HDO के संकेत से टीम ने ग्रह के जल में ड्यूटेरियम-से-हाइड्रोजन (D/H) अनुपात का अनुमान लगाया। प्राप्त मान 4.0^{+1.3}_{-1.1} × 10⁻³ था ।
यह अनुपात बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण जैसे सौरमंडल के गैस दानवों में मापे गए अनुपातों से काफी अधिक है। साथ ही, यह कुछ प्रोटोस्टेलर—यानी तारों के निर्माण वाले—क्षेत्रों और सौरमंडल के अंदरूनी पिंडों में देखे गए D/H मानों की संख्यात्मक सीमा से मेल खाता है ।
D/H अनुपात किसी ग्रह के जल का एक तरह का रासायनिक रिकॉर्ड हो सकता है। अलग-अलग परिस्थितियों में हल्का हाइड्रोजन और भारी ड्यूटेरियम अलग तरह से व्यवहार करते हैं। इसलिए इस अनुपात से ग्रह के निर्माण और वायुमंडलीय इतिहास के बारे में सुराग मिल सकते हैं।
शोधपत्र में WASP-39b के वायुमंडल में ड्यूटेरियम की अधिक मात्रा समझाने के लिए दो प्रमुख संभावनाएं बताई गई हैं :
संभव है कि WASP-39b अपने तारे से बहुत दूर, प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क के उस हिस्से में बना हो जिसे स्नो लाइन कहा जाता है। इस सीमा के बाहर तापमान इतना कम होता है कि पानी बर्फ के रूप में संघनित हो सकता है।
ऐसे ठंडे क्षेत्रों में ड्यूटेरियम-समृद्ध बर्फ ग्रह के निर्माण-सामग्री में शामिल हो सकती है। बाद में ग्रह अपने तारे के नजदीक आ गया हो, लेकिन अपने शुरुआती निर्माण-क्षेत्र का यह समस्थानिक संकेत अब भी उसके वायुमंडल में मौजूद हो ।
दूसरी संभावना यह है कि ड्यूटेरियम की अधिकता ग्रह के वायुमंडल में लंबे समय तक चलने वाली प्रक्रियाओं का परिणाम हो। ऊपरी वायुमंडल में प्रकाश-रासायनिक प्रतिक्रियाएं, गैसों का ऊपर-नीचे मिश्रण और हल्के हाइड्रोजन का अंतरिक्ष में अपेक्षाकृत आसानी से निकल जाना—इन सबके कारण बचा हुआ वायुमंडल ड्यूटेरियम से समृद्ध हो सकता है ।
फिलहाल उपलब्ध निष्कर्ष इन दोनों संभावनाओं में से किसी एक को निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं करते। आगे के मॉडल और अवलोकन यह स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं कि इस ग्रह की असामान्य जल-संरचना का प्रमुख कारण कौन-सा है।
WASP-39b एक अत्यंत गर्म गैसीय ग्रह है, इसलिए ज्ञात मानकों के अनुसार यह रहने योग्य नहीं है । वहां HDO की पहचान को जीवन का संकेत समझना सही नहीं होगा। इस खोज का महत्व इस बात में है कि JWST ने ग्रह के जल में मौजूद एक सूक्ष्म समस्थानिक अंतर को मापने की क्षमता दिखाई है।
भविष्य में यही तरीका किसी छोटे, चट्टानी और समशीतोष्ण एक्सोप्लैनेट पर लागू किया जा सकता है। तब खगोलविद यह जानने की कोशिश कर सकते हैं कि:
पृथ्वी पर भी समुद्री जल का D/H अनुपात हमारे जल की उत्पत्ति समझने में उपयोगी है। इससे यह जांचने में मदद मिलती है कि पृथ्वी का जल किस प्रकार के स्रोतों—जैसे क्षुद्रग्रहों या धूमकेतुओं—से आया हो सकता है ।
किसी दूरस्थ चट्टानी ग्रह पर D/H अनुपात मापना वैज्ञानिकों को यह आकलन करने में मदद कर सकता है कि वहां कभी सतह पर तरल जल टिक सकता था या नहीं। यह रहने योग्य परिस्थितियों और जीवन की संभावनाओं की जांच में एक महत्वपूर्ण सुराग होगा—हालांकि अकेले HDO या D/H अनुपात से जीवन की पुष्टि नहीं की जा सकती।
इस लिहाज से WASP-39b पर अर्ध-भारी जल की पहचान एक महत्वपूर्ण प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट है: JWST ने दिखाया है कि वह ग्रहों के जल-इतिहास से जुड़े इस बेहद सूक्ष्म संकेत को पकड़ सकता है।