दूसरे शब्दों में, समस्या केवल उत्पादन की नहीं बल्कि लॉजिस्टिक्स और निर्यात क्षमता की भी है। अगर तेल उत्पादित भी हो रहा हो लेकिन वह अंतरराष्ट्रीय बाजार तक न पहुंच सके, तो प्रभाव लगभग उतना ही गंभीर होता है जितना उत्पादन घटने पर होता है।
फिलहाल दुनिया को तुरंत तेल की कमी इसलिए नहीं झेलनी पड़ी क्योंकि बाजार ने मौजूदा भंडार (inventories) का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। इसमें निजी कंपनियों के स्टोरेज, समुद्री टैंकरों में रखे तेल और सरकारी रिज़र्व शामिल हैं।
लेकिन यह सहारा तेजी से कम हो रहा है। रिपोर्टों के अनुसार संकट के शुरुआती चरण में ही वैश्विक तेल भंडार रिकॉर्ड गति से घटने लगे ।
कुछ अनुमानों के मुताबिक मार्च और अप्रैल के दौरान दुनिया भर के भंडार लगभग 250 मिलियन बैरल घट गए, जो लगभग ढाई दिन की वैश्विक तेल खपत के बराबर है ।
जब भंडार कम होने लगते हैं, तो बाजार किसी भी नए व्यवधान के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील हो जाता है।
कई देशों के पास Strategic Petroleum Reserve (SPR) होता है—यह सरकार द्वारा रखा गया आपातकालीन तेल भंडार है जिसे युद्ध, प्राकृतिक आपदा या बड़े सप्लाई शॉक के समय बाजार में छोड़ा जा सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल अस्थायी राहत देता है। रणनीतिक रिज़र्व स्थायी उत्पादन या निर्यात की जगह नहीं ले सकते; वे केवल बाजार को कुछ समय देते हैं ताकि आपूर्ति सामान्य हो सके ।
यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधा लंबे समय तक बनी रहती है, तो वाणिज्यिक भंडार और सरकारी रिज़र्व दोनों तेजी से खत्म हो सकते हैं।
तेल की कीमतें पहले ही संघर्ष के असर को दिखा चुकी हैं। शुरुआती उछाल में ब्रेंट क्रूड कम $70 के स्तर से बढ़कर $90 के मध्य तक पहुंच गया ।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि फ्यूचर्स मार्केट अभी भी वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शा रहा। कारण यह है कि संघर्ष से पहले रवाना हुए कई तेल टैंकर कई हफ्तों बाद भी दुनिया के विभिन्न बंदरगाहों तक पहुंचते रहे, जिससे असली आपूर्ति कमी देर से दिखाई देती है ।
निवेश बैंक भी चेतावनी दे रहे हैं कि यदि व्यवधान जारी रहा तो कीमतें और ऊपर जा सकती हैं। कुछ अनुमानों के अनुसार ब्रेंट क्रूड $120–$130 प्रति बैरल या उससे अधिक तक जा सकता है, और चरम स्थिति में इससे भी ज्यादा बढ़ सकता है ।
विश्लेषकों की सबसे बड़ी चिंता सिर्फ महंगी ऊर्जा नहीं है बल्कि एक अचानक बाजार बदलाव है।
तेल बाजार अक्सर स्थिर दिखाई देता है जब तक कि भंडार धीरे‑धीरे घटते रहते हैं। लेकिन जब वे परिचालन स्तर से नीचे गिरने लगते हैं, तो खरीदार सीमित उपलब्ध बैरल के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं—और कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं।
जेपी मॉर्गन के विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि स्थिति बनी रही तो विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वाणिज्यिक तेल भंडार ऐसे स्तर तक गिर सकते हैं जो सामान्य बाजार संचालन को बाधित कर सकते हैं ।
यदि आपूर्ति कमी और कीमतों में उछाल जारी रहता है, तो अंततः बाजार का संतुलन डिमांड डिस्ट्रक्शन (Demand Destruction) से आता है। इसका मतलब है कि ऊर्जा इतनी महंगी या दुर्लभ हो जाती है कि लोग और उद्योग उसका उपयोग कम करने लगते हैं।
उदाहरण के लिए:
ऐसी स्थिति में मांग गिरती है और बाजार धीरे‑धीरे स्थिर होता है—लेकिन अक्सर इसके साथ आर्थिक झटके भी आते हैं।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार बाजार फिलहाल तीन अस्थायी सहारों पर टिका हुआ है:
यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधा इतनी देर तक बनी रहती है कि ये सभी बफर खत्म होने लगें, तो तेल बाजार में केवल कीमतों की अस्थिरता नहीं बल्कि वास्तविक आपूर्ति कमी और वैश्विक ईंधन खपत में मजबूरन गिरावट देखने को मिल सकती है।
इसी वजह से कई ऊर्जा विश्लेषक अगले कुछ महीनों को वैश्विक तेल आपूर्ति स्थिरता के लिए सबसे निर्णायक अवधि मान रहे हैं।
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