यह चाल सबसे पहले Reddit के r/Android सबरेडिट पर एक यूज़र ने उजागर की। उसने देखा कि उसका Motorola Razr 60 Ultra, Amazon ऐप खोलने पर किसी अजीब से URL को दिखाने से पहले devicenative.com को रिक्वेस्ट भेज रहा है। इसके तुरंत बाद, 9to5Google ने 25 मई 2026 को वीडियो एविडेंस के साथ इस खबर की पुष्टि करते हुए एक रिपोर्ट पब्लिश की।
आगे की जांच में पता चला कि इस्तेमाल किया गया एफिलिएट कोड, एक असली फैशन इन्फ्लुएंसर से संबंधित था, जिसका इस पूरी प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं था। किसी और ने उनके कोड का इस्तेमाल बिना अनुमति के किया। यह व्यवहार सिर्फ तब होता था जब Amazon ऐप को 'ऐप ड्रॉवर' से खोला जाता था, न कि होम स्क्रीन से। पुराने Motorola सॉफ्टवेयर वर्जन पर ऐसा कुछ नहीं होता था।
9to5Google की रिपोर्ट के बाद Motorola ने इस व्यवहार की पुष्टि की और कहा कि उसने "इस व्यवहार को तुरंत रोक दिया है"। इसके बाद 27 मई को एक स्टेटमेंट में कंपनी ने पूरे एपिसोड को "अनजाने में हुआ" (unintended) करार दिया और कहा कि एक अपडेट से इस समस्या का समाधान कर दिया गया है।
हालांकि, Motorola के 'अनजाने में हुई गलती' वाले बयान पर व्यापक संदेह जताया गया। तकनीकी विशेषज्ञों और यूज़र्स का तर्क था कि ऐप लॉन्च को इंटरसेप्ट करने और उन्हें एक एफिलिएट URL से रीडायरेक्ट करने के लिए, स्मार्ट फीड को जानबूझकर प्रोग्राम किया गया होगा—नेटवर्क ट्रैफिक की निगरानी करने और शॉपिंग ऐप खुलने पर पहचानने जैसी जटिल कार्यक्षमता 'गलती से' नहीं आ सकती।
यह मामला अचानक सामने नहीं आया। पिछले कुछ वर्षों से Motorola के सॉफ्टवेयर प्रैक्टिसेस पर लगातार उठती आवाज़ों के लिए यह आखिरी और शायद सबसे बड़ा झटका है।
Motorola पर बहुत ज्यादा प्री-इंस्टॉल्ड ऐप और ऐसे 'ऐप फोल्डर' डालने का आरोप लगता रहा है जो असल में फोल्डर होने के बजाय सुझाए गए ऐप को ऑटो-डाउनलोड करने वाले हब होते हैं। Shopping, Entertainment और GamesHub जैसे ऐप इसके प्रमुख उदाहरण हैं। जहां प्रतिस्पर्धी कंपनियों ने यूज़र्स की नाराजगी के बाद ब्लोटवेयर कम किया, वहीं आलोचकों का कहना है कि Motorola ने इस मामले में उल्टी दिशा पकड़ ली और 2025 व 2026 में भी अपने आप ब्लोटवेयर इंस्टॉल होने की शिकायतें आती रहीं।
Smart Feed का मामला एक बड़े पैटर्न का हिस्सा लगता है, जिसमें यूज़र्स सालों से शिकायत कर रहे हैं कि Motorola के सिस्टम ऐप 'बार-बार सवाल पूछते हैं और बिना पूछे कुछ भी इंस्टॉल कर देते हैं।' माना जाता है कि यह सब हार्डवेयर की बिक्री से इतर, यूज़र बेस से कमाई करने की कोशिश है। MotoApps इस तरह की शिकायतों का बार-बार केंद्र रहा है।
यह एफिलिएट कोड इंजेक्शन की घटना इसलिए ज्यादा गंभीर मानी जा रही है क्योंकि यह एक प्री-इंस्टॉल्ड, न हटाए जा सकने वाले सिस्टम ऐप ने किया, और वह भी पूरी तरह से गुप्त तरीके से। बिना सहमति के ऐप लॉन्च की निगरानी करने और एफिलिएट कोड डालने की इस हरकत की तुलना प्रसिद्ध Honey ब्राउज़र एक्सटेंशन घोटाले से की जा रही है। इसने इस बहस को भी तेज कर दिया है कि क्या एंड्रॉयड निर्माताओं को अपने डिवाइस में नेटवर्क-मॉनिटरिंग की क्षमता वाले प्री-इंस्टॉल्ड ऐप देने की आजादी बिल्कुल नहीं मिलनी चाहिए। बहुत से लोगों का मानना है कि यह वाकया दिखाता है कि 'क्लीन एंड्रॉयड' का वादा तब तक कमजोर रहेगा, जब तक कंपनियों को यूज़र्स को कमाई का जरिया समझने का वित्तीय प्रोत्साहन मिलता रहेगा।
Comments
0 comments