अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान अमेरिकी डॉलर अक्सर मजबूत होता है क्योंकि इसे दुनिया की सबसे तरल और भरोसेमंद सुरक्षित परिसंपत्तियों में गिना जाता है। ट्रंप की घोषणा से पहले बाजारों में यह आशंका थी कि अमेरिका सीधे ईरान के ऊर्जा ढांचे पर हमला कर सकता है।
जब यह खतरा अस्थायी रूप से कम हुआ, तो डॉलर में शामिल “सुरक्षित प्रीमियम” कुछ हद तक घट गया। इसी वजह से डॉलर थोड़ा कमजोर हुआ और शेयर जैसे जोखिम वाले एसेट्स में तेजी देखी गई ।
हालांकि यह कमजोरी ज्यादा समय तक नहीं रही। निवेशकों को जल्द ही संदेह होने लगा कि यह विराम लंबे समय तक शांति का संकेत नहीं है। वॉशिंगटन और तेहरान से आने वाले विरोधाभासी संकेतों और जारी संघर्ष ने अनिश्चितता को ऊंचा बनाए रखा ।
जब बाजारों ने महसूस किया कि मध्य पूर्व में तनाव जल्दी खत्म नहीं होगा, तो सुरक्षित परिसंपत्तियों—खासतौर पर डॉलर—की मांग फिर से बढ़ने लगी। इसके बाद के ट्रेडिंग सत्रों में डॉलर ने कुछ मजबूती वापस हासिल कर ली ।
डॉलर की दिशा पर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड (Treasuries) की यील्ड और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीति का भी असर पड़ता है।
तनाव बढ़ने के समय निवेशक अक्सर ट्रेजरी बॉन्ड खरीदते हैं, जिससे उनकी कीमत बढ़ती है और यील्ड घटती है । कम यील्ड डॉलर को अपेक्षाकृत कम आकर्षक बना सकती है क्योंकि डॉलर आधारित निवेश पर मिलने वाला रिटर्न घट जाता है।
साथ ही बाजार यह भी देख रहे थे कि क्या भू‑राजनीतिक जोखिम और आर्थिक आंकड़े फेड को ब्याज दरें घटाने की ओर धकेल सकते हैं। आम तौर पर दरों में कटौती की उम्मीद डॉलर को कमजोर करती है, जबकि सख्त या सावधान फेड नीति डॉलर को समर्थन देती है ।
डॉलर की गिरावट सीमित रहने का एक और कारण अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती थी। मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने संकेत दिया कि फेड को तुरंत आक्रामक दर कटौती करने की जरूरत नहीं है ।
क्योंकि वैश्विक निवेशक अलग‑अलग अर्थव्यवस्थाओं की वृद्धि और ब्याज दर संभावनाओं की तुलना करते हैं, इसलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती ने डॉलर की आकर्षण क्षमता को बनाए रखा।
भले ही हमलों पर अस्थायी विराम लगा, लेकिन व्यापक मध्य पूर्व संघर्ष अभी भी अनसुलझा रहा। खासकर स्ट्रेट ऑफ होरमुज—जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस गुजरता है—से जुड़ी चिंताएं बाजारों को प्रभावित करती रहीं ।
इन जोखिमों के कारण निवेशक डॉलर को अभी भी एक महत्वपूर्ण सुरक्षित निवेश के रूप में देखते रहे। इसलिए बाजार में थोड़ी बहुत जोखिम लेने की भावना आने के बावजूद डॉलर में बड़ी और स्थायी गिरावट नहीं आई।
संक्षेप में, ट्रंप के हमले रोकने के फैसले ने अमेरिकी डॉलर को अल्पकालिक झटका दिया क्योंकि इससे युद्ध और ऊर्जा आपूर्ति संकट का तत्काल खतरा कम दिखाई दिया। लेकिन व्यापक कारक—जैसे जारी भू‑राजनीतिक तनाव, ट्रेजरी यील्ड में उतार‑चढ़ाव, फेड की नीति की उम्मीदें और मजबूत अमेरिकी आर्थिक आंकड़े—डॉलर को समर्थन देते रहे।
इसका परिणाम यह रहा कि घोषणा के बाद डॉलर थोड़ी देर के लिए गिरा, लेकिन जल्द ही स्थिर हो गया क्योंकि निवेशकों ने मध्य पूर्व में जारी अनिश्चितता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूती को ध्यान में रखा ।
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