जापान अपनी अधिकांश ऊर्जा आयात करता है। इसलिए वैश्विक तेल कीमतों में बदलाव का सीधा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। यदि मध्य‑पूर्व में तनाव या युद्ध के कारण तेल महँगा होता है, तो जापान में मुद्रास्फीति कई रास्तों से बढ़ सकती है:
बैंक ऑफ़ जापान ने भी अपनी आर्थिक रिपोर्ट में कहा है कि अगर तेल की कीमतें ऊँची रहती हैं तो वित्त वर्ष 2026 में जापान की उपभोक्ता मुद्रास्फीति लगभग 2.5% से 3.0% तक जा सकती है, खासकर ऊर्जा और वस्तुओं की कीमतों के कारण।
इससे नीति‑निर्माताओं को चिंता है कि मुद्रास्फीति केवल लक्ष्य तक पहुँचकर स्थिर नहीं होगी, बल्कि उससे ऊपर निकल सकती है।
वित्तीय बाज़ारों ने अब BOJ की अगली चाल पर दांव लगाना शुरू कर दिया है। डेरिवेटिव बाज़ार के कुछ अनुमानों के अनुसार, मई के दौरान जून की बैठक में दर बढ़ाने की संभावना 70% से अधिक आंकी गई थी।
अगर BOJ कदम उठाता है, तो विश्लेषकों के बीच एक अनुमान यह भी है कि नीति दर लगभग 0.75% से बढ़ाकर करीब 1.0% की जा सकती है। हालांकि अंतिम फैसला आने वाले मुद्रास्फीति और वेतन के आंकड़ों पर निर्भर करेगा।
जापान दशकों से बेहद ढीली मौद्रिक नीति—यहाँ तक कि नकारात्मक ब्याज दरों—का उपयोग करता रहा है। इसलिए हर छोटा कदम भी इस लंबे दौर से बाहर निकलने की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
नीतिगत सख्ती की उम्मीदों ने जापान के सरकारी बॉन्ड बाज़ार को पहले ही प्रभावित करना शुरू कर दिया है।
हाल के आंकड़ों के अनुसार:
यील्ड में यह उछाल इस बात का संकेत है कि निवेशक अब यह मानने लगे हैं कि जापान में शून्य के आसपास ब्याज दरों का दौर स्थायी नहीं रहेगा।
जापान की मौद्रिक नीति वैश्विक वित्तीय बाज़ारों के लिए भी बेहद अहम है। वजह यह है कि जापानी निवेशक दुनिया के सबसे बड़े विदेशी बॉन्ड खरीदारों में से हैं।
कुल मिलाकर जापानी निवेशकों के पास लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेज़री बॉन्ड हैं, जिससे जापान अमेरिका का सबसे बड़ा विदेशी ऋणदाता बनता है।
दशकों तक जापान में बेहद कम ब्याज दरों के कारण पेंशन फंड, बीमा कंपनियाँ और अन्य निवेशक बेहतर रिटर्न के लिए विदेशों में निवेश करते रहे।
लेकिन अगर जापान में घरेलू यील्ड बढ़ती हैं, तो यह प्रवृत्ति बदल सकती है।
जापान में ब्याज दरें बढ़ने से:
विश्लेषकों का कहना है कि 2026 की शुरुआत में ही जापानी निवेशकों द्वारा विदेशी प्रतिभूतियों की खरबों येन की शुद्ध बिक्री दर्ज की गई थी, जो संभावित बदलाव का संकेत देती है।
यदि यह रुझान तेज होता है, तो वैश्विक बॉन्ड यील्ड बढ़ सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उधारी महँगी हो सकती है।
जुनको कोएदा की टिप्पणियाँ बैंक ऑफ़ जापान के सामने खड़ी चुनौती को साफ़ दिखाती हैं।
इसलिए दुनिया भर के निवेशकों के लिए मुख्य संदेश यह है: जापान अब वैश्विक ब्याज‑दर चक्र का निष्क्रिय खिलाड़ी नहीं रहा।
अगर जापान धीरे‑धीरे भी दरें बढ़ाता है, तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह, बॉन्ड बाज़ार और वैश्विक उधारी लागत पर पड़ सकता है।
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