इस वजह से कई चीनी कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर ज्यादा निर्भर होने लगी हैं।
यूरोप—जहाँ खरीदारों की क्रय शक्ति अधिक है और इलेक्ट्रिफिकेशन तेजी से बढ़ रहा है—इन निर्यातों का प्रमुख गंतव्य बन गया है।
इन सभी कारकों का परिणाम अप्रैल में साफ दिखाई दिया। उसी महीने पहली बार चीनी ऑटोमेकर यूरोप की EV बिक्री का 15% से ज्यादा हिस्सा लेने में सफल रहे।
इस उपलब्धि के पीछे दो मुख्य वजहें थीं:
कुछ साल पहले तक यूरोप में ये कंपनियाँ सीमित उपस्थिति रखती थीं, लेकिन अब वे मुख्य प्रतिस्पर्धियों में गिनी जा रही हैं।
यूरोपियन यूनियन ने 2024 में चीन में बने बैटरी‑इलेक्ट्रिक वाहनों पर लगभग 45% तक के टैरिफ लगाए थे। यह कदम स्थानीय उद्योग को सस्ते आयात से बचाने के लिए उठाया गया था।
लेकिन इन टैरिफ का असर मुख्य रूप से पूरी तरह इलेक्ट्रिक कारों (BEV) पर पड़ता है।
इस वजह से कई चीनी कंपनियाँ यूरोप में अपनी रणनीति बदलकर PHEV मॉडल पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। विश्लेषकों के अनुसार यह बदलाव खास तौर पर उच्च EV टैरिफ को दरकिनार करने के लिए किया गया है।
यह मॉडल यूरोपीय ग्राहकों के लिए भी आकर्षक है, क्योंकि इसमें छोटी दूरी के लिए इलेक्ट्रिक ड्राइविंग और लंबी दूरी के लिए पेट्रोल इंजन दोनों मिलते हैं।
चीनी ऑटोमेकर की एक और बड़ी ताकत उनकी कीमत और तकनीक है। कई चीनी मॉडल अक्सर सस्ते, नए या ज्यादा फीचर‑समृद्ध होते हैं।
चीन की मजबूत बैटरी और सप्लाई‑चेन क्षमता कंपनियों को यह संभव बनाती है कि वे कम कीमत में:
जैसे फीचर दे सकें। यही वजह है कि यूरोप में कई ग्राहक इन मॉडलों को बेहतर वैल्यू मान रहे हैं।
इस वृद्धि का प्रभाव सिर्फ EV सेगमेंट तक सीमित नहीं है। चीनी ब्रांड्स अब यूरोप के कुल यात्री‑कार बाजार में लगभग 10% हिस्सेदारी के करीब पहुँच रहे हैं।
इलेक्ट्रिफाइड वाहनों (EV और हाइब्रिड) के क्षेत्र में उनका प्रभाव और भी बड़ा है। 2025 के अंत तक चीनी कंपनियाँ यूरोप के इलेक्ट्रिफाइड कार बाजार का लगभग 16% हिस्सा पकड़ चुकी थीं।
इसका मतलब है कि यूरोप की पारंपरिक कार कंपनियों—जैसे Volkswagen, Stellantis और Renault—को अब भविष्य के सबसे महत्वपूर्ण सेगमेंट में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
यूरोप में चीनी ऑटोमेकर की तेजी कई ताकतों का परिणाम है—बढ़ती EV मांग, चीन से निर्यात दबाव, प्रतिस्पर्धी कीमतें और टैरिफ से बचने के लिए प्लग‑इन हाइब्रिड रणनीति।
15% EV बाजार हिस्सेदारी पार करना इस बात का संकेत है कि चीनी ब्रांड अब सिर्फ नए खिलाड़ी नहीं रहे—वे यूरोप की इलेक्ट्रिक‑मोबिलिटी दौड़ में बड़े दावेदार बन चुके हैं। अगर यही रफ्तार बनी रही, तो आने वाले वर्षों में यूरोप के ऑटो उद्योग में कीमत, तकनीक और प्रतिस्पर्धा के नियम काफी बदल सकते हैं।
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