जापान ऊर्जा के लिए आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने या येन के कमजोर होने का असर सीधे घरेलू कीमतों पर पड़ता है।
BOJ ने चेतावनी दी है कि अगर तेल महँगा बना रहा और येन कमजोर रहा, तो एक जोखिमपूर्ण परिदृश्य में कोर महँगाई लगभग 3% तक दो साल तक बनी रह सकती है, जो उसके 2% लक्ष्य से ऊपर है।
कुछ नीति‑निर्माताओं ने यह भी संकेत दिया है कि अगर ऊर्जा झटका लंबे समय तक बना रहता है और व्यापक महँगाई दबाव पैदा करता है, तो ब्याज दर बढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है।
यानी स्थिति जटिल है—महँगाई सख्त नीति की मांग कर रही है, लेकिन बॉन्ड बाज़ार की अस्थिरता सावधानी बरतने को कह रही है।
इन्हीं कारणों से अब उम्मीद बढ़ रही है कि BOJ बॉन्ड खरीद कम करने की गति को धीमा कर सकता है।
वित्तीय बाज़ार की हालिया उथल‑पुथल ने यह दिखाया है कि अगर केंद्रीय बैंक बहुत तेज़ी से पीछे हटता है तो यील्ड में अचानक उछाल आ सकता है। इसलिए नीति‑निर्माता स्थिति बिगड़ने पर बैलेंस‑शीट घटाने की रफ्तार कम कर सकते हैं।
बॉन्ड बाज़ार के बैंकों और संस्थागत निवेशकों ने भी BOJ के साथ बैठकों में यही सुझाव दिया कि 2026 से आगे बॉन्ड खरीद में कटौती धीरे‑धीरे की जाए, ताकि बाज़ार स्थिर रह सके।
संभावना यह है कि BOJ नीति सामान्यीकरण जारी रखेगा, लेकिन बहुत सावधानी से—ताकि यील्ड धीरे‑धीरे बढ़ें, अचानक उछाल न आए।
आने वाली BOJ की जून नीति बैठक पर निवेशकों की खास नज़र है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार संभावित फैसले कुछ इस प्रकार हो सकते हैं:
ऐसा कदम BOJ को नीति सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ने देगा, लेकिन साथ ही निवेशकों को भरोसा भी देगा कि समर्थन अचानक नहीं हटेगा।
जापान का बॉन्ड बाज़ार केवल घरेलू मुद्दा नहीं है। इसका असर वैश्विक वित्तीय प्रणाली तक जा सकता है।
जापान लंबे समय से विदेशी बॉन्ड—खासतौर पर अमेरिकी ट्रेज़री—का बड़ा निवेशक रहा है। अगर जापान में यील्ड बढ़ते हैं, तो जापानी बीमा कंपनियां, बैंक और पेंशन फंड विदेश की बजाय अपने देश के बॉन्ड में निवेश बढ़ा सकते हैं।
इसका वैश्विक असर कई तरीकों से दिख सकता है:
क्योंकि इन पूंजी प्रवाहों का आकार बहुत बड़ा है, इसलिए जापान की नीति में छोटे बदलाव भी वैश्विक बॉन्ड, मुद्रा और शेयर बाज़ारों में असर डाल सकते हैं।
जापान के बॉन्ड बाज़ार में बढ़ती अस्थिरता एक बड़े आर्थिक बदलाव का संकेत है। बैंक ऑफ़ जापान धीरे‑धीरे उस विशाल मौद्रिक प्रोत्साहन कार्यक्रम से बाहर निकल रहा है जो उसने वर्षों तक चलाया था।
लेकिन बढ़ती यील्ड, ऊर्जा‑प्रेरित महँगाई और बाज़ार की सीमित तरलता के कारण यह रास्ता आसान नहीं है। इसलिए BOJ संभवतः नीति को सख्त करेगा—पर बहुत धीरे और सावधानी से।
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