तेजी से बढ़ते मामलों ने अस्पतालों को गंभीर दबाव में डाल दिया है। राजधानी ढाका सहित कई शहरों में अस्पतालों ने खसरे के मरीजों के लिए अलग वार्ड बनाए हैं, लेकिन आईसीयू बेड और चिकित्सा स्टाफ की कमी सामने आ रही है।
अस्पतालों के भरने के पीछे कई कारण हैं:
इन सभी कारणों के मिलकर असर से अस्पतालों में भर्ती मरीजों की संख्या अचानक बढ़ गई है।
इस प्रकोप की सबसे चिंताजनक बात यह है कि संक्रमण का बड़ा हिस्सा बहुत छोटे बच्चों में है। विभिन्न विश्लेषणों के अनुसार लगभग 72% से 80% से अधिक मामले पाँच साल से कम उम्र के बच्चों में दर्ज हुए हैं।
खासकर 9 महीने से कम उम्र के शिशु अधिक जोखिम में हैं। इस उम्र के कई बच्चों को अभी नियमित खसरा टीका नहीं लगाया जाता, इसलिए उनमें निमोनिया या मस्तिष्क संक्रमण जैसी गंभीर जटिलताओं का खतरा ज्यादा होता है।
संक्रमण को रोकने के लिए बांग्लादेश सरकार ने 5 अप्रैल 2026 को आपातकालीन खसरा‑रूबेला टीकाकरण अभियान शुरू किया। यह अभियान विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), यूनिसेफ और गावी वैक्सीन एलायंस के सहयोग से चलाया जा रहा है।
अभियान को चरणों में लागू किया गया:
मई तक इस अभियान के तहत देशभर में 1.8 करोड़ से अधिक बच्चों को टीका लगाया जा चुका था, जबकि कॉक्स बाज़ार के रोहिंग्या शरणार्थी शिविरों में भी 1,66,000 से ज्यादा बच्चों का टीकाकरण किया गया।
जन‑स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस संकट की जड़ में नियमित टीकाकरण कवरेज में आई गिरावट भी है। समय के साथ टीकाकरण दर में हल्की कमी आई, जिससे संवेदनशील बच्चों की संख्या बढ़ गई।
उदाहरण के लिए एक विश्लेषण के अनुसार खसरा‑रूबेला टीके की पहली खुराक का कवरेज 2019 में लगभग 88.6% से घटकर 2024 में करीब 86% रह गया, जबकि दूसरी खुराक का कवरेज लगभग 80.7% तक गिर गया। इससे लाखों बच्चे संक्रमण के प्रति असुरक्षित रह गए।
मामलों की जांच से यह भी पता चला कि संक्रमित बच्चों में बड़ी संख्या या तो कभी टीका न लगवाने वाले (ज़ीरो‑डोज़) थे या फिर उन्हें केवल एक खुराक मिली थी। इससे वायरस को फैलने का मौका मिल गया।
खसरा दुनिया की सबसे संक्रामक बीमारियों में से एक है। जब किसी आबादी में प्रतिरक्षा का स्तर कम होता है, तो यह बहुत तेजी से फैल सकता है।
बांग्लादेश में इतने बड़े पैमाने पर संक्रमण और देशभर में चल रहे प्रसार के कारण स्वास्थ्य एजेंसियों को चिंता है कि यदि टीकाकरण तेज़ी से नहीं बढ़ाया गया तो संक्रमण और फैल सकता है।
भीड़भाड़ वाले इलाके—जैसे बड़े शहर या शरणार्थी शिविर—विशेष रूप से जोखिम में हैं, क्योंकि यहां संक्रमण तेजी से फैल सकता है और सीमा पार फैलने की आशंका भी बढ़ जाती है।
स्वास्थ्य अधिकारी फिलहाल तीन मुख्य कदमों पर ध्यान दे रहे हैं: बड़े पैमाने पर टीकाकरण, बेहतर निगरानी और अस्पतालों की तैयारी बढ़ाना। आपातकालीन अभियान के तहत करोड़ों बच्चों तक टीके पहुँच चुके हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे प्रकोप से बचने के लिए नियमित टीकाकरण कार्यक्रम को मजबूत रखना सबसे जरूरी होगा।
यह संकट एक अहम चेतावनी भी है—खसरा जैसे रोके जा सकने वाले वायरस भी तेजी से लौट सकते हैं, अगर टीकाकरण कवरेज में थोड़ी भी गिरावट आ जाए।