दबाव के दोनों मुख्य बिंदु जस के तस हैं। ईरान के पास होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर दबाव बनाए रखने की क्षमता है, जिसे वैश्विक तेल और गैस ढुलाई का बेहद अहम रास्ता बताया गया है; दूसरी तरफ अमेरिका ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी बनाए हुए है । यही वजह है कि यह समुद्री रास्ता सिर्फ सैन्य मुद्दा नहीं, ऊर्जा बाजारों की चिंता भी बन गया है—जहाजरानी बाधित होने से कारोबार धीमा पड़ा है और ऊर्जा कीमतों को लेकर आशंका बढ़ी है
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रॉयटर्स की रिपोर्ट, जिसे अल-मॉनिटर ने प्रकाशित किया, के अनुसार ईरान का प्रस्ताव होर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजरानी खोलने और अमेरिका की ईरान-नाकाबंदी खत्म करने पर केंद्रित था, जबकि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत बाद के लिए छोड़ी जाती । बाद की रिपोर्टों में भी यही रेखा दिखी: ट्रंप परमाणु गतिविधियों में बड़ा रोलबैक मांग रहे हैं, जबकि ईरान पहले सीमित समझौते से जलडमरूमध्य खुलवाना और नाकाबंदी हटवाना चाहता है
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यानी तेहरान का प्रस्ताव ‘होर्मुज़-फर्स्ट’ सौदा था, जबकि वॉशिंगटन ‘न्यूक्लियर-फर्स्ट’ पैकेज चाहता है। अधिकारियों ने कहा कि ईरान की नई पेशकश में कुछ परमाणु रियायतें थीं, लेकिन ट्रंप ने उसे नाकाफी मानते हुए दस्तावेज़ को ‘garbage’ कहा । वॉशिंगटन के अपने प्रस्ताव में तीन मुद्दे साथ जोड़े गए थे: युद्ध खत्म करना, होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पीछे लेना
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सार्वजनिक रिपोर्टों में ऐसा नहीं दिखता कि अमेरिका ने कोई अंतिम सैन्य फैसला कर लिया है। अभी जिन विकल्पों का जिक्र सामने आया है, वे मुख्यतः दबाव बढ़ाने की रणनीति से जुड़े हैं:
इन विकल्पों का साझा सूत्र है—दबाव। वॉशिंगटन नाकाबंदी, एस्कॉर्ट ऑपरेशन या हमलों की धमकी से ईरान को झुकाना चाहता है; तेहरान होर्मुज़ पर दबाव बनाए रखकर और अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियों को युद्धविराम उल्लंघन बताकर जवाबी बढ़त रखता है ।
होर्मुज़ इस वार्ता का सबसे बड़ा सौदेबाजी पत्ता है। ईरान की रिपोर्टेड पेशकश में इसी रास्ते को खोलने के बदले अमेरिकी नाकाबंदी खत्म करने की बात थी, जबकि परमाणु विवाद को बाद के लिए छोड़ा जाता । अमेरिका इन मुद्दों को अलग-अलग नहीं, साथ जोड़कर देखना चाहता है, ताकि जहाजरानी में राहत ईरान की मजबूत परमाणु प्रतिबद्धता के बिना न मिल जाए
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यही वजह है कि वही जलडमरूमध्य सीमित समझौते की चाबी भी बन सकता है और तनाव बढ़ाने की चिंगारी भी। ईरान ने होर्मुज़ में अमेरिकी एस्कॉर्ट ऑपरेशन के खिलाफ चेतावनी दी है । अमेरिकी रिपोर्टों में भी होर्मुज़ गतिरोध और हालिया फायर एक्सचेंज को ऐसे जोखिम के रूप में देखा गया है जो युद्ध को फैलाकर ऊर्जा संकट लंबा कर सकता है
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वार्ता की असली गांठ ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अधिकारियों के मुताबिक ईरान की ताजा पेशकश में उसके विवादित परमाणु कार्यक्रम पर कुछ रियायतें थीं । लेकिन ट्रंप बड़ा रोलबैक चाहते हैं, और ईरान गहरी परमाणु वार्ता को पहले होर्मुज़-नाकाबंदी वाले सीमित समझौते के बाद ले जाना चाहता है
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पहले की रिपोर्टिंग में अमेरिका के एक व्यापक ढांचे का जिक्र था, जिसमें प्रतिबंधों में राहत, ईरान के परमाणु कार्यक्रम का रोलबैक, मिसाइलों पर सीमाएं और होर्मुज़ जलडमरूमध्य खोलना शामिल था । यही बताता है कि कठिनाई सिर्फ मुद्दों की नहीं, उनके क्रम की भी है—दोनों पक्ष लगभग उन्हीं विषयों पर बात कर रहे हैं, लेकिन किसे पहले लागू किया जाए, इस पर सहमति नहीं है।
चीन यात्रा को रिपोर्टों में अमेरिका-ईरान सौदे की औपचारिक शर्त के तौर पर नहीं बताया गया है। उसका महत्व समय-निर्धारण में है। AP-आधारित रिपोर्टों में ईरान गतिरोध को ट्रंप की चीन यात्रा से ठीक पहले उभरता बताया गया । इसी युद्धविराम अवधि में ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की, यह जानकारी शिन्हुआ के हवाले से रिपोर्ट की गई
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इस समय पर बढ़त लेना आसान फैसला नहीं होगा। अगर अमेरिकी हमले या नौसैनिक टकराव फिर शुरू होते हैं, तो वे ऐसे समय होंगे जब होर्मुज़ संकट पहले से व्यापक संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा व्यवधान की आशंका पैदा कर रहा है । इंतजार करने से ईरान को प्रस्ताव बदलने की गुंजाइश मिल सकती है, लेकिन इससे जलडमरूमध्य और अमेरिकी नाकाबंदी जैसे दबाव बिंदु भी अनसुलझे रहेंगे
। उपलब्ध रिपोर्टें यह नहीं दिखातीं कि ट्रंप ने चीन यात्रा की वजह से कार्रवाई टालने का फैसला कर लिया है; वे सिर्फ यह दिखाती हैं कि फैसला एक मुश्किल कूटनीतिक क्षण पर आ खड़ा हुआ है।
सबसे अहम संकेत यही होगा कि कोई पक्ष ‘पहले क्या’ के सवाल पर झुकता है या नहीं। अगर ईरान शुरुआती चरण में परमाणु रोलबैक की भाषा स्वीकार करता है, तो वार्ता को रास्ता मिल सकता है। अगर वॉशिंगटन चरणबद्ध ‘होर्मुज़-फर्स्ट’ समझौते को मानता है, तो जलडमरूमध्य जल्दी खुल सकता है, लेकिन परमाणु विवाद बाद के लिए बचा रहेगा ।
अगर दोनों अपनी जगह अड़े रहे, तो अगला दबाव नाकाबंदी, जहाज-एस्कॉर्ट ऑपरेशन और हमले फिर शुरू करने की धमकियों के रूप में दिख सकता है । फिलहाल युद्धविराम बस बहुत संकरे अर्थ में जिंदा है: बातचीत का रास्ता खुला है, लेकिन असली सौदा अभी बना नहीं है।
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