डेटा सेंटर चौबीसों घंटे चलते हैं और उन्हें ठंडा रखने के लिए बड़े‑बड़े कूलिंग सिस्टम और बिजली उपकरणों की जरूरत होती है। साथ ही बिजली जाने पर काम जारी रखने के लिए बैकअप जनरेटर लगाए जाते हैं।
हेज़लमेयर के प्रस्ताव में 18 डीज़ल बैकअप जनरेटर शामिल थे। योजना अधिकारियों का मानना था कि इनसे पैदा होने वाला शोर आसपास के इलाके के लिए स्वीकार्य सीमा से अधिक हो सकता है।
स्थानीय लोगों के लिए यह रोज़मर्रा की जीवन गुणवत्ता का मुद्दा बन गया—खासकर तब जब सुविधा 24 घंटे चलने वाली हो।
यह प्रस्तावित साइट मांडून बिल्या (Helena River) के पास थी। पर्यावरण समूहों का कहना था कि इतनी बड़ी औद्योगिक इमारत नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और आसपास चल रहे संरक्षण कार्यों को प्रभावित कर सकती है।
इस क्षेत्र का सांस्कृतिक महत्व भी बहुत गहरा है। विरासत अध्ययनों के अनुसार Swan और Helena नदी तंत्र लगभग 40,000 वर्षों से Nyoongar आदिवासी समुदाय के जीवन का हिस्सा रहे हैं।
हालाँकि इस परियोजना के खिलाफ औपचारिक आदिवासी आपत्तियों के सार्वजनिक प्रमाण सीमित हैं, लेकिन क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व ने स्थान चयन पर सवाल ज़रूर खड़े किए।
एआई आधारित कंप्यूटिंग के लिए बनाए जाने वाले आधुनिक हाइपरस्केल डेटा सेंटर बहुत अधिक संसाधन इस्तेमाल करते हैं।
एक सामान्य बड़े डेटा सेंटर को लगभग 100 मेगावाट बिजली की जरूरत पड़ सकती है—जो लगभग 1 लाख घरों की बिजली खपत के बराबर है।
इसी वजह से कई समुदायों में यह डर बढ़ रहा है कि डेटा सेंटर:
कई बार स्थानीय लोग शुरू में डेटा सेंटर परियोजनाओं का समर्थन करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे रोजगार और निवेश आएगा। लेकिन वास्तविकता अक्सर अलग होती है।
डेटा सेंटरों में निर्माण के दौरान तो काम मिलता है, लेकिन संचालन शुरू होने के बाद स्थायी कर्मचारियों की संख्या बहुत कम होती है।
हेज़लमेयर के मामले में 1.1 अरब डॉलर के निवेश के बावजूद केवल लगभग 24 स्थायी नौकरियाँ बनने का अनुमान था।
जब स्थानीय लोगों को पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव झेलने पड़ते हैं लेकिन बदले में सीमित रोजगार मिलता है, तो समर्थन कमज़ोर पड़ जाता है।
हेज़लमेयर अकेला मामला नहीं है। अमेरिका और अन्य देशों में भी स्थानीय विरोध के कारण कई डेटा सेंटर परियोजनाएँ रुक रही हैं या देर से आगे बढ़ रही हैं।
एक विश्लेषण के अनुसार 2025 से अब तक अमेरिका में लगभग 64 अरब डॉलर के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट स्थानीय विरोध के कारण रोके गए या देरी का सामना कर रहे हैं।
इससे साफ है कि समुदायों का दबाव अब एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर के भविष्य को प्रभावित करने लगा है।
एआई की बढ़ती मांग के कारण डेटा सेंटर आने वाले वर्षों में भी महत्वपूर्ण रहेंगे। लेकिन अब केवल तकनीकी क्षमता और निवेश ही काफी नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि डेवलपर्स को अब एक तरह की “सोशल लाइसेंस” यानी समुदाय की स्वीकृति भी हासिल करनी होगी।
कई समुदाय अब यह मांग कर रहे हैं:
अगर ये भरोसे नहीं बनते, तो अरबों डॉलर के एआई डेटा सेंटर भी स्थानीय स्तर पर राजनीतिक रूप से अस्वीकार्य हो सकते हैं।
आखिरकार, एआई का डिजिटल भविष्य उन भौतिक इमारतों पर टिका है जिन्हें किसी न किसी समुदाय में बनना ही है—और अब वही समुदाय तय कर रहे हैं कि उन्हें यह विकास किस शर्त पर स्वीकार होगा।
Comments
0 comments