इसके तहत तेहरान ने एक “पूर्व‑अनुमति परमिट प्रणाली” लागू की है, जिसके तहत किसी भी जहाज़ को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने से पहले ईरानी अधिकारियों से अनुमति लेनी होती है। यह व्यवस्था जहाज़ों के लिए विस्तृत नियमों और निर्देशों के साथ लागू की गई है।
इस रणनीति से ईरान दो लक्ष्य साधने की कोशिश कर रहा है:
यानी रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन कौन गुजर सकता है और कैसे—यह फैसला ईरान कर रहा है।
समुद्री निगरानी और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ईरान मुख्यतः उन देशों के जहाज़ों को गुजरने दे रहा है जिन्हें वह राजनीतिक रूप से तटस्थ या मित्र मानता है।
इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:
इसके विपरीत, अमेरिका या इज़राइल से जुड़े जहाज़ों पर प्रतिबंध या रोक लगाई गई है, जो मौजूदा सैन्य टकराव को दर्शाता है।
चीन के जहाज़ों को लेकर विशेष ध्यान दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार लगभग 30 चीनी जहाज़ों को ईरान के प्रबंधन प्रोटोकॉल के तहत गुजरने की अनुमति दी गई।
इस चयनात्मक नीति के जरिए तेहरान यह संदेश भी देना चाहता है कि जो देश उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन नहीं करते, वे व्यापार जारी रख सकते हैं।
तेहरान ने इस समुद्री संकट को कूटनीतिक दबाव के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया है। ईरान की अर्ध-आधिकारिक फ़ार्स समाचार एजेंसी के हवाले से रिपोर्टों में कहा गया है कि अमेरिका के साथ नई वार्ता शुरू करने से पहले पाँच “विश्वास निर्माण” शर्तें पूरी करनी होंगी।
ये शर्तें बताई जाती हैं:
ईरान की इस नीति के जवाब में अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगियों ने सैन्य और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर कदम उठाए हैं।
सैन्य स्तर पर, अमेरिका ने जहाज़ों की सुरक्षा और ईरान की नाकाबंदी क्षमता को कमजोर करने के लिए अभियान शुरू किया।
कूटनीतिक मोर्चे पर, अमेरिका और कई खाड़ी देशों—जैसे बहरीन, सऊदी अरब, कतर, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात—ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव का मसौदा पेश किया है। इसमें ईरान से मांग की गई है कि वह:
प्रस्ताव में यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि समुद्री मार्ग की स्वतंत्रता बहाल नहीं होती तो ईरान पर प्रतिबंध या अन्य कदम उठाए जा सकते हैं।
वर्तमान स्थिति एक तरह के अस्थिर संतुलन जैसी है। जलडमरूमध्य पूरी तरह बंद नहीं है, लेकिन उस पर भारी राजनीतिक और सैन्य दबाव बना हुआ है।
ईरान चयनात्मक अनुमति और नियामकीय नियंत्रण के जरिए अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी पूरी तरह मुक्त नौवहन (freedom of navigation) बहाल करवाना चाहते हैं।
क्योंकि दुनिया के ऊर्जा व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए इस टकराव का परिणाम केवल युद्ध की दिशा ही नहीं बल्कि आने वाले वर्षों में वैश्विक तेल बाज़ार और समुद्री सुरक्षा नीतियों को भी प्रभावित कर सकता है।
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