तनाव का सबसे बड़ा कारण आर्मेनिया का यूरोपीय संघ (EU) के साथ संबंध मजबूत करने का प्रयास है। रूस लगातार कह रहा है कि आर्मेनिया एक साथ EU के साथ गहरी आर्थिक साझेदारी और यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (EAEU)—जो रूस के नेतृत्व वाला व्यापारिक समूह है—दोनों में नहीं रह सकता।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने साफ कहा कि EU और EAEU के कस्टम सिस्टम अलग‑अलग हैं, इसलिए किसी देश के लिए दोनों में एक साथ सदस्य होना "परिभाषा के अनुसार असंभव" है।
रूसी अधिकारियों ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर आर्मेनिया EU के साथ आगे बढ़ता है तो उसे आर्थिक नुकसान झेलना पड़ सकता है—जैसे रूसी बाज़ार में बिना शुल्क पहुँच खत्म होना, सस्ती रूसी गैस पर मिलने वाली छूट कम होना और व्यापार या निवेश में गिरावट।
कुछ रूसी नीति‑निर्माताओं ने यह तक संकेत दिया है कि अगर आर्मेनिया EU की ओर पूरी तरह झुकता है तो हवाई उड़ानों और अन्य आर्थिक सहयोग पर भी असर पड़ सकता है।
राजनीतिक चेतावनियों के साथ‑साथ रूस ने ऐसे फैसले भी लिए हैं जिनका सीधा असर आर्मेनियाई निर्यात पर पड़ता है।
हालाँकि रूस इन कदमों को तकनीकी या सुरक्षा से जुड़ा बता रहा है, लेकिन इनका समय—जब दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है—कई पर्यवेक्षकों को इसे आर्थिक दबाव की रणनीति मानने के लिए प्रेरित करता है।
यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आर्मेनिया की अर्थव्यवस्था लंबे समय से रूस से गहराई से जुड़ी हुई है। रूसी बाज़ार, ऊर्जा आपूर्ति और रूस में काम करने वाले आर्मेनियाई श्रमिकों से आने वाला धन देश की अर्थव्यवस्था के लिए अहम है।
रूस का दबाव ऐसे समय में बढ़ा है जब आर्मेनिया में चुनाव नज़दीक हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार पिछले कई महीनों से सोशल मीडिया पर प्रो‑क्रेमलिन दुष्प्रचार अभियान चल रहा है, जिसका उद्देश्य चुनाव से पहले जनमत को प्रभावित करना है।
विश्लेषकों ने सैकड़ों नकली या संपादित वीडियो और कथाएँ पहचानी हैं जो आर्मेनिया की पश्चिम‑समर्थक सरकार को नकारात्मक रूप में दिखाने और राजनीतिक विभाजन को बढ़ाने की कोशिश करती हैं।
इसी दौरान राष्ट्रपति पुतिन ने यह उम्मीद भी जताई कि रूस समर्थक राजनीतिक ताकतें आर्मेनिया के चुनाव में भाग ले सकेंगी और प्रतिस्पर्धा करेंगी।
रूस‑आर्मेनिया तनाव केवल द्विपक्षीय विवाद नहीं है; यह दक्षिण कॉकस क्षेत्र में बदलते भू‑राजनीतिक संतुलन का हिस्सा भी है। हाल के वर्षों में आर्मेनिया ने यूरोपीय संस्थाओं और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने की कोशिश की है, जबकि रूस इस क्षेत्र में अपना पारंपरिक प्रभाव बनाए रखना चाहता है।
मॉस्को के लिए आर्मेनिया का पश्चिम की ओर झुकाव एक रणनीतिक नुकसान हो सकता है। वहीं येरेवन के लिए, रूस के साथ संबंधों में आई खटास के बाद नए अंतरराष्ट्रीय साझेदार ढूँढ़ना अधिक आकर्षक विकल्प बनता जा रहा है।
इसी कारण 7 जून के चुनाव सिर्फ घरेलू राजनीति का मामला नहीं रह गए हैं—वे इस बात की भी परीक्षा बन गए हैं कि आर्मेनिया भविष्य में यूरोप की ओर बढ़ेगा या रूस के प्रभाव क्षेत्र में ही बना रहेगा।
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