चीन ने जापान की संभावित योजना—रक्षा खर्च को 2% से बढ़ाकर 3–5% GDP तक ले जाने—पर कड़ी आलोचना करते हुए एशिया‑प्रशांत देशों को ‘जापानी नव‑सैन्यवाद’ से सावधान रहने को कहा है। जापान का रक्षा खर्च तेजी से बढ़ा है: 2024 में लगभग 55.3 अरब डॉलर और 2025 में करीब 62.2 अरब डॉलर, जबकि 2027 तक इसे GDP के लगभग 2% तक ले जाने की योज...

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: What is China’s response to Japan’s proposed plan to increase security-related spending from the current 2% of GDP to potentially 3–5%, why. Article summary: China’s response is a sharp public denunciation: Beijing says any move by Japan to push security spending beyond its current 2 percent of GDP would further expose what it calls Tokyo’s drive toward “remilitarization” and. Topic tags: general, general web, user generated, news, education. Reference image context from search candidates: Reference image 1: visual subject "... 2 percent of GDP. "The increase in China's defense budget is characterized by a reasonable, moderate, and restrained growth," Jiang said." source context "China rejects Japan's 'China threat' claims, says Tokyo using excuses to expand military - Chinadaily.com.cn" Reference image 2: visual sub
पूर्वी एशिया में रणनीतिक तनाव बढ़ता जा रहा है। इसी बीच जापान के तेजी से बढ़ते रक्षा खर्च और सैन्य क्षमताओं के विस्तार ने क्षेत्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। टोक्यो जहां अपनी सुरक्षा के लिए इसे जरूरी बता रहा है, वहीं चीन इसे संभावित “सैन्यवाद की वापसी” के रूप में देख रहा है।
चीन के विदेश मंत्रालय ने जापान की रक्षा नीति की सार्वजनिक रूप से आलोचना करते हुए कहा है कि बढ़ता रक्षा बजट यह दिखाता है कि जापान फिर से सैन्यवाद की राह पर लौट रहा है। बीजिंग के अनुसार टोक्यो “पुनः सैन्यीकरण” की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को कमजोर कर सकता है और एशिया‑प्रशांत क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकता है।
चीनी अधिकारियों ने विशेष रूप से जापान द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली शब्दावली—जैसे “आत्म‑रक्षा” और “काउंटरस्ट्राइक क्षमता”—पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इन शब्दों का इस्तेमाल बड़े और अधिक सक्रिय सैन्य रोल को सही ठहराने के लिए किया जा रहा है।
जापान के युद्धकालीन इतिहास को देखते हुए बीजिंग अक्सर एशिया‑प्रशांत देशों से अपील करता है कि वे जापानी “नव‑सैन्यवाद” के संभावित पुनरुत्थान के प्रति सतर्क रहें। चीन को यह भी चिंता है कि जापान धीरे‑धीरे एक अधिक पारंपरिक सैन्य शक्ति बनकर अमेरिकी नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के साथ और गहराई से जुड़ रहा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दशकों तक जापान का सैन्य खर्च आमतौर पर GDP के लगभग 1% के आसपास सीमित रहा। लेकिन हाल के वर्षों में यह नीति तेजी से बदलती दिख रही है।
ताजा आंकड़ों के अनुसार:
सरकार पहले ही घोषणा कर चुकी है कि 2027 तक रक्षा खर्च को GDP के लगभग 2% तक ले जाया जाएगा—जो पारंपरिक सीमा से लगभग दोगुना है।
इसके अलावा जापान की सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी इस संभावना का भी अध्ययन कर रही है कि भविष्य में यह खर्च 3–5% GDP तक बढ़ाया जाए, आंशिक रूप से इसलिए क्योंकि नाटो और अन्य सहयोगी देशों में भी रक्षा खर्च बढ़ाने पर चर्चा हो रही है।
रक्षा बजट के साथ‑साथ जापान अपने सैन्य उपकरण और तकनीकी क्षमताएँ भी तेजी से बढ़ा रहा है।
SIPRI से जुड़े विश्लेषणों के अनुसार 2019–2023 के बीच जापान के हथियार आयात में लगभग 155% की वृद्धि हुई, जिससे वह दुनिया के बड़े हथियार आयातकों में शामिल हो गया।
नई सैन्य योजनाओं में प्रमुख रूप से शामिल हैं:
इन कार्यक्रमों का उद्देश्य जापान के दक्षिण‑पश्चिमी द्वीपों और आसपास के समुद्री क्षेत्रों की रक्षा को मजबूत करना है, जहां हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है।
इस बहस में अमेरिका भी एक अहम कारक है। वॉशिंगटन लंबे समय से अपने सहयोगियों को अधिक रक्षा खर्च करने के लिए प्रोत्साहित करता रहा है। पश्चिमी सुरक्षा चर्चाओं—विशेषकर नाटो के खर्च लक्ष्यों—ने टोक्यो में यह सवाल उठाया है कि क्या जापान को 2% से भी अधिक खर्च करना चाहिए।
जापान की सुरक्षा रणनीति का आधार अब भी अमेरिका‑जापान सैन्य गठबंधन है। अधिक सैन्य क्षमता विकसित करना आंशिक रूप से इस गठबंधन को मजबूत करने और क्षेत्र में अमेरिकी प्रतिबद्धता बनाए रखने का तरीका भी माना जाता है।
जापानी नेताओं का तर्क है कि यह सैन्य विस्तार आक्रामक नहीं बल्कि रक्षात्मक है। सरकार के आधिकारिक दस्तावेज़ों के अनुसार जापान आज द्वितीय विश्व युद्ध के बाद का सबसे जटिल और गंभीर सुरक्षा वातावरण झेल रहा है।
इस आकलन के पीछे कई कारण बताए जाते हैं:
जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में चीन को “सबसे बड़ा रणनीतिक चुनौती” और उत्तर कोरिया को “गंभीर और तात्कालिक खतरा” बताया गया है।
टोक्यो का कहना है कि यदि वह संभावित मिसाइल लॉन्च स्थलों पर जवाबी हमला करने की क्षमता विकसित करता है, तो इससे युद्ध भड़काने के बजाय निरोधक क्षमता (deterrence) मजबूत होगी और संघर्ष की संभावना कम होगी।
चीन और जापान के बीच यह विवाद केवल बजट या हथियारों का सवाल नहीं है। यह एशिया‑प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन के बदलते स्वरूप को भी दर्शाता है। बीजिंग के लिए जापान का सैन्य विस्तार ऐतिहासिक और भू‑राजनीतिक दोनों कारणों से चिंता का विषय है। वहीं टोक्यो इसे बदलते सुरक्षा माहौल के प्रति आवश्यक प्रतिक्रिया मानता है।
जैसे‑जैसे दोनों देश अपनी सैन्य क्षमताएँ बढ़ा रहे हैं, एशिया‑प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा आने वाले वर्षों में और तीखी हो सकती है।
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चीन ने जापान की संभावित योजना—रक्षा खर्च को 2% से बढ़ाकर 3–5% GDP तक ले जाने—पर कड़ी आलोचना करते हुए एशिया‑प्रशांत देशों को ‘जापानी नव‑सैन्यवाद’ से सावधान रहने को कहा है।
चीन ने जापान की संभावित योजना—रक्षा खर्च को 2% से बढ़ाकर 3–5% GDP तक ले जाने—पर कड़ी आलोचना करते हुए एशिया‑प्रशांत देशों को ‘जापानी नव‑सैन्यवाद’ से सावधान रहने को कहा है। जापान का रक्षा खर्च तेजी से बढ़ा है: 2024 में लगभग 55.3 अरब डॉलर और 2025 में करीब 62.2 अरब डॉलर, जबकि 2027 तक इसे GDP के लगभग 2% तक ले जाने की योजना है।
हथियार आयात में भी तेज वृद्धि हुई है—2019–2023 के दौरान यह 2014–2018 की तुलना में लगभग 155% बढ़ गया।