ईंधन की कमी का सबसे स्पष्ट असर बिजली कटौती के रूप में दिखाई दे रहा है। राजधानी हवाना के कई इलाकों में दिन में 20 से 22 घंटे तक बिजली नहीं रहने की रिपोर्टें सामने आई हैं ।
यह दशकों में राजधानी द्वारा देखे गए सबसे लंबे और व्यापक ब्लैकआउट में से एक है । विशेषज्ञों का कहना है कि ईंधन की कमी के कारण जनरेटर नियमित रूप से नहीं चल पा रहे, जिससे राष्ट्रीय ग्रिड अस्थिर होता जा रहा है
।
लगातार बिजली कटौती से नाराज़ नागरिकों ने हवाना के कई इलाकों में प्रदर्शन किए। रिपोर्टों के अनुसार सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए, कुछ जगहों पर सड़कें रोकी गईं और लोगों ने बर्तनों को पीटकर तथा नारे लगाकर बिजली बहाल करने की मांग की ।
ये विरोध प्रदर्शन इस ऊर्जा संकट से सीधे जुड़े सबसे बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों में से माने जा रहे हैं।
क्यूबा सरकार का कहना है कि हाल के वर्षों में अमेरिका की नीतियों—विशेष रूप से तेल आपूर्ति पर दबाव और प्रतिबंध—ने देश तक ईंधन पहुंचना और मुश्किल बना दिया है ।
हवाना का दावा है कि जहाजों और कंपनियों पर पड़ने वाले दबाव के कारण कई संभावित तेल आपूर्ति सौदे रुक गए या घट गए। कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी माना है कि तेल आपूर्ति पर लगाए गए प्रतिबंधों ने संकट को और गंभीर बनाया है, हालांकि इन उपायों का सटीक प्रभाव कितना है इस पर बहस जारी है ।
बिजली संकट केवल रोशनी या घरेलू उपकरणों तक सीमित नहीं है। देश भर में कई महत्वपूर्ण सेवाएं प्रभावित हो रही हैं, जैसे:
मानवीय सहायता संगठनों का कहना है कि बिजली संकट पहले से मौजूद भोजन, ईंधन और दवा की कमी को और गंभीर बना रहा है ।
विश्लेषकों के अनुसार कई कारक एक साथ मिलकर इस स्थिति को पैदा कर रहे हैं:
जब बिजली उत्पादन मुख्य रूप से तेल‑आधारित संयंत्रों पर निर्भर हो, तब थोड़ी‑सी ईंधन कमी भी बड़े पैमाने पर ब्लैकआउट में बदल सकती है।
फिलहाल क्यूबा सरकार अतिरिक्त ईंधन आपूर्ति की व्यवस्था करने और बिजली प्रणाली को स्थिर करने की कोशिश कर रही है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि स्थिति में वास्तविक सुधार तभी संभव है जब नियमित ईंधन आपूर्ति बहाल हो और बिजली ढांचे की मरम्मत तथा आधुनिकीकरण किया जाए।
तब तक क्यूबा का यह ऊर्जा संकट देश की अर्थव्यवस्था, दैनिक जीवन और राजनीतिक स्थिरता—तीनों के लिए बड़ी चुनौती बना रह सकता है।
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