बताया गया है कि यह सिस्टम कई प्रकार की गतिविधियों को रिकॉर्ड कर सकता है, जैसे:
इन डेटा का उपयोग ऐसे AI एजेंट विकसित करने के लिए किया जा सकता है जो इंसानों की तरह सॉफ्टवेयर का उपयोग करना सीखें—जैसे ऐप खोलना, इंटरफेस में नेविगेट करना या कंप्यूटर‑आधारित काम पूरा करना।
कंपनी के आंतरिक विवरणों के अनुसार यह निगरानी मुख्यतः कंपनी द्वारा दिए गए डिवाइस और कार्य‑संबंधित ऐप्लिकेशन तक सीमित रहती है, न कि कर्मचारियों के निजी कंप्यूटरों तक।
इस कार्यक्रम का सबसे विवादास्पद हिस्सा यह बताया जा रहा है कि कर्मचारी इससे बाहर निकलने का विकल्प नहीं चुन सकते।
रिपोर्ट्स के अनुसार जब कर्मचारियों ने पूछा कि क्या वे इस निगरानी से “ऑप्ट‑आउट” कर सकते हैं, तो Meta के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी (CTO) एंड्रयू बोसवर्थ ने स्पष्ट कहा कि कंपनी के लैपटॉप पर ऐसा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।
इस जवाब के बाद कंपनी के आंतरिक चैट और चर्चा मंचों पर नाराज़गी तेज हो गई। कई कर्मचारियों ने इसे अनिवार्य निगरानी (mandatory monitoring) बताया।
Meta की ओर से कहा गया है कि एकत्रित डेटा का उपयोग प्रदर्शन मूल्यांकन के लिए नहीं बल्कि AI मॉडल प्रशिक्षण के लिए किया जाएगा, और संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा के लिए उपाय मौजूद हैं।
फिर भी कर्मचारियों को आशंका है कि इतना विस्तृत डेटा भविष्य में उत्पादकता विश्लेषण या प्रबंधन निर्णयों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।
विवाद तब और तेज हो गया जब सोशल मीडिया पर एक ऑडियो रिकॉर्डिंग वायरल हुई, जिसमें कथित तौर पर मार्क ज़करबर्ग कंपनी के इस निर्णय के बारे में बताते सुनाई देते हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार यह ऑडियो किसी आंतरिक बैठक से जुड़ा बताया जा रहा है, जिसमें AI को कर्मचारियों के वास्तविक काम से सीखने देने की बात कही गई है। लेकिन समाचार संस्थानों ने इस रिकॉर्डिंग को आम तौर पर “कथित” या “अप्रमाणित” बताया है, यानी इसकी प्रामाणिकता अभी स्पष्ट नहीं है।
फिर भी, इस क्लिप ने कंपनी के भीतर पहले से चल रही बहस को और भड़का दिया।
इस विवाद की तीव्रता में समय का भी बड़ा योगदान है।
रिपोर्ट्स के अनुसार Meta लगभग 8,000 कर्मचारियों की छंटनी की तैयारी कर रही थी, जो कंपनी के कुल कार्यबल का लगभग 10% तक हो सकता है।
छंटनी की खबरों के बीच कर्मचारियों का कहना था कि कंपनी में मनोबल पहले ही बेहद गिर चुका है।
ऐसे माहौल में जब निगरानी प्रणाली की खबर सामने आई, तो कई कर्मचारियों को लगा कि उनका रोज़मर्रा का काम अब ऐसे AI सिस्टम को सिखाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है जो भविष्य में वही काम खुद कर सकते हैं।
कुछ कर्मचारियों ने खुले तौर पर विरोध भी जताया।
रिपोर्ट्स में बताया गया कि Meta के कुछ कार्यालयों में पर्चे लगाए गए जिनमें इस प्रणाली को “Employee Data Extraction Factory” कहा गया। इन पर्चों में कर्मचारियों से निगरानी के खिलाफ याचिका पर हस्ताक्षर करने और श्रम अधिकारों पर चर्चा करने की अपील की गई।
यह घटना टेक उद्योग में बढ़ते तनाव को भी दर्शाती है—जहाँ कंपनियाँ तेजी से AI विकसित कर रही हैं, जबकि कर्मचारी इसके रोजगार पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंतित हैं।
इस विवाद ने कार्यस्थल डेटा संग्रह के कई बड़े मुद्दों को सामने ला दिया है।
कार्यस्थल निगरानी:
कीस्ट्रोक और स्क्रीन कैप्चर जैसी जानकारी कभी‑कभी संवेदनशील सामग्री भी दिखा सकती है।
वास्तविक सहमति का सवाल:
आलोचकों का कहना है कि जब कर्मचारी कंपनी के डिवाइस के बिना काम नहीं कर सकते, तब निगरानी के लिए “सहमति” वास्तव में स्वतंत्र नहीं होती।
डेटा प्रबंधन:
डेटा कितने समय तक रखा जाएगा, कौन इसे देख सकता है और क्या इसे पूरी तरह अनाम (anonymized) किया जाता है—ये प्रश्न अभी स्पष्ट नहीं हैं।
मानव श्रम से AI प्रशिक्षण:
सबसे बड़ा भावनात्मक मुद्दा यह है कि कर्मचारियों के रोज़मर्रा के काम को ऐसे AI सिस्टम के प्रशिक्षण डेटा में बदला जा सकता है जो भविष्य में वही काम स्वचालित कर दें।
Meta का यह कार्यक्रम AI उद्योग की एक बड़ी प्रवृत्ति को दिखाता है—कंपनियाँ अब वास्तविक मानव व्यवहार से डेटा लेकर ऐसे AI एजेंट बनाना चाहती हैं जो कंप्यूटर पर इंसानों की तरह काम कर सकें।
ऐसे सिस्टम के लिए यह जानना बेहद मूल्यवान होता है कि लोग वास्तव में ऐप्स कैसे इस्तेमाल करते हैं, इंटरफेस में कैसे नेविगेट करते हैं और डिजिटल कार्य कैसे पूरा करते हैं।
लेकिन इस मामले ने यह भी दिखाया है कि तकनीकी प्रगति और कर्मचारियों के अधिकारों के बीच तनाव तेजी से बढ़ रहा है। जैसे‑जैसे AI सफेद‑पोश (white‑collar) काम करने में सक्षम होता जा रहा है, यह सवाल और महत्वपूर्ण बनता जा रहा है कि AI को प्रशिक्षित करने के लिए डेटा कौन देता है—और किन शर्तों पर।
फिलहाल Meta का यह विवाद अभी विकसित हो रही कहानी है। सार्वजनिक रिपोर्टिंग में अभी यह स्पष्ट नहीं है कि डेटा कैसे संग्रहित, सुरक्षित या अनाम किया जाता है, और वायरल ज़करबर्ग ऑडियो की प्रामाणिकता भी आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं हुई है। फिर भी यह मामला AI‑आधारित कार्यस्थल स्वचालन के दौर का शुरुआती और बड़ा विवाद बन चुका है।