किम यो जोंग की चेतावनी जापान के पहले समुद्र-आधारित टॉमहॉक क्रूज मिसाइल परीक्षण के बाद आई। जापान मैरीटाइम सेल्फ-डिफेंस फोर्स ने 29 जुलाई 2026 को प्रशांत महासागर में एजिस-प्रणाली से लैस विध्वंसक JS Chokai से अमेरिकी निर्मित टॉमहॉक मिसाइल का लाइव-फायर परीक्षण किया। यह जापानी युद्धपोत से इस मिसाइल के प्रक्षेपण का पहला परीक्षण था और टोक्यो की लंबी दूरी की मारक क्षमता विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
टॉमहॉक एक सटीक निशाना साधने वाली लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल है, जो 1,600 किलोमीटर से अधिक दूर स्थित जमीनी लक्ष्यों को निशाना बना सकती है।
किम ने जापान को “युद्ध राष्ट्र में बदलता हुआ” और “युद्ध अपराधी राष्ट्र की ओर लौटता हुआ” बताया। उनके आरोपों का मुख्य आधार जापान की बदलती सुरक्षा नीति और अमेरिका के साथ उसका बढ़ता सैन्य सहयोग था।
उनके बयान में मुख्य रूप से ये बातें सामने आईं:
जापान ने अमेरिका से 400 टॉमहॉक क्रूज मिसाइलें खरीदने पर सहमति जताई है और इनके लिए 2 अरब डॉलर से अधिक का प्रावधान किया गया है। यह योजना टोक्यो की “स्टैंड-ऑफ” या दूर से जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता विकसित करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
जापान के रक्षा खर्च में भी तेज वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025 के लिए लगभग 8.7 ट्रिलियन येन यानी करीब 55 अरब डॉलर का रक्षा बजट मंजूर किया गया था, जबकि वित्त वर्ष 2026 का बजट 9 ट्रिलियन येन से अधिक, लगभग 58–59 अरब डॉलर, बताया गया है।
टोक्यो की दीर्घकालिक योजना रक्षा खर्च को 2027 तक सकल घरेलू उत्पाद यानी GDP के लगभग 2 प्रतिशत तक ले जाने की है।
किम यो जोंग का बयान जापान की 2026 रक्षा श्वेतपत्र जारी होने के एक दिन बाद आया। 4 अगस्त को जारी इस दस्तावेज़ में जापान ने अपने आसपास के सुरक्षा माहौल को द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का “सबसे गंभीर और जटिल” बताया।
श्वेतपत्र में चीन, रूस और उत्तर कोरिया से जुड़े कई जोखिमों का उल्लेख किया गया है। जापान ने विशेष रूप से इन देशों के बीच बढ़ते सैन्य समन्वय, चीन-रूस के संयुक्त बमवर्षक गश्त और रूस की ओर से उत्तर कोरिया के सैन्य आधुनिकीकरण को मिल रहे समर्थन पर चिंता जताई।
रक्षा मंत्री शिंजीरो कोइज़ुमी ने भी कहा कि जापान को अपनी रक्षा क्षमताओं को “पहले से अधिक तात्कालिकता और संकट की भावना” के साथ मजबूत और आधुनिक बनाने की जरूरत है।
जापान का रक्षा मंत्रालय लगातार यह तर्क देता रहा है कि लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता आक्रामक विस्तार के लिए नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और प्रतिरोध के लिए है। मंत्रालय के अनुसार, संभावित क्षेत्रीय खतरों को रोकने के लिए दूर से जवाब देने की क्षमता आवश्यक है।
यही दावा उत्तर कोरिया स्वीकार नहीं करता। प्योंगयांग का कहना है कि टॉमहॉक जैसी मिसाइलें जापान को अपने क्षेत्र से दूर स्थित लक्ष्यों पर हमला करने की क्षमता देती हैं और इस तरह उसकी युद्धोत्तर सीमित सैन्य भूमिका बदल रही है।
जापान के टॉमहॉक परीक्षण पर चीन ने भी चिंता जताई। चीनी पक्ष ने कहा कि यह कदम उसके हितों को नुकसान पहुंचाने और चीनी जनता को प्रभावित करने की जापानी मंशा को दर्शाता है। बीजिंग ने जापानी सैन्यवाद के दोबारा उभरने की आशंका भी व्यक्त की।
इस तरह जापान की नई मिसाइल नीति को लेकर उत्तर कोरिया और चीन की आपत्तियां अलग-अलग राजनीतिक संदर्भों से आती हैं, लेकिन दोनों ही टोक्यो की बढ़ती लंबी दूरी की मारक क्षमता को क्षेत्रीय तनाव का कारण मानते हैं।
विश्लेषकों और कुछ क्षेत्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, किम यो जोंग की ऐसी तीखी बयानबाजी का एक उद्देश्य उत्तर कोरिया के अपने हथियार कार्यक्रमों को उचित ठहराना भी हो सकता है।
प्योंगयांग जापान, अमेरिका और अन्य बाहरी शक्तियों के सैन्य कदमों को खतरे के रूप में पेश करके अपने परमाणु और मिसाइल विकास को रक्षात्मक जवाब बताता है। इस रणनीति में बाहरी खतरे को उभारना घरेलू स्तर पर हथियारों के विकास और सुरक्षा-केंद्रित नीतियों के लिए समर्थन जुटाने का माध्यम बन सकता है।
फिलहाल किम यो जोंग ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि “अतिरिक्त सैन्य विकल्पों” से उनका संकेत किस तरह की कार्रवाई या हथियार प्रणाली की ओर है। लेकिन उनका बयान बताता है कि जापान की नई लंबी दूरी की क्षमता उत्तर कोरिया के लिए केवल सैन्य बदलाव नहीं, बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक चुनौती भी बन गई है।