लेकिन बघाई ने यह भी कहा कि ईरान प्रक्रिया में शामिल बना हुआ है। इसलिए “ईरान ने समझौता ठुकरा दिया” कहना उपलब्ध रिपोर्टिंग से आगे निकल जाना होगा । अधिक सटीक निष्कर्ष यह है: ईरान प्रस्ताव को उसी रूप में मानने को तैयार नहीं दिखा, उसने अंतिम जवाब टाला और बातचीत की शर्तें बदलवाने की कोशिश की—मगर कूटनीतिक रास्ता औपचारिक रूप से बंद नहीं किया
।
यह विवाद सिर्फ़ इस बात पर नहीं था कि बातचीत चले या नहीं। बड़ा सवाल यह था कि पहले कौन-सा मुद्दा सुलझाया जाए।
अमेरिका की ओर से विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा था कि वॉशिंगटन शुक्रवार को ईरान से एक “गंभीर प्रस्ताव” का इंतज़ार कर रहा है । अमेरिकी प्रस्ताव को ऐसे ढांचे के रूप में बताया गया जिसमें पहले युद्ध रोकने की बात थी, उसके बाद उन तात्कालिक मुद्दों पर बातचीत शुरू होनी थी जिनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य भी शामिल है
।
ईरान का कथित जवाबी प्रस्ताव अलग क्रम सुझाता था। इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर (ISW) के अनुसार, तेहरान के जवाबी प्रस्ताव में तीन चरणों की योजना थी: पहले चरण में युद्ध को जल्दी समाप्त करना, ईरान पर भविष्य में संयुक्त बलों के हमलों की गारंटी रोकना और होर्मुज़ जलडमरूमध्य का मुद्दा शामिल था; परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत दूसरे चरण में रखी गई थी । ISW के आकलन के मुताबिक, ईरान संभवतः परमाणु मुद्दों पर बाद में बातचीत की संभावना दिखाकर अमेरिका पर युद्ध समाप्त करने और नौसैनिक नाकेबंदी हटाने का दबाव बनाना चाहता था
।
यही क्रम तनाव का केंद्र था। अगर युद्ध, सुरक्षा गारंटी और होर्मुज़ जैसे मुद्दे पहले निपट जाते, तो ईरान परमाणु कार्यक्रम जैसे कठिन सवालों से पहले अपने कुछ बड़े तात्कालिक लक्ष्य हासिल कर लेता ।
ईरान की देरी किसी शांत कमरे में चल रही धीमी कूटनीति नहीं थी। यह देरी ऐसे समय हुई जब सैन्य और समुद्री मोर्चे पर टकराव बना हुआ था। 9 मई की रिपोर्टिंग में नई नौसैनिक झड़पों, हवाई हमलों, ड्रोन हमलों और ब्रिटेन द्वारा होर्मुज़ जलडमरूमध्य की ओर एक विध्वंसक पोत भेजने का उल्लेख था, जबकि वॉशिंगटन तेहरान के जवाब का इंतज़ार कर रहा था । अलग से, अमेरिका की “गंभीर प्रस्ताव” वाली मांग भी फारस की खाड़ी में छिटपुट झड़पों के बीच आई थी
।
होर्मुज़ जलडमरूमध्य इस पूरे तनाव का मुख्य बिंदु था। यह समुद्री रास्ता फारस की खाड़ी को खुले समुद्री मार्गों से जोड़ता है, इसलिए क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री आवाजाही के लिहाज़ से यह बेहद संवेदनशील है। रिपोर्टिंग ने छिटपुट झड़पों को अमेरिकी नौसेना की होर्मुज़ नाकेबंदी पर तनाव से जोड़ा, जिसे ईरान बार-बार युद्धविराम का उल्लंघन कहता रहा है । ईरान के कथित जवाबी प्रस्ताव में भी होर्मुज़ को पहले चरण में रखा गया था, जिससे साफ़ था कि समुद्री पहुंच कोई किनारे का मुद्दा नहीं, बल्कि तेहरान के शुरुआती सौदे का अहम हिस्सा थी
।
इस माहौल में जवाब टालना सिर्फ़ बातचीत धीमी करना नहीं था। इससे उन्हीं मुद्दों पर अनिश्चितता बढ़ी जो टकराव को चला रहे थे—युद्ध, नाकेबंदी, होर्मुज़, सुरक्षा गारंटी और परमाणु वार्ता का भविष्य ।
ईरान की स्थिति को “शर्तों के साथ दबाव” की तरह पढ़ा जा सकता है। उपलब्ध स्रोत चार बातें मजबूत करते हैं:
ईरान की देरी को अंतिम अस्वीकृति के बजाय देरी के साथ सौदेबाज़ी के रूप में समझना बेहतर है। तेहरान ने अमेरिकी शर्तों की आलोचना की, वॉशिंगटन की गंभीरता पर सवाल उठाए और ऐसा चरणबद्ध समझौता आगे बढ़ाता दिखा जिसमें युद्ध, सुरक्षा गारंटी और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को परमाणु कार्यक्रम की कठिन बातचीत से पहले रखा जाए ।
तनाव इसलिए बढ़ा क्योंकि अमेरिका सार्वजनिक रूप से ईरान से “गंभीर प्रस्ताव” की प्रतीक्षा कर रहा था, जबकि उसी समय खाड़ी में झड़पें, नौसैनिक तैनाती और होर्मुज़ नाकेबंदी पर विवाद जारी थे ।
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