दूसरी ओर इराक, जो खुद तेल निर्यातक है, फिर भी प्रभावित हुआ है। युद्ध से जुड़ी बाज़ार अस्थिरता और कीमतों के उतार‑चढ़ाव ने उसके तेल राजस्व और सरकारी वित्त को अस्थिर कर दिया है।
यह दिखाता है कि ऊर्जा बाज़ार में अस्थिरता आयातक और निर्यातक—दोनों तरह की अर्थव्यवस्थाओं को अलग‑अलग तरीकों से प्रभावित कर सकती है।
इन देशों द्वारा सक्रिय किए जा रहे प्रमुख टूल में से एक है Rapid Response Option (RRO)।
यह व्यवस्था सरकारों को अनुमति देती है कि वे विश्व बैंक की पहले से स्वीकृत लेकिन अभी तक खर्च न हुई परियोजनाओं के लगभग 10% फंड को संकट के समय तुरंत इस्तेमाल कर सकें।
उदाहरण के लिए, यदि किसी देश के पास पहले से बुनियादी ढांचे या विकास परियोजनाओं के लिए स्वीकृत ऋण पड़ा है, तो उसका एक हिस्सा आपातकालीन जरूरतों—जैसे ऊर्जा आयात, सामाजिक सहायता या बजट समर्थन—के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्योंकि यह पैसा पहले ही स्वीकृत हो चुका होता है, इसलिए नई ऋण वार्ता या लंबी मंजूरी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।
Rapid Response Option वास्तव में विश्व बैंक के बड़े ढांचे का हिस्सा है, जिसे Crisis Preparedness and Response Toolkit कहा जाता है।
इस ढांचे का उद्देश्य यह है कि देशों को संकट आने के बाद धीमी प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले से ही वित्तीय विकल्प उपलब्ध हों।
इस टूलकिट में शामिल हैं:
इस मॉडल का मकसद यह है कि जब अचानक आर्थिक या मानवीय संकट आए, तो सरकारों के पास तुरंत इस्तेमाल करने योग्य वित्तीय संसाधन मौजूद हों।
विश्व बैंक के अध्यक्ष अजय बंगा के अनुसार, इस टूलकिट के जरिए लगभग $20 से $25 अरब तक की राशि बहुत जल्दी उपलब्ध कराई जा सकती है, क्योंकि यह पहले से स्वीकृत लेकिन अभी तक जारी न किए गए फंड पर आधारित है।
यदि संघर्ष लंबा चलता है या आर्थिक असर बढ़ता है, तो यह समर्थन समय के साथ बढ़कर लगभग $60 अरब से $100 अरब तक पहुंच सकता है।
हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह कोई एक घोषित पैकेज नहीं है। यह संभावित राशि है जिसे अलग‑अलग देश अपनी परियोजनाओं और वित्तीय ढांचे के अनुसार एक्सेस कर सकते हैं।
रिपोर्ट में जिन 27 देशों का उल्लेख है, उनकी पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की गई है। दस्तावेज़ में यह भी स्पष्ट नहीं है कि हर देश कितना पैसा निकाल सकता है।
इसलिए फिलहाल इसे एक वैश्विक एहतियाती कदम के रूप में देखा जा रहा है—जहां देश पहले से ही वित्तीय सुरक्षा तैयार कर रहे हैं, ताकि ऊर्जा कीमतों, व्यापार व्यवधान या आर्थिक झटकों की स्थिति में वे तुरंत प्रतिक्रिया दे सकें।
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