वोट: आधिकारिक प्रेस कॉन्फ्रेंस ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार फैसला 9–3 रहा । कुछ समाचार रिपोर्टों में 10–3 का आंकड़ा आया, लेकिन चेयरमैन Kevin Warsh की आधिकारिक ट्रांसक्रिप्ट 9–3 वोट की पुष्टि करती है ।
इन तीन क्षेत्रीय फेड अध्यक्षों ने दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का समर्थन किया:
इनका रुख इस बात का संकेत है कि पांच वर्षों से लक्ष्य से ऊपर चल रही महंगाई को लेकर फेड के भीतर कार्रवाई का दबाव बढ़ रहा है ।
फेड की जुलाई 2026 की Monetary Policy Report में महंगाई बढ़ाने वाले कई कारकों का उल्लेख किया गया। इनमें शामिल हैं:
जून की FOMC बैठक के मिनट्स में भी अधिकारियों ने मध्य-पूर्व संघर्ष से जुड़ी ऊर्जा और इनपुट लागतों तथा AI क्षेत्र में बढ़ती मांग को ऊंची महंगाई के कारणों में गिना था ।
29 जुलाई की प्रेस कॉन्फ्रेंस में फेड चेयर Kevin Warsh ने कहा कि महंगाई अब भी समिति के 2% लक्ष्य से ऊपर है। उन्होंने यह भी कहा कि समिति दृढ़ है और वह मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करेगी ।
14 जुलाई को अमेरिकी कांग्रेस में दिए गए बयान में Warsh ने कहा था: “फेड का नंबर एक उद्देश्य मौद्रिक नीति को सही रखना है… और अगर हम नीति सही रखेंगे—और रखेंगे—तो पिछले पांच वर्षों की महंगाई की लहर अतीत की बात हो जाएगी” ।
Warsh के नेतृत्व में फेड ने आगे की दरों पर स्पष्ट संकेत देने से बचने वाली “नो-गाइडेंस” नीति अपनाई है। इससे बाजारों के लिए फेड की अगली चाल का अनुमान लगाना कठिन बना हुआ है । दर बढ़ाने के बजाय दर स्थिर रखने के फैसले ने यह सवाल और तेज कर दिया है कि Warsh महंगाई को 2% तक वापस लाने की अपनी प्रतिबद्धता कैसे पूरा करेंगे ।
फैसला: बैंक ऑफ इंग्लैंड की Monetary Policy Committee (MPC) ने Bank Rate को 3.75% पर स्थिर रखा ।
वोट: फैसला 6–3 रहा ।
इन तीन सदस्यों ने Bank Rate को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 4% करने का समर्थन किया:
जून की बैठक में केवल Greene और Pill ने बढ़ोतरी के पक्ष में मतदान किया था। जुलाई में Mann भी उनके साथ शामिल हो गईं। उनके रुख में अमेरिका और ईरान के बीच फिर शुरू हुए संघर्ष का प्रभाव प्रमुख था ।
बैंक ऑफ इंग्लैंड ने कहा कि अगर अमेरिका-ईरान युद्ध बढ़ता है, तो वह ब्याज दरें बढ़ाने के लिए तैयार है । गवर्नर Andrew Bailey ने चेतावनी दी कि ऊंची और अस्थिर ऊर्जा कीमतें इस साल के अंत में महंगाई को फिर बढ़ा सकती हैं ।
बैंक मध्य-पूर्व संकट से पैदा होने वाले दूसरे दौर के महंगाई प्रभावों पर भी नजर रख रहा है। इसका अर्थ है कि ऊर्जा लागत का शुरुआती असर बाद में मजदूरी, परिवहन और अन्य वस्तुओं-सेवाओं की कीमतों में फैल सकता है ।
वोट में बढ़ोतरी समर्थक सदस्यों की संख्या बढ़ने के बावजूद गवर्नर Andrew Bailey ने संकेत दिया कि बैंक तत्काल दर बढ़ाने की दिशा में नहीं बढ़ रहा। उन्होंने कहा:
“कृपया इस कमरे से यह सोचकर न जाएं कि बैंक ऑफ इंग्लैंड दर बढ़ाने की ओर बढ़ रहा है। स्पष्ट रूप से, मैंने या समिति के किसी सदस्य ने ऐसी कोई बात नहीं कही है जिससे यह निष्कर्ष निकले।”
Bailey ने दर स्थिर रखने को “एक समझदारी भरा फैसला” बताया और ऊंची दरों की ओर बढ़ने की अटकलों को खारिज किया । बैंक के पूर्वानुमानों में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था के लगभग ठहर जाने की आशंका भी जताई गई थी ।
बाजार ने भी Bailey के बयान को अपेक्षाकृत नरम माना। उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सितंबर की बैठक में BoE की दर बढ़ाने की संभावना को कारोबारियों ने करीब 35% आंका ।
फैसला: बैंक ऑफ जापान (BOJ) ने अपनी अल्पकालिक नीति दर 1.0% पर बनाए रखी । यह दर सितंबर 1995 के बाद जापान में सबसे ऊंचे स्तर पर है। इससे पहले जून में BOJ ने दर में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की थी ।
वोट: फैसला 8–1 रहा ।
BOJ बोर्ड के सदस्य Hajime Takata ने असहमति जताते हुए दर को 25 बेसिस पॉइंट बढ़ाकर 1.25% करने का समर्थन किया ।
BOJ ने चेतावनी दी कि अंतर्निहित महंगाई 2% के लक्ष्य से ऊपर जा सकती है । बोर्ड ने यह भी दोहराया कि यदि महंगाई के जोखिम बढ़ते हैं, तो वह उधारी की लागत को और बढ़ाने के लिए तैयार है ।
हालांकि BOJ ने वित्तीय वर्ष 2026 के लिए अपनी कोर महंगाई का अनुमान 2.8% से घटाकर 2.5% कर दिया। इससे पता चलता है कि केंद्रीय बैंक को निकट अवधि में कीमतों के दबाव में कुछ नरमी की उम्मीद है। फिर भी उसका समग्र रुख दरों को आगे बढ़ाने की संभावना खुली रखने वाला रहा ।
BOJ ने वैश्विक AI मांग और विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रभावों पर भी नजर रखने की बात कही । उसने चालू वित्तीय वर्ष के आर्थिक विकास का अनुमान थोड़ा बढ़ाकर 0.6% कर दिया ।
इसी वजह से विश्लेषकों ने BOJ के फैसले को ‘हॉकिश होल्ड’ कहा—यानी दर अभी स्थिर है, लेकिन आगे बढ़ोतरी का रास्ता बंद नहीं किया गया है।
कुल मिलाकर, 29–31 जुलाई 2026 का यह सप्ताह वैश्विक मौद्रिक नीति के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत लेकर आया। दरें भले ही स्थिर रहीं, लेकिन केंद्रीय बैंकों के भीतर बढ़ती असहमति ने साफ कर दिया कि महंगाई, ऊर्जा झटकों और नई तकनीकी मांग को लेकर नीति-निर्माता अभी पूरी तरह निश्चिंत नहीं हैं।