यह थेरेपी दुनिया का पहला ब्रेन-टार्गेटेड बेस-एडिटिंग ट्रीटमेंट था, जो CHD3 जीन में उत्परिवर्तन को ठीक करने के लिए डिज़ाइन किया गया था । यह उत्परिवर्तन स्नाइडर्स-ब्लोक-कैम्पो सिंड्रोम नामक एक दुर्लभ बीमारी का कारण बनता है, जिससे विकासात्मक देरी (डेवलपमेंटल डिले) होती है। मार्च 2025 में, बच्ची को शंघाई के ज़िन्हुआ अस्पताल (जो विश्वविद्यालय से संबद्ध है) में रीढ़ की हड्डी में खरबों वायरस कणों (जो जीन-एडिटिंग मशीनरी ले जा रहे थे) का इन्फ्यूजन दिया गया । थेरेपी के एक सप्ताह के भीतर ही उसकी मौत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह मौत थेरेपी से जुड़ी एक गंभीर इम्यून रिएक्शन (थ्रोम्बोटिक माइक्रोएंजियोपैथी) के कारण हुई ।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि बच्ची की मौत को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। फरवरी 2025 में, किउ जिलोंग की रिसर्च टीम ने Nature पत्रिका में एक पेपर प्रकाशित किया, जिसमें एक क्लिनिकल ट्रायल में सफल जीन एडिटिंग का दावा किया गया । इस पेपर में प्रीक्लिनिकल कार्य का वर्णन था, लेकिन मरीज की मौत का कोई जिक्र नहीं था । Nature पत्रिका ने बाद में इस पेपर में एक 'एडिटर नोट' जोड़ा है और अपनी स्वतंत्र जांच शुरू कर दी है। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि यह नोट 'रिट्रैक्शन' (वापसी) नहीं है ।
जांच में सामने आया कि बच्ची के माता-पिता ने इस इलाज के लिए लगभग 8,60,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 7.2 करोड़ रुपये) जुटाए थे । रिपोर्ट के अनुसार, परिवार ने थेरेपी के विकास और उसके क्लिनिकल प्रशासन के लिए भुगतान किया था, और उन्हें इसमें शामिल जोखिमों के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी ।
इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद तीन समानांतर जांचें शुरू हो चुकी हैं:
नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, तीनों जांचें अभी भी जारी हैं और अब तक किसी भी दुराचार (मिसकंडक्ट) का औपचारिक निष्कर्ष नहीं निकाला गया है ।
इस मामले की तुलना तुरंत 2018 के हे जियानकुई जीन-एडिटेड बेबीज कांड (He Jiankui gene-edited babies scandal) से की जाने लगी । इस घटना ने चीन के बायोमेडिकल रिसर्च सेक्टर में नियामक निगरानी, सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) और नैतिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । इस जांच ने उस तीव्र वैश्विक दौड़ को भी उजागर किया है, जो बेस एडिटर्स (CRISPR जीन-एडिटिंग टूल के अधिक सटीक रूप) को दुर्लभ बीमारियों के इलाज में बदलने के लिए चल रही है, और यह भी कि जब वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा नैतिक सुरक्षाओं से आगे निकल जाती है तो क्या जोखिम पैदा हो सकते हैं ।
यह थेरेपी दुनिया का पहला ब्रेन-टार्गेटेड बेस-एडिटिंग ट्रीटमेंट था, जो CHD3 जीन में उत्परिवर्तन को ठीक करने के लिए डिज़ाइन किया गया था । यह उत्परिवर्तन स्नाइडर्स-ब्लोक-कैम्पो सिंड्रोम नामक एक दुर्लभ बीमारी का कारण बनता है, जिससे विकासात्मक देरी (डेवलपमेंटल डिले) होती है। मार्च 2025 में, बच्ची को शंघाई के ज़िन्हुआ अस्पताल (जो विश्वविद्यालय से संबद्ध है) में रीढ़ की हड्डी में खरबों वायरस कणों (जो जीन-एडिटिंग मशीनरी ले जा रहे थे) का इन्फ्यूजन दिया गया । थेरेपी के एक सप्ताह के भीतर ही उसकी मौत हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, यह मौत थेरेपी से जुड़ी एक गंभीर इम्यून रिएक्शन (थ्रोम्बोटिक माइक्रोएंजियोपैथी) के कारण हुई ।
सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि बच्ची की मौत को कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। फरवरी 2025 में, किउ जिलोंग की रिसर्च टीम ने Nature पत्रिका में एक पेपर प्रकाशित किया, जिसमें एक क्लिनिकल ट्रायल में सफल जीन एडिटिंग का दावा किया गया । इस पेपर में प्रीक्लिनिकल कार्य का वर्णन था, लेकिन मरीज की मौत का कोई जिक्र नहीं था । Nature पत्रिका ने बाद में इस पेपर में एक 'एडिटर नोट' जोड़ा है और अपनी स्वतंत्र जांच शुरू कर दी है। हालांकि, यह स्पष्ट किया गया है कि यह नोट 'रिट्रैक्शन' (वापसी) नहीं है ।
जांच में सामने आया कि बच्ची के माता-पिता ने इस इलाज के लिए लगभग 8,60,000 अमेरिकी डॉलर (लगभग 7.2 करोड़ रुपये) जुटाए थे । रिपोर्ट के अनुसार, परिवार ने थेरेपी के विकास और उसके क्लिनिकल प्रशासन के लिए भुगतान किया था, और उन्हें इसमें शामिल जोखिमों के बारे में पूरी जानकारी नहीं दी गई थी ।
इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद तीन समानांतर जांचें शुरू हो चुकी हैं:
नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, तीनों जांचें अभी भी जारी हैं और अब तक किसी भी दुराचार (मिसकंडक्ट) का औपचारिक निष्कर्ष नहीं निकाला गया है ।
इस मामले की तुलना तुरंत 2018 के हे जियानकुई जीन-एडिटेड बेबीज कांड (He Jiankui gene-edited babies scandal) से की जाने लगी । इस घटना ने चीन के बायोमेडिकल रिसर्च सेक्टर में नियामक निगरानी, सूचित सहमति (इनफॉर्म्ड कंसेंट) और नैतिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं । इस जांच ने उस तीव्र वैश्विक दौड़ को भी उजागर किया है, जो बेस एडिटर्स (CRISPR जीन-एडिटिंग टूल के अधिक सटीक रूप) को दुर्लभ बीमारियों के इलाज में बदलने के लिए चल रही है, और यह भी कि जब वैज्ञानिक महत्वाकांक्षा नैतिक सुरक्षाओं से आगे निकल जाती है तो क्या जोखिम पैदा हो सकते हैं ।