा लेता है। 2019 में विनिर्माण क्षेत्र अकेले चीन की कुल ऊर्जा खपत का करीब 55% था, और विनिर्माण क्षेत्र की 59.6% ऊर्जा कोयले से आती थी।[46] इसलिए कोयला बिजली की स्थिरता स्टील, रसायन, निर्माण सामग्री, मशीनरी और अन्य ऊर्जा-गहन क्षेत्रों की लागत और आपूर्ति समय-सारिणी को सीधे प्रभावित करती है।
यूरोप से फर्क: गैस कीमतें ज्यादा सीधे उद्योग तक पहुंचीं
यूरोप की समस्या यह थी कि ऊर्जा संकट में प्राकृतिक गैस की कीमतों ने बिजली कीमतों और औद्योगिक लागत को ज्यादा सीधे प्रभावित किया। यूरोपीय संघ की ऊर्जा कीमतों और लागतों पर रिपोर्ट कहती है कि 2021–2022 के ऊर्जा संकट ने वैश्विक और यूरोपीय ऊर्जा बाजारों को व्यापक रूप से बाधित किया; ऊंची गैस कीमतों ने यूरोपीय संघ की थोक बिजली कीमतों को ऊपर धकेला।[17]
2023 तक यूरोप की बिजली कीमतें अपने शिखर से नीचे आ गई थीं, लेकिन वे संकट-पूर्व स्थिति में पूरी तरह नहीं लौटीं। यूरोपीय बिजली बाजार रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में European Power Benchmark औसतन 95 यूरो प्रति MWh रहा, जो 2022 के ऐतिहासिक उच्च स्तर से 57% कम था।[18] फिर भी यूरोपीय संघ की एक अन्य रिपोर्ट ने कहा कि थोक कीमतों की गिरावट खुदरा कीमतों तक पूरी तरह नहीं पहुंची; घरों और उद्यमों के लिए ऊर्जा कीमतें 2021 से पहले के स्तर से ऊपर रहीं। औद्योगिक गैस और बिजली कीमतें संकट के चरम से कम जरूर हुईं, लेकिन यूरोपीय संघ के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों की तुलना में अब भी 2–4 गुना अधिक थीं।[
17]
यहीं चीन की सापेक्ष मजबूती दिखती है। इसका मतलब यह नहीं कि चीन में हर औद्योगिक वस्तु हमेशा सस्ती बनी। बात यह है कि लागत में झटका तुलनात्मक रूप से कम था और डिलीवरी की निश्चितता अधिक रही। Jacques Delors Centre ने भी कहा कि 2023 में यूरोपीय संघ और अमेरिका-चीन के बीच बड़े औद्योगिक उपभोक्ताओं की बिजली लागत का अंतर काफी बढ़ गया, हालांकि यूरोप में कीमत समर्थन उपायों ने उसे कुछ हद तक दबाए रखा।[22]
जापान और दक्षिण कोरिया से तुलना: फायदा ईंधन सुरक्षा का है, हर हाल में सस्ती बिजली का नहीं
जापान और दक्षिण कोरिया से तुलना करते समय सावधानी जरूरी है। उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि चीन की औद्योगिक बिजली हर समय, हर उद्योग में जापान और दक्षिण कोरिया से सस्ती रही। लेकिन यह साफ है कि चीन के पास घरेलू कोयले का वह पैमाना है जिसे जापान और दक्षिण कोरिया आसानी से नहीं दोहरा सकते।[32]
जापान ऊर्जा संकट के दौरान आयातित ईंधन कीमतों के झटके से प्रभावित हुआ। सांख्यिकीय समीक्षा के अनुसार, 2022 में जापान का CIF कोयला स्पॉट मूल्य—यानी लागत, बीमा और मालभाड़ा सहित आयात मूल्य—औसतन 225 डॉलर प्रति टन रहा, जो 2021 से 45% अधिक था।[3] दक्षिण कोरिया की चुनौती अलग लेकिन संबंधित है: उसे कोयला संक्रमण और विश्वसनीय, वहनीय बिजली आपूर्ति के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। OECD की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण कोरिया में कोयला बिजली उत्पादन 2018 के 240 TWh से घटकर 2021 में 200 TWh रह गया; बिजली मिश्रण में इसकी हिस्सेदारी 42% से घटकर 34% हो गई।[
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इसलिए चीन की जापान और दक्षिण कोरिया पर बढ़त को “कोयला बिजली हमेशा सस्ती है” के रूप में नहीं पढ़ना चाहिए। बेहतर व्याख्या यह है कि चीन के पास घरेलू कोयला और कोयला बिजली का मोटा सुरक्षा कुशन है। जब अंतरराष्ट्रीय LNG और कोयला कीमतों में उतार-चढ़ाव बढ़ता है, तो यह कुशन बाहरी झटकों को विनिर्माण लागत तक पहुंचने की गति और तीव्रता कुछ कम कर सकता है।[3][
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यह मजबूती मुफ्त में नहीं आती
कोयला बिजली का बफर साफ कीमत लेकर आता है।
पहला, चीन खुद कोयला कीमतों और आपूर्ति बाधाओं से मुक्त नहीं है। 2021 में कोयला आपूर्ति मांग के साथ कदम नहीं मिला सकी; आपूर्ति श्रृंखला की दिक्कतों और प्रतिकूल मौसम के कारण बिजली कटौती और फैक्ट्रियों के बंद होने जैसी स्थितियां बनीं।[44] वैश्विक कोयला कीमतें भी ऊर्जा संकट में खूब बढ़ीं: 2022 में यूरोपीय कोयला कीमत औसतन 294 डॉलर प्रति टन और जापान CIF कोयला कीमत 225 डॉलर प्रति टन रही, जो 2021 से क्रमशः 145% और 45% अधिक थीं।[
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दूसरा, कोयला बिजली का कार्बन दबाव दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धा जोखिम बन सकता है। IEA की कोयला संक्रमण रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में वैश्विक कोयला मांग बढ़ती रही और सबसे बड़ा इजाफा चीन से आया। 2019 के बाद मुख्य रूप से बिजली उत्पादन के लिए कोयले के बढ़ते उपयोग ने वैश्विक CO2 उत्सर्जन में वृद्धि का लगभग पूरा हिस्सा समझाया।[11] Climate Action Tracker भी चीन की जीवाश्म ईंधन, खासकर कोयले पर निर्भरता को वैश्विक उत्सर्जन को प्रभावित करने वाला अहम कारक मानता है।[
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तीसरा, कोयला बिजली अल्प और मध्यम अवधि की स्थिरता का जवाब है; यह भविष्य की प्रतिस्पर्धा का अंतिम जवाब नहीं है। चीन में निम्न-कार्बन बिजली तेजी से बढ़ रही है। Ember के अनुसार, 2024 में चीन की 38% बिजली निम्न-कार्बन स्रोतों से आई; पवन और सौर मिलकर 18% पर पहुंचे, और चीन ने वैश्विक पवन तथा सौर बिजली उत्पादन वृद्धि के आधे से अधिक हिस्से में योगदान दिया।[40]
निष्कर्ष: कोयला बिजली बफर है, अंतिम जीत नहीं
ऊर्जा संकट के दौरान चीन की कोयला बिजली व्यवस्था ने “लागत बफर” और “बिजली आपूर्ति बीमा” जैसा काम किया। विशाल घरेलू कोयला उत्पादन और मांग के अनुसार चलाई जा सकने वाली कोयला बिजली ने चीन के विनिर्माण को अंतरराष्ट्रीय गैस कीमतों और यूरोप जैसी बिजली कीमत उछाल से सीधे प्रभावित होने से कुछ हद तक बचाया।
यूरोप की तुलना में यह फायदा मुख्यतः ऊंची गैस कीमतों से कम प्रभावित होने में दिखा। जापान और दक्षिण कोरिया की तुलना में यह फायदा घरेलू ईंधन सुरक्षा की मोटी परत में दिखता है। लेकिन कोयला कीमतों की अस्थिरता, बिजली आपूर्ति प्रबंधन की चुनौतियां और ऊंचे कार्बन उत्सर्जन इस मजबूती को कमजोर भी कर सकते हैं। चीन के लिए अगली परीक्षा यह है कि क्या वह कम-कार्बन बिजली, अधिक लचीले ग्रिड और ऊर्जा भंडारण के जरिए कोयला बिजली जैसी स्थिरता दोहरा पाएगा—बिना लंबे समय तक कोयले पर निर्भर रहे।




