अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया भर के कई वित्तीय परिसंपत्तियों की कीमतें इसी को बेंचमार्क मानकर तय होती हैं। जब यह बढ़ती है तो आम तौर पर कंपनियों, सरकारों और घरों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है।
बॉन्ड बाजार की यह गिरावट यूरोप तक फैल गई है। जर्मनी, फ्रांस, इटली और ब्रिटेन के सरकारी बॉन्ड यील्ड भी अमेरिकी ट्रेजरी के साथ ऊपर चढ़े हैं, क्योंकि निवेशक महंगाई जोखिम का दोबारा मूल्यांकन कर रहे हैं।
सबसे तेज बढ़ोतरी ब्रिटेन में देखने को मिली, जहां 30‑वर्षीय सरकारी बॉन्ड (गिल्ट) का यील्ड लगभग 5.82% तक पहुंच गया—जो 1998 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है।
यह वृद्धि इस आशंका को दर्शाती है कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी और लगातार बनी महंगाई के कारण यूरोपीय केंद्रीय बैंकों को भी सख्त मौद्रिक नीति जारी रखनी पड़ सकती है।
जापान लंबे समय से बेहद कम ब्याज दरों के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन अब वहां भी सरकारी बॉन्ड यील्ड तेजी से बढ़ रही हैं क्योंकि वैश्विक बॉन्ड बिकवाली का असर टोक्यो तक पहुंच चुका है।
जापान की स्थिति खास है क्योंकि वह अपनी अधिकांश ऊर्जा आयात करता है। इसलिए तेल की कीमतों में बढ़ोतरी जल्दी ही घरेलू महंगाई को बढ़ा सकती है और बैंक ऑफ जापान पर अपनी बेहद ढीली मौद्रिक नीति से बाहर निकलने का दबाव बढ़ा सकती है।
ऊर्जा कीमतें महंगाई की अपेक्षाओं को आकार देने में बड़ा रोल निभाती हैं। जब तेल तेजी से महंगा होता है, तो ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत पूरे आर्थिक तंत्र में बढ़ जाती है।
हाल की बाजार उथल‑पुथल के दौरान कच्चे तेल की कीमतें एक ही सप्ताह में 7% से अधिक बढ़ गईं। इससे यह डर मजबूत हुआ कि महंगाई कम होने के बजाय फिर से तेज हो सकती है।
महंगाई बढ़ने की आशंका बॉन्ड निवेशकों के लिए महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि बॉन्ड से मिलने वाला तय ब्याज भुगतान समय के साथ अपनी क्रय‑शक्ति खो सकता है। इसलिए निवेशक लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड खरीदने से पहले अधिक यील्ड की मांग करते हैं।
इस बिकवाली का एक बड़ा कारण केंद्रीय बैंकों की नीति को लेकर बदलती उम्मीदें भी हैं। पहले निवेशकों को उम्मीद थी कि 2026 में ब्याज दरों में कटौती शुरू हो सकती है। लेकिन अब यह धारणा कमजोर पड़ रही है।
ऊर्जा‑प्रेरित महंगाई और भू‑राजनीतिक अनिश्चितता के कारण बाजार ने दर कटौती की उम्मीदें घटा दी हैं—और कुछ अर्थव्यवस्थाओं में आगे और सख्ती की संभावना तक जोड़ दी है।
इस “Higher for Longer” यानी लंबे समय तक ऊंची ब्याज दरों वाले माहौल के कुछ बड़े प्रभाव हो सकते हैं:
बढ़ती बॉन्ड यील्ड का असर शेयर बाजारों पर भी दिख रहा है। जब यील्ड बढ़ती है तो निवेशकों के लिए बॉन्ड अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक हो जाते हैं, और शेयरों का मूल्यांकन दबाव में आ सकता है।
इसी कारण हाल के दिनों में वैश्विक शेयर सूचकांक कमजोर हुए हैं। यूरोप का STOXX 600 इंडेक्स लगभग 1.4% गिर गया, जबकि अन्य वैश्विक इक्विटी बाजारों में भी गिरावट देखी गई।
आज का बॉन्ड बाजार संकट एक क्लासिक आर्थिक चक्र को दर्शाता है: भू‑राजनीतिक संघर्ष तेल की कीमतों को ऊपर धकेलता है, ऊर्जा महंगी होने से महंगाई का डर बढ़ता है, और निवेशक सरकारी कर्ज पर अधिक रिटर्न की मांग करने लगते हैं।
जब तक महंगाई के दबाव कम नहीं होते या भू‑राजनीतिक जोखिम घटते नहीं, तब तक वैश्विक बॉन्ड बाजारों में अस्थिरता बनी रह सकती है—और ऊंची ब्याज दरों का दौर वित्तीय बाजारों को प्रभावित करता रह सकता है।
Comments
0 comments