भारत में स्टारलिंक की शुरुआत का मामला सिर्फ़ कंपनी के तैयार होने या लाइसेंस मिलने तक सीमित नहीं है। व्यावसायिक सेवा शुरू करने से पहले सुरक्षा जाँच पूरी होनी है और स्पेक्ट्रम आवंटित होना बाकी है। इसी देरी पर एलन मस्क ने आरोप लगाया कि कुछ कारोबारी हित कंपनी को रोककर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। भारत सरकार ने भेदभाव के आरोप को खारिज किया है। उपलब्ध रिपोर्टिंग से यह साबित नहीं होता कि किसी प्रतिस्पर्धी कंपनी ने मंज़ूरी की प्रक्रिया को प्रभावित किया है; साथ ही, इससे प्रक्रिया के हर पहलू पर उठे सवाल भी अपने-आप हल नहीं होते।
28
31
मस्क का आरोप और सरकार का जवाब
मस्क ने सोशल मीडिया पर आरोप लगाया कि अनाम “ओलिगार्क” स्टारलिंक को भारत में आने से रोककर “एकाधिकार की पकड़” बनाए रखना चाहते हैं। बाद में उन्होंने सवाल किया, “क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?” हालांकि, उन्होंने ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिया जिससे यह साबित हो कि किसी खास कंपनी या व्यक्ति ने मंज़ूरी की प्रक्रिया में दखल दिया है।
19
28
संचार मंत्रालय का कहना है कि भारत का सैटेलाइट संचार नियामक ढाँचा निष्पक्ष और भेदभाव-रहित है। मंत्रालय के अनुसार, स्टारलिंक, रिलायंस समर्थित जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं और स्पेक्ट्रम आवंटन से पहले उनकी सुरक्षा जाँच चल रही है। यह सरकार का प्रक्रिया-विवरण है; अपने-आप में यह हर आवेदन के निपटारे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता।
28
31
लाइसेंस मिलने के बाद भी सेवा क्यों शुरू नहीं हुई?
स्टारलिंक ने भारत में काम करने के लिए 2022 में आवेदन किया था। उसे जून 2025 में टेलीकॉम लाइसेंस मिला और अगले महीने भारत के अंतरिक्ष नियामक से अनुमति मिली। ये अहम मंज़ूरियाँ थीं, लेकिन बाद की रिपोर्टों के मुताबिक व्यावसायिक सेवा शुरू करने के लिए सुरक्षा मंज़ूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन अब भी बाकी हैं।
1
2
5
सुरक्षा जाँच में केवल यह देखना शामिल नहीं है कि कंपनी ने उपकरण लगा दिए हैं या नहीं। रिपोर्टों के अनुसार, नियमों में भारत की ज़मीन पर गेटवे साइटें और वहाँ से कानूनी निगरानी तथा इंटरसेप्शन की व्यवस्था जैसी शर्तें शामिल हैं। नेटवर्क और डेटा के भारत में होने से जुड़ी शर्तें भी रिपोर्ट की गई हैं।
3
स्टारलिंक का कहना है कि उसने भारत में सैकड़ों एंटेना वाली 20 गेटवे साइटें बनाई हैं और भारतीय उपयोगकर्ताओं का डेटा देश के भीतर रखने के लिए नियंत्रण स्थापित किए हैं। ये कंपनी के अपनी तैयारियों के बारे में किए गए दावे हैं—इस बात की पुष्टि नहीं कि नियामकों ने हर सुरक्षा उपाय स्वीकार कर लिया है या जाँच पूरी कर ली है।
4
सुरक्षा चिंताएँ और मिले उपकरणों का सवाल
रिपोर्टों के मुताबिक, 2024 के आख़िर में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह तथा मणिपुर में कार्रवाई के दौरान स्टारलिंक के नाम वाले उपकरण मिले थे। किसी डिश या राउटर पर कंपनी का नाम होना अपने-आप यह साबित नहीं करता कि वह स्टारलिंक के नेटवर्क से जुड़ा था। मस्क का कहना है कि भारत के ऊपर कंपनी के सैटेलाइट बीम बंद हैं।
37
39
42
इन रिपोर्टों ने सुरक्षा उपायों पर ध्यान बढ़ाया है, लेकिन उनसे यह साबित नहीं होता कि लंबित मंज़ूरियों की वजह यही घटनाएँ हैं। कुछ खबरों में अंतिम मंज़ूरियों पर रोक लगाए जाने की बात भी आई है; यह विवरण विवादित है, इसलिए इसे देरी का पुष्ट कारण नहीं माना जाना चाहिए।
5
9
वनवेब भी इंतज़ार में, और एयरटेल-जियो स्टारलिंक के साझेदार
भारती एयरटेल के चेयरमैन सुनील मित्तल ने कहा है कि यूटेलसैट वनवेब भी भारत में सेवा शुरू करने की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रही है। यह सरकार के उस बयान से मेल खाता है कि लाइसेंसधारी कंपनियों की सुरक्षा जाँच चल रही है।
15
31
दूसरी ओर, स्पेसएक्स ने 2025 में एयरटेल और रिलायंस जियो—दोनों के साथ स्टारलिंक सेवाएँ भारत में उपलब्ध कराने के लिए अलग-अलग वितरण समझौते किए थे। ये समझौते सरकारी मंज़ूरी पर निर्भर हैं। इससे यह कहना मुश्किल होता है कि प्रतिस्पर्धी टेलीकॉम समूह एकजुट होकर स्टारलिंक को बाहर रखने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन इन साझेदारियों से यह सवाल भी अपने-आप तय नहीं होता कि मंज़ूरी की प्रक्रिया निष्पक्ष ढंग से लागू की जा रही है या नहीं।
33
34
35
अब तक क्या साफ़ है—और क्या नहीं
रिपोर्टिंग से सबसे स्पष्ट बात यह सामने आती है कि पहले की मंज़ूरियाँ मिलने और भारत में ढाँचा तैयार होने के कंपनी के दावे के बावजूद, स्टारलिंक को व्यावसायिक सेवा शुरू करने के लिए सुरक्षा और स्पेक्ट्रम से जुड़े कदम पूरे करने हैं। भारत कहता है कि बाकी लाइसेंसधारी सैटेलाइट ऑपरेटर भी व्यापक रूप से उसी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। मस्क ने पक्षपात का आरोप लगाया है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टिंग में उस आरोप के समर्थन में प्रमाण नहीं दिया गया है।
4
5
28
31
जब तक लंबित फैसलों और उनकी वजहों पर अधिक जानकारी सामने नहीं आती, विवाद अनसुलझा रहेगा। कंपनी की तैयारी के दावे नियामकीय अनुपालन साबित नहीं करते; वहीं, सरकार का समान व्यवहार का आश्वासन प्रक्रिया से जुड़े हर सवाल का स्वतंत्र जवाब भी नहीं है।