रूस की शक्तिशाली इलेक्ट्रॉनिक जामिंग प्रणालियों ने यूक्रेन को नए समाधान खोजने पर मजबूर किया। उन्हीं में से एक है फाइबर‑ऑप्टिक नियंत्रित FPV ड्रोन।
इन ड्रोन में रेडियो सिग्नल के बजाय एक पतली फाइबर‑ऑप्टिक केबल के जरिए ऑपरेटर से संपर्क बना रहता है। क्योंकि नियंत्रण सिग्नल तार के भीतर जाता है, इसलिए उसे जाम करना या स्पूफ करना बहुत कठिन हो जाता है .
इसके साथ ही डेवलपर्स ड्रोन में ऐसे AI मॉड्यूल जोड़ रहे हैं जो:
रूस और यूक्रेन के बीच यह तकनीकी दौड़ लगातार तेज़ हो रही है—नई ड्रोन तकनीक के साथ‑साथ जामिंग और काउंटर‑ड्रोन सिस्टम भी विकसित किए जा रहे हैं .
यूक्रेन ने लंबी दूरी के हमलों के लिए एक नई श्रेणी के हथियार भी विकसित किए हैं जिन्हें अक्सर “ड्रोन‑मिसाइल” कहा जाता है।
इनमें सबसे चर्चित सिस्टम Bars (RS‑1 Bars) है। इसे एक हाइब्रिड प्लेटफॉर्म माना जाता है जो क्रूज़ मिसाइल और ड्रोन दोनों की विशेषताओं को मिलाता है।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार:
इतनी दूरी के कारण यूक्रेन को फ्रंटलाइन से काफी दूर स्थित सैन्य ढांचों पर हमला करने की क्षमता मिलती है—संभावित रूप से रूस के भीतर भी .
हालांकि Bars के तकनीकी विवरण अभी पूरी तरह सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। कई आंकड़े मीडिया रिपोर्ट या गुमनाम स्रोतों पर आधारित हैं, इसलिए इसकी सटीक क्षमताएँ पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं .
ड्रोन तकनीक में तेज़ प्रगति ने युद्ध की प्रकृति बदल दी है। अब बड़ी संख्या में FPV अटैक ड्रोन कम लागत पर टैंकों, तोपों और सप्लाई वाहनों जैसे महंगे सैन्य उपकरणों को निशाना बना सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि इन तकनीकों ने उपकरणों की क्षति बढ़ाई है और कई सैन्य अभियानों की गति धीमी कर दी है क्योंकि दोनों पक्षों को लगातार हवाई निगरानी और हमलों के खतरे के साथ काम करना पड़ता है .
यूक्रेन ने सिर्फ आक्रामक ड्रोन ही नहीं बनाए—उसने रक्षा के लिए भी एक दिलचस्प और सस्ता समाधान विकसित किया है: ध्वनि‑आधारित ड्रोन पहचान नेटवर्क।
Sky Fortress, Zvook और FENEK जैसे सिस्टम बड़े क्षेत्रों में लगाए गए हजारों माइक्रोफोन या सेंसर का उपयोग करते हैं। ये ड्रोन के इंजन की विशिष्ट आवाज़ पहचानकर एयर‑डिफेंस टीमों को अलर्ट भेजते हैं .
कई छोटे ड्रोन बहुत नीचे या धीमी गति से उड़ते हैं, इसलिए पारंपरिक रडार उन्हें समय पर नहीं पकड़ पाते। ऐसे में ध्वनि‑आधारित पहचान शुरुआती चेतावनी की अतिरिक्त परत देती है। सेंसर मिलकर ड्रोन की दिशा और उड़ान मार्ग का अनुमान लगा सकते हैं .
कुछ रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन में ऐसे हजारों सेंसर लगाए गए हैं, जिससे देशभर में एक बड़ा “लिसनिंग नेटवर्क” बन गया है जो आने वाले ड्रोन को ट्रैक कर सकता है .
यूक्रेन के कम लागत वाले सेंसर नेटवर्क ने पश्चिमी देशों का ध्यान खींचा है। अमेरिकी सेना भी इन सिस्टमों का अध्ययन कर रही है ताकि छोटे और कम ऊँचाई पर उड़ने वाले ड्रोन से बेहतर तरीके से निपटा जा सके .
इसके अलावा प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सैनिकों को अलग‑अलग ड्रोन की आवाज़ पहचानना भी सिखाया जा रहा है—यह भी यूक्रेन के अनुभव से लिया गया सबक है .
AI के तेज़ विकास के बावजूद पूरी तरह स्वायत्त ड्रोन युद्ध अभी सीमित है। अधिकांश सिस्टम अभी भी नेविगेशन सहायता, लक्ष्य पहचान और अंतिम मार्गदर्शन जैसी भूमिकाओं में AI का उपयोग करते हैं .
लक्ष्य की सटीक पहचान, सीमित कंप्यूटिंग क्षमता और जटिल युद्ध स्थितियाँ अभी भी मानव ऑपरेटर को केंद्रीय भूमिका में रखती हैं।
फिर भी दिशा स्पष्ट है। यूक्रेन युद्ध ने AI‑आधारित लक्ष्यीकरण, स्वायत्त सिस्टम, सेंसर नेटवर्क और बड़े पैमाने पर बनने वाले ड्रोन के प्रयोग को तेज़ कर दिया है—ऐसी तकनीकें जो आने वाले दशकों में वैश्विक सैन्य सिद्धांतों को प्रभावित कर सकती हैं।
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