इसी समय ऊर्जा बाज़ार में भी दबाव बढ़ा है। मध्य‑पूर्व में भू‑राजनीतिक तनाव और तेल आपूर्ति मार्गों—खासतौर पर होरमुज़ जलडमरूमध्य—से जुड़ी आशंकाओं ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेला है ।
तेल आयात पर निर्भर एशियाई देशों के लिए इसका असर दोहरा होता है:
इंडोनेशिया, भारत और फिलीपींस जैसे देशों की अर्थव्यवस्थाएँ खास तौर पर संवेदनशील हैं क्योंकि उन्हें ऊर्जा का बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है ।
इंडोनेशिया की मुद्रा रुपिया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुँच गई है। पूंजी के बाहर जाने और ऊँची ऊर्जा लागत ने इस पर अतिरिक्त दबाव बनाया है ।
स्थिति संभालने के लिए बैंक इंडोनेशिया (देश का केंद्रीय बैंक) कई कदम उठा चुका है, जैसे:
रिपोर्टों के अनुसार केंद्रीय बैंक लंबी अवधि के बॉन्ड खरीद रहा है और छोटी अवधि के कागज़ बेच रहा है ताकि विदेशी निवेश आकर्षित किया जा सके और मुद्रा को सहारा मिल सके ।
अगर रुपिया पर दबाव जारी रहता है, तो ब्याज दर बढ़ाने का विकल्प भी सामने आ सकता है। लेकिन ऐसा करने से आर्थिक गतिविधि धीमी पड़ने का खतरा भी रहता है—खासतौर पर तब, जब ऊर्जा की ऊँची कीमतें पहले से ही अर्थव्यवस्था पर बोझ डाल रही हों।
फिलीपीन पेसो भी डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है क्योंकि वैश्विक निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकालकर डॉलर परिसंपत्तियों की ओर जा रहे हैं ।
फिलीपींस भी तेल आयात पर निर्भर है, इसलिए ऊर्जा कीमतों में उछाल यहाँ महँगाई और बाहरी वित्तीय असंतुलन दोनों को बढ़ा सकता है।
मुद्रा गिरने का एक और असर यह होता है कि सरकार और कंपनियों के लिए उधार लेना महँगा हो जाता है। जब वैश्विक यील्ड बढ़ती है, तो उभरते बाजारों को निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अधिक ब्याज देना पड़ता है ।
इस वजह से केंद्रीय बैंक को एक साथ कई लक्ष्यों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है—मुद्रा स्थिरता, महँगाई नियंत्रण और आर्थिक विकास।
भारतीय रुपया भी इसी वैश्विक दबाव का सामना कर रहा है और व्यापक उभरते‑बाजार बिकवाली के दौरान ऐतिहासिक निचले स्तरों तक पहुँच चुका है ।
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। जब तेल महँगा होता है, तो:
ये सभी कारक मिलकर रुपये पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। दूसरी ओर, विकसित देशों में बढ़ती यील्ड के कारण भारत जैसे देशों को विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए ज्यादा रिटर्न देना पड़ सकता है ।
मौजूदा स्थिति को एक वैश्विक आर्थिक श्रृंखला के रूप में समझा जा सकता है:
इस पूरी प्रक्रिया ने एशिया की कई अर्थव्यवस्थाओं पर एक साथ दबाव बढ़ा दिया है। नीति‑निर्माताओं के सामने अब चुनौती यह है कि वे मुद्राओं को स्थिर रखें और वित्तीय स्थिरता बनाए रखें—लेकिन इतना सख्त मौद्रिक कदम भी न उठाएँ कि आर्थिक विकास रुक जाए।
यह स्थिति दिखाती है कि तेल की कीमतों, युद्ध‑जनित महँगाई और वैश्विक बॉन्ड बाजार जैसे झटके कितनी तेजी से पूरी दुनिया की वित्तीय प्रणालियों में फैल सकते हैं और एशिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की नीतियों को प्रभावित कर सकते हैं ।
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