रूस के इनकार की मूल वजह कूटनीति के क्रम को लेकर मतभेद था। यूक्रेन और उसके समर्थकों का कहना था कि सार्थक शांति वार्ता शुरू होने से पहले पूर्ण, तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम होना चाहिए। रूस का रुख था कि बातचीत चलने के दौरान वह सैन्य अभियान स्थगित नहीं करेगा।
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मॉस्को ने पहले युद्धविराम, फिर वार्ता वाला रास्ता नहीं माना
23 सितंबर को यूक्रेन पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक में विदेश मंत्री आंद्री सिबीहा ने कहा कि कीव पूर्ण, तत्काल और बिना शर्त युद्धविराम पर सहमत है। उन्होंने मॉस्को से भी ऐसा करने और उसके बाद ठोस शांति वार्ता में आने की अपील की। संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य देशों के साझा बयान ने भी रूस से यही कदम उठाने को कहा।
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रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस आधार को ही खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वार्ता का प्रारूप चाहे जो हो, रूस बातचीत की अवधि में अपना “विशेष सैन्य अभियान” नहीं रोकेगा। लावरोव ने यह भी आरोप लगाया कि यूरोप युद्धविराम के जरिये यूक्रेन को अपनी सैन्य क्षमता फिर से जुटाने का समय देना चाहता है।
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यानी मॉस्को बातचीत की पूर्वशर्त के रूप में युद्धविराम स्वीकार नहीं कर रहा था। विवाद सिर्फ यह नहीं था कि वार्ता होनी चाहिए या नहीं, बल्कि यह था कि क्या वार्ता के दौरान लड़ाई रोकी जाए।
परिषद का समर्थन क्या था और क्या नहीं था
रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा परिषद के 15 में से 14 सदस्यों ने युद्धविराम का समर्थन किया; यूक्रेन, यूरोपीय संघ और 50 से अधिक देश भी इस अपील के साथ थे।
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लेकिन यह संख्या उस बैठक में यूक्रेन युद्धविराम पर किसी सुरक्षा परिषद प्रस्ताव के मतदान का नतीजा नहीं थी। ऐसा कोई प्रस्ताव मतदान के लिए पेश ही नहीं किया गया था। इसलिए यह समर्थन रूस पर कूटनीतिक दबाव और उसके अलग-थलग पड़ने का संकेत था, न कि परिषद का बाध्यकारी फैसला।
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सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य के तौर पर रूस की स्थिति किसी भी ऐसे ठोस प्रस्ताव के रास्ते में बड़ी बाधा है जिसका वह विरोध करे: स्थायी सदस्य का नकारात्मक वोट प्रस्ताव को पारित होने से रोक सकता है। इसलिए बाकी सदस्यों का समर्थन अपने-आप रूस को युद्धविराम मानने के लिए मजबूर नहीं कर सकता।
ऊर्जा ढांचे का मुद्दा इतना अहम क्यों था
युद्धविराम की यह बहस सर्दियों से पहले ऊर्जा-संबंधी ढांचे पर हमलों के जोखिम के बीच हुई। संयुक्त राष्ट्र पहले चेतावनी दे चुका था कि यूक्रेन के नागरिक ऊर्जा ढांचे पर हमलों से कड़ाके की ठंड में लाखों लोग लंबे समय तक बिजली, हीटिंग और पानी से वंचित रहे।
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राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने एक सीमित, पारस्परिक व्यवस्था सुझाई: यदि रूस यूक्रेन की ऊर्जा व्यवस्था, महत्वपूर्ण ढांचे और खाद्य निर्यात को निशाना बनाना बंद करे, तो यूक्रेन रूसी रिफाइनरियों और ऊर्जा सुविधाओं पर हमले रोकेगा।
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यह प्रस्ताव लागू समझौते के रूप में पेश नहीं किया गया था। रॉयटर्स के अनुसार, यूक्रेन और उसके सहयोगी सर्दियों से पहले ऊर्जा ढांचे और काला सागर नौवहन पर सीमित सहमतियां चाहते थे, जबकि रूस व्यापक शांति वार्ता में बहुत कम दिलचस्पी दिखा रहा था।
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ज़ेलेंस्की ने चेतावनी दी कि ऊर्जा हमलों पर संघर्षविराम न हुआ तो यूक्रेन जवाबी कार्रवाई करेगा और आने वाली सर्दी रूस के लिए “बहुत पीड़ादायक” हो सकती है।
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नागरिकों के लिए जोखिम तत्काल था
दांव केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं थे। संयुक्त राष्ट्र में चर्चा वाले दिन की रिपोर्टिंग में कीव पर रूसी हमले में कम-से-कम दो लोगों की मौत और 22 के घायल होने की बात कही गई। उधर, रूसी ऊर्जा सुविधाओं पर यूक्रेनी हमलों से भी नागरिकों और ढांचे को नुकसान पहुंचने का जोखिम बढ़ा था।
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उपलब्ध रिपोर्टिंग से सुरक्षा परिषद की बैठक या उसके तत्काल संदर्भ से विशेष रूप से जुड़े नागरिक हताहतों का एकल, निर्णायक कुल आंकड़ा स्थापित नहीं होता। लेकिन सर्दियों के करीब आने के साथ बिजली, पानी और हीटिंग की व्यवस्था गंभीर मानवीय चिंता का केंद्र बन चुकी थी।
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निष्कर्ष
बैठक ने दोनों पक्षों के रुख में साफ अंतर दिखाया: यूक्रेन ने पहले पूर्ण युद्धविराम और फिर वार्ता का समर्थन किया, जबकि रूस ने कहा कि वार्ता के लिए सैन्य अभियान रोकना जरूरी नहीं है।
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इसीलिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन तुरंत लड़ाई रुकने में नहीं बदल सका। सुरक्षा परिषद कूटनीतिक दबाव बढ़ा सकती थी, लेकिन रूस की सहमति के बिना—या ऐसा बाध्यकारी कदम जिसे रूस रोक न सके—युद्धविराम की अपील राजनीतिक मांग ही रही, लागू होने वाला परिणाम नहीं।