लेकिन इसके बावजूद यूक्रेन को EU के निर्णयों पर वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा और वह पूर्ण सदस्य देशों जैसी कानूनी शक्तियाँ भी नहीं पाएगा।
मर्ज़ ने इसे एक व्यावहारिक रास्ता बताया—जिससे यूक्रेन यूरोप के साथ जुड़ा रह सके, जबकि लंबी सदस्यता प्रक्रिया और सुधार जारी रहें। साथ ही उनका मानना है कि इससे रूस‑यूक्रेन युद्ध से जुड़े कूटनीतिक प्रयासों को भी गति मिल सकती है।
राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने EU नेताओं को लिखे एक पत्र में इस प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की। उनका कहना है कि इससे यूक्रेन को केवल प्रतीकात्मक भागीदारी मिलेगी, असली शक्ति नहीं।
कीव की चिंता दो मुख्य कारणों से है:
पहला, इससे यूक्रेन लंबे समय तक एक स्थायी मध्यवर्ती श्रेणी में फंस सकता है।
दूसरा, इससे यह संकेत जा सकता है कि EU यूक्रेन को वही रास्ता नहीं देना चाहता जो अन्य उम्मीदवार देशों को दिया गया था।
इसी वजह से यूक्रेन की सरकार जोर दे रही है कि देश को सामान्य सदस्यता प्रक्रिया पर ही आगे बढ़ना चाहिए, चाहे इसमें समय लगे और बड़े सुधार करने पड़ें।
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार इस प्रस्ताव के तहत यूक्रेन को EU की संरचना में कुछ भागीदारी मिल सकती है, लेकिन सीमाओं के साथ।
संभावित अधिकार:
मुख्य सीमाएँ:
यूरोपीय आयोग (European Commission) ने पुष्टि की कि उसे मर्ज़ का प्रस्ताव मिला है, लेकिन उसने इसे औपचारिक रूप से स्वीकार नहीं किया है।
आयोग के अधिकारियों ने जोर दिया कि EU का विस्तार हमेशा ‘मेरिट‑आधारित सदस्यता प्रक्रिया’ पर आधारित होता है—जिसमें उम्मीदवार देशों को कानूनी, आर्थिक और लोकतांत्रिक सुधार पूरे करने होते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह के विचारों पर चर्चा मुख्य रूप से यूरोपीय परिषद (European Council) यानी सदस्य देशों की सरकारों के स्तर पर होनी चाहिए।
इस प्रस्ताव पर यूरोप के भीतर एकमत राय नहीं है।
जर्मनी इस विचार का सबसे बड़ा समर्थक है और इसे यूक्रेन को EU के करीब रखने का व्यावहारिक तरीका मानता है।
लेकिन कुछ देशों ने सावधानी बरतने को कहा है। उदाहरण के लिए इटली के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि यूक्रेन को भी अन्य उम्मीदवार देशों की तरह पूरी सदस्यता प्रक्रिया और जरूरी सुधार पूरे करने होंगे।
यह बहस सिर्फ यूक्रेन की सदस्यता तक सीमित नहीं है। यह यूरोप की राजनीति में एक गहरे तनाव को दिखाती है।
एक तरफ रूस के साथ जारी युद्ध के कारण यूक्रेन को जल्दी से यूरोपीय ढांचे में जोड़ने का दबाव है। दूसरी तरफ EU के पास दशकों से चला आ रहा सख्त सदस्यता नियमों का ढांचा है।
जर्मनी का प्रस्ताव इन दोनों वास्तविकताओं के बीच एक समझौता खोजने की कोशिश है। लेकिन यूक्रेन को डर है कि ऐसा समझौता उसे साझेदारी और पूर्ण सदस्यता के बीच अनिश्चित स्थिति में फंसा सकता है।
फिलहाल यह विचार केवल एक प्रस्ताव है। आने वाले समय में EU देशों के बीच होने वाली चर्चाएँ तय करेंगी कि यह योजना आगे बढ़ेगी या यूरोपीय विस्तार की बहस में ही रह जाएगी।
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