व्यापार आँकड़ों में इसका असर जल्दी दिखाई दिया। चीन से जापान को भेजे जाने वाले रेयर‑अर्थ स्थायी मैग्नेट की मात्रा अचानक गिर गई और बाद में हल्की बढ़ोतरी के बावजूद उद्योग अब भी कमी की शिकायत कर रहा है .
सबसे अधिक उपयोग होने वाले मैग्नेट नियोडिमियम‑आयरन‑बोरॉन (NdFeB) होते हैं। ये छोटे आकार में भी बेहद शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र पैदा कर सकते हैं, इसलिए उच्च‑प्रदर्शन इलेक्ट्रिक मोटर और कॉम्पैक्ट इलेक्ट्रॉनिक्स में इनका इस्तेमाल होता है।
इनका उपयोग कई क्षेत्रों में होता है, जैसे:
इनके बिना कई आधुनिक तकनीकें उतनी दक्षता से काम ही नहीं कर पातीं।
रेयर‑अर्थ मैग्नेट की कमी जापान के कई प्रमुख उद्योगों को प्रभावित कर रही है:
ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग
EV और हाइब्रिड कारों के ट्रैक्शन मोटर इन मैग्नेट पर निर्भर करते हैं, इसलिए वाहन निर्माताओं और उनके सप्लायरों के लिए आपूर्ति बाधित होना बड़ा जोखिम है।
इलेक्ट्रॉनिक्स और कंपोनेंट निर्माता
सेंसर, कैपेसिटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामग्री बनाने वाली कंपनियाँ भी प्रभावित हैं। उदाहरण के लिए जापानी इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी TDK ने कहा कि चीनी निर्यात प्रतिबंधों के कारण कच्चे माल की खरीद “बेहद कठिन” हो गई है और कंपनी अब वैकल्पिक स्रोत ढूँढ रही है .
रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्र
चूंकि निर्यात नियंत्रण ड्यूल‑यूज़ सामग्री पर केंद्रित हैं, इसलिए रक्षा से जुड़े उद्योग विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
औद्योगिक मशीनरी और रोबोटिक्स
फैक्ट्रियों में इस्तेमाल होने वाले उच्च‑सटीक मोटर और एक्टुएटर भी इन्हीं मैग्नेट पर निर्भर करते हैं।
इसके अलावा 2026 में चीन ने Subaru सहित 20 जापानी संस्थाओं को एक निर्यात‑नियंत्रण वॉचलिस्ट में भी शामिल किया, यह कहते हुए कि ड्यूल‑यूज़ सामग्रियों के अंतिम उपयोग की पुष्टि करना कठिन है .
2010 में इसी तरह के विवाद के बाद जापान ने अपने स्रोत विविध बनाने की कोशिश की थी, लेकिन निर्भरता अब भी काफी अधिक है।
समस्या केवल खनन की नहीं है। रेयर‑अर्थ प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण में चीन की पकड़ और भी मजबूत है—वैश्विक प्रोसेसिंग क्षमता का 90% से अधिक चीन के पास है .
इसका मतलब है कि अगर कच्चा अयस्क किसी और देश में निकाला भी जाए, तो उसे प्रोसेस करने के लिए अक्सर चीन ही जाना पड़ता है।
मौजूदा संकट ने जापान को सप्लाई‑चेन मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है।
1. नए स्रोतों की तलाश
जापानी कंपनियाँ वियतनाम, फिलीपींस और मलेशिया जैसे दक्षिण‑पूर्व एशियाई देशों में खनन और प्रोसेसिंग परियोजनाओं में निवेश कर रही हैं ताकि “चीन‑प्लस” सप्लाई‑चेन बनाई जा सके .
2. सरकारी रणनीति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग
टोक्यो G7 देशों और अन्य साझेदारों के साथ मिलकर महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने की रणनीति पर काम कर रहा है .
3. रीसाइक्लिंग और ‘अर्बन माइनिंग’
पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और औद्योगिक कचरे से रेयर‑अर्थ तत्वों को पुनः प्राप्त करने पर भी जापान ने काफी निवेश किया है।
4. वैकल्पिक तकनीक
कंपनियाँ ऐसे मोटर और मैग्नेट डिज़ाइन विकसित करने पर काम कर रही हैं जिनमें डिस्प्रोसियम और टरबियम जैसे दुर्लभ तत्वों की जरूरत कम हो।
हालाँकि इन प्रयासों को बड़े पैमाने पर लागू होने में समय लगेगा। फिलहाल, रेयर‑अर्थ प्रोसेसिंग और मैग्नेट उत्पादन में चीन की मजबूत स्थिति वैश्विक उद्योगों के लिए एक बड़ा रणनीतिक जोखिम बनी हुई है।
जापान में पैदा हुआ यह संकट सिर्फ दो देशों का व्यापार विवाद नहीं है। यह दिखाता है कि आधुनिक तकनीकी अर्थव्यवस्था—जिसमें इलेक्ट्रिक वाहन, नवीकरणीय ऊर्जा और रक्षा प्रणालियाँ शामिल हैं—कुछ ही महत्वपूर्ण खनिजों और सीमित आपूर्ति स्रोतों पर निर्भर है।
क्योंकि चीन इन सामग्रियों के उत्पादन और प्रोसेसिंग में प्रमुख भूमिका निभाता है, इसलिए निर्यात नियंत्रण जैसे कदम जल्दी ही वैश्विक सप्लाई‑चेन को प्रभावित कर सकते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि 2026 और उसके बाद भी रेयर‑अर्थ बाजार में आपूर्ति बाधाएँ और कीमतों में उतार‑चढ़ाव देखने को मिल सकते हैं .
जापान के लिए यह स्थिति एक स्पष्ट संकेत है: वैकल्पिक स्रोत विकसित करना संभव है, लेकिन चीन के प्रभुत्व को संतुलित करने में अभी समय और भारी निवेश लगेगा।
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