बाजार की सोच आम तौर पर कुछ इस तरह काम करती है:
यानी यह सिर्फ एक महीने की फैक्टरी रिपोर्ट नहीं थी। बाजार ने इसे इस बड़े सवाल से जोड़ा कि क्या यूरोजोन अर्थव्यवस्था में इतना दम है कि यूरो को दूसरी मुद्राओं के मुकाबले आकर्षक बनाए रख सके।
इस चाल में पाउंड बिल्कुल निष्क्रिय नहीं था। उसी बाजार कवरेज में बैंक ऑफ इंग्लैंड के गवर्नर एंड्रयू बेली की चेतावनी का जिक्र था कि अगर मध्य पूर्व संघर्ष से जुड़े ऊर्जा-मूल्य झटके महंगाई को आगे बढ़ाते रहे, तो “forceful tightening” यानी और कड़ी मौद्रिक सख्ती की जरूरत पड़ सकती है । यह कोई नई दर-घोषणा नहीं थी, लेकिन इसने UK की महंगाई जोखिम और सख्त नीति की संभावना को बाजार की नजर में बनाए रखा।
यही सापेक्ष तस्वीर EUR/GBP की गिरावट समझाती है। अगर यूरोजोन की वृद्धि कमजोर दिखे और UK की तरफ महंगाई-सतर्क नीति का जोखिम बना रहे, तो ट्रेडरों के पास पाउंड के मुकाबले यूरो खरीदने की वजह कम हो जाती है।
कमजोर जर्मन औद्योगिक उत्पादन का मतलब हमेशा यह नहीं कि EUR/GBP गिरना ही है। एक अन्य रिपोर्ट में कमजोर जर्मन उत्पादन के बावजूद EUR/GBP करीब 0.8710 के पास हल्की बढ़त में दिखा, क्योंकि बैंक ऑफ इंग्लैंड की दर-वृद्धि संबंधी उम्मीदें ठंडी पड़ गई थीं और ट्रेडर सेंटिमेंट रीसेट हुआ था ।
यही सबसे जरूरी सावधानी है। EUR/GBP सिर्फ “जर्मनी ट्रेड” नहीं है; यह यूरो बनाम पाउंड का सौदा है। इसलिए अंतिम दिशा दोनों तरफ की खबरों पर निर्भर करती है: जर्मनी और यूरोजोन की वृद्धि, ECB की नीति उम्मीदें, UK की महंगाई, और बैंक ऑफ इंग्लैंड की दरों को लेकर बाजार की कीमतें।
इस बार यूरो पाउंड के मुकाबले इसलिए गिरा क्योंकि जर्मन औद्योगिक उत्पादन की कमजोरी ने यूरोजोन की वृद्धि और ECB नीति-समर्थन की तस्वीर को कमजोर किया, जबकि पाउंड को बैंक ऑफ इंग्लैंड की महंगाई-सतर्क भाषा से तुलनात्मक सहारा मिला । असली सबक यह नहीं कि “जर्मनी का खराब डेटा आते ही EUR/GBP हमेशा गिरता है।” असली बात यह है कि कमजोर जर्मन डेटा यूरो पर तब ज्यादा दबाव डालता है, जब पाउंड के पक्ष में नीति या बाजार भावना का आधार अपेक्षाकृत मजबूत हो।