28 फरवरी 2026 को ऑपरेशन रोअरिंग लायन शुरू होने के छह महीने बाद भी संघर्ष का कोई निर्णायक समाधान या स्थायी शांति नहीं बनी है। मुख्य अनसुलझे मुद्दों में ईरान का परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, निगरानी व्यवस्था और होर्मुज़ जलडमरूमध्य का नियंत्रण शामिल हैं। ईरान पर हमलों, मिसाइल ड्रोन हमलों और...
शोध उत्तर

Create a landscape editorial hero image for this Studio Global article: What has happened in the Iran–Israel–United States conflict during the six months since Israel and the United States launched “Operation Roa. Article summary: Six months on, the conflict appears unresolved rather than settled: the initial U.S.–Israeli campaign achieved substantial military and political shock, but Iran retained retaliatory capacity, regional shipping became a . Topic tags: general, news, general web, user generated. Style: premium digital editorial illustration, source-backed research mood, clean composition, high detail, modern web publication hero. Use reference image context only for broad subject, composition, and topical grounding; do not copy the exact image. Avoid: logos, brand marks, copyrighted characters, real person likenesses, fake screenshots, UI text, readable text, watermarks, charts w
28 फरवरी 2026 को इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ समन्वित हमले शुरू किए थे। छह महीने बाद यह संघर्ष न तो किसी निर्णायक समझौते तक पहुंचा है और न ही स्थायी शांति तक। इज़राइल और वॉशिंगटन ने इसे ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं के खिलाफ जरूरी पूर्व-emptive अभियान बताया, जबकि तेहरान ने इज़राइल और क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले किए। जून में हुए एक समझौता-ज्ञापन ने बातचीत का अस्थायी रास्ता खोला, लेकिन वार्ता अटकने के बाद 17 अगस्त को वह समाप्त हो गया। 17
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इस स्थिति को सबसे सही ढंग से अस्थिर विराम कहा जा सकता है। सैन्य प्रतिरोध, आर्थिक दबाव और दोबारा हमले की धमकी अब भी संघर्ष की दिशा तय कर रहे हैं। इज़राइल यह भी कह चुका है कि अमेरिका और ईरान के बीच नया समझौता हो जाने के बावजूद वह फिर से हमला कर सकता है।
इज़राइल ने ऑपरेशन रोअरिंग लायन को अमेरिकी सेना के साथ चलाया गया ऐसा अभियान बताया जिसका उद्देश्य ईरान के नेतृत्व, सैन्य ढांचे और उस कथित अस्तित्वगत खतरे को कमजोर करना था जिसे वह इज़राइल, क्षेत्र और पूरी दुनिया के लिए खतरा मानता है। 34
44 रॉयटर्स के अनुसार, इज़राइल ने हमले को पूर्व-emptive कार्रवाई के रूप में पेश किया। यह अभियान ऐसे समय शुरू हुआ जब ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर चल रही कूटनीति पहले ही संकट में थी।
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रिपोर्टों के मुताबिक, निशानों में कमांड सेंटर, वायु रक्षा प्रणालियां, मिसाइल ठिकाने, नौसैनिक संसाधन और परमाणु ढांचे से जुड़े केंद्र शामिल थे। 37
43 रॉयटर्स ने ईरानी सरकारी मीडिया के हवाले से बताया कि शुरुआती हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की भी मौत हुई।
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ये दावे हमले शुरू करने वाली सरकारों का आधिकारिक पक्ष बताते हैं। इनसे अपने-आप यह साबित नहीं होता कि ईरान की दीर्घकालिक परमाणु या मिसाइल क्षमता पूरी तरह खत्म हो गई। यही सवाल बाद की कूटनीति के केंद्र में बना रहा।
ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी बलों और क्षेत्र के कई ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों से जवाब दिया। रॉयटर्स ने बाद में बताया कि ईरान ने लंबी दूरी की मिसाइलों का इस्तेमाल किया और इज़राइल के एक परमाणु केंद्र के पास हुए हमले में दर्जनों लोग घायल हुए। 49 एक अन्य रॉयटर्स रिपोर्ट के अनुसार, शुरुआती हमलों के बाद ईरान ने सैकड़ों मिसाइल और ड्रोन छोड़े।
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हालांकि, कुछ रिपोर्टों में बताए गए सटीक आंकड़े—जैसे 200 से अधिक मिसाइल और ड्रोन, 11 मौतें तथा 140 से अधिक घायल—यहां उपलब्ध सबसे मजबूत स्रोतों से लगातार स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं होते। इसलिए इन्हें निश्चित आंकड़ों के बजाय युद्धकालीन दावों के रूप में देखना चाहिए।
ईरान की नौसेना को लेकर भी यही सावधानी जरूरी है। नौसेना के नष्ट होने का दावा और ईरानी अधिकारियों का खंडन दो विरोधी पक्षों की कथाएं हैं। उपलब्ध सामग्री दोनों में से किसी एक के पूरे दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती। सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि शुरुआती अभियान ने ईरान के सैन्य ढांचे को गंभीर नुकसान पहुंचाया, लेकिन ईरान की जवाबी क्षमता पूरी तरह समाप्त होने का प्रमाण नहीं मिला।
लड़ाई का सुरक्षा जोखिम सीधे तौर पर शामिल तीन पक्षों से कहीं आगे फैल गया। अमेरिकी सैनिक और ठिकाने, इज़राइल, खाड़ी देश, समुद्री यातायात और ऊर्जा ढांचा संभावित निशाने या दबाव के केंद्र बन गए। रॉयटर्स ने बताया कि ईरान के हमले उन कम-से-कम सात देशों तक पहुंचे जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने हैं। इज़राइल और संयुक्त अरब अमीरात में भी हताहतों की खबरें सामने आईं। 50
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सक्रिय युद्ध के दौरान नागरिक मौतों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि कठिन होती है। बीबीसी ने ईरान में मानवाधिकारों की निगरानी करने वाले समूह Human Rights Activists in Iran के हवाले से 1,407 मौतों की जानकारी दी, जिनमें 214 बच्चे शामिल थे। रिपोर्ट ने आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि की सीमाओं को भी रेखांकित किया। 52 अन्य स्रोतों ने इससे काफी अलग आंकड़े दिए हैं। इसलिए हताहतों के आंकड़ों को स्रोत के हवाले के साथ पेश करना चाहिए, अंतिम सत्य के रूप में नहीं।
संघर्ष ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को सैन्य तनाव के केंद्र के साथ-साथ कूटनीतिक सौदेबाजी का अहम साधन बना दिया। यह समुद्री मार्ग क्षेत्रीय ऊर्जा आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है। इसके बंद होने या बाधित होने की धमकी ने खाड़ी देशों, व्यापारिक जहाजों और वैश्विक ऊर्जा बाजारों के लिए जोखिम बढ़ा दिया।
जून के अमेरिका-ईरान समझौता-ज्ञापन में जलडमरूमध्य को फिर से खोलना प्रमुख प्रावधानों में शामिल था। इसका उद्देश्य युद्ध रोकना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम तथा प्रतिबंधों में राहत पर बातचीत के लिए समय देना था। 17
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24 इससे स्पष्ट हुआ कि युद्ध का असर केवल मिसाइल हमलों तक सीमित नहीं था; समुद्री आवाजाही और आर्थिक दबाव भी संघर्ष की रणनीति का मुख्य हिस्सा बन चुके थे।
उपलब्ध स्रोत ईरान में युद्ध और प्रतिबंधों से पैदा आर्थिक कठिनाइयों तथा बढ़ते दबाव का समर्थन करते हैं। लेकिन महंगाई, उत्पादन में गिरावट या नागरिकों की आर्थिक बदहाली का सटीक स्तर बताने के लिए पर्याप्त विश्वसनीय आधार उपलब्ध नहीं है। ऐसे आंकड़ों को सावधानी से देखना चाहिए।
पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच 14-सूत्री समझौता-ज्ञापन तैयार हुआ। यह जून में लागू हुआ और इसका उद्देश्य सैन्य अभियान रोकना, होर्मुज़ जलडमरूमध्य की नाकेबंदी से जुड़े विवादों को सुलझाना तथा अंतिम समझौते के लिए 60 दिनों की बातचीत शुरू करना था। 17
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यह व्यवस्था इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि उसने तत्काल सैन्य वृद्धि की जगह बातचीत का ढांचा दिया। लेकिन उसने सबसे कठिन विवादों को हल करने के बजाय आगे के लिए टाल दिया। इनमें शामिल थे:
द गार्जियन के अनुसार, इस ढांचे में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलों पर कोई पाबंदी नहीं थी। 6 Arms Control Association के आकलन में भी इसे मूल रूप से गैर-परमाणु समझौता बताया गया, जो ईरान के परमाणु हथियार तक पहुंचने के रास्तों को अपने-आप बंद नहीं करता था। हालांकि, यह सत्यापन योग्य बातचीत फिर शुरू करने का रास्ता खोल सकता था।
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समझौता घोषित होने के समय रॉयटर्स ने चेतावनी दी थी कि शुरुआती समझ को स्थायी समझौते में बदलना कहीं अधिक कठिन होगा। 17 यह आकलन तब सही साबित हुआ जब बातचीत कमजोर पड़ने के बीच 17 अगस्त को ज्ञापन की अवधि समाप्त हो गई।
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इज़राइल का रुख स्थायी समझौते की राह में सबसे बड़ी अड़चनों में से एक बन गया है। ऊर्जा मंत्री एली कोहेन ने कहा कि यदि तेहरान अपने परमाणु या बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को फिर से खड़ा करता है, तो इज़राइल दोबारा हमला करेगा—भले ही ईरान और अमेरिका के बीच समझौता हो जाए। 5
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यह रुख वॉशिंगटन की कूटनीतिक नीति और इज़राइल की सुरक्षा सोच के बीच मूलभूत अंतर दिखाता है। अमेरिका-ईरान समझौता परमाणु गतिविधियों पर सीमाएं लगा सकता है या समुद्री मार्ग फिर खोल सकता है, लेकिन इज़राइल ने संकेत दिया है कि यदि उसे लगे कि ईरान की क्षमताएं फिर बढ़ रही हैं, तो वह स्वतंत्र रूप से सैन्य कार्रवाई का विकल्प रखेगा।
यह बात इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जून के ढांचे में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक नहीं थी। 6 किसी भी सफल समझौते को इसलिए केवल ईरान की प्रतिबद्धताओं पर निर्भर नहीं रहना होगा। यह भी स्पष्ट करना होगा कि इज़राइल उस समझौते को पर्याप्त मानेगा या नहीं और क्या विश्वसनीय निगरानी व्यवस्था विवादों को फिर से हमलों का कारण बनने से रोक सकती है।
अमेरिका का सार्वजनिक रुख दो तत्वों का मिश्रण रहा है—दोबारा सैन्य कार्रवाई की धमकी और शर्तों के साथ संयम। अगस्त में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि यदि तेजी से ऐसा समझौता हो सके जो ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं को सीमित करे और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर खोल दे, तो अमेरिका एक और हमले से फिलहाल पीछे रहेगा। 1
यह नीति तत्काल नए हमले के बजाय आर्थिक दबाव और दबावपूर्ण कूटनीति को प्राथमिकता देती है, लेकिन सैन्य बल के इस्तेमाल का खतरा खत्म नहीं करती। दूसरी ओर, तेहरान बातचीत और अपनी बची हुई सैन्य क्षमता को इस बात के प्रमाण के रूप में पेश करता है कि वह पराजित नहीं हुआ। इन परस्पर विरोधी व्याख्याओं के कारण भरोसा बनाना और यह तय करना मुश्किल है कि समझौते के पालन का अर्थ क्या होगा।
निकट भविष्य में व्यापक शांति समझौते की तुलना में अस्थिर और दबाव-आधारित विराम की संभावना अधिक दिखती है। शुरुआती हमलों ने ईरान की कमांड संरचना और सैन्य ढांचे को कमजोर किया, लेकिन उसकी जवाबी कार्रवाई ने दिखाया कि संघर्ष सीमाओं के पार फैल सकता है और समुद्री यातायात तथा ऊर्जा मार्गों को खतरे में डाल सकता है। जून के ज्ञापन ने साबित किया कि क्षेत्रीय मध्यस्थता से अस्थायी ढांचा बनाया जा सकता है, लेकिन उसके समाप्त होने से यह भी स्पष्ट हुआ कि मूल मुद्दों पर सहमति बहुत कम है।
स्थायी समाधान के लिए केवल युद्धविराम काफी नहीं होगा। इसके लिए सत्यापन योग्य परमाणु सीमाएं, काम करने योग्य प्रतिबंध-राहत व्यवस्था, बैलिस्टिक मिसाइलों पर स्पष्टता, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही और ऐसी व्यवस्था जरूरी होगी जो इज़राइल की एकतरफा कार्रवाई से युद्ध को फिर शुरू होने से रोक सके। जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, कूटनीति तनाव बढ़ने का जोखिम कम तो कर सकती है, लेकिन उसे पूरी तरह खत्म नहीं कर पाएगी।
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28 फरवरी 2026 को ऑपरेशन रोअरिंग लायन शुरू होने के छह महीने बाद भी संघर्ष का कोई निर्णायक समाधान या स्थायी शांति नहीं बनी है।
28 फरवरी 2026 को ऑपरेशन रोअरिंग लायन शुरू होने के छह महीने बाद भी संघर्ष का कोई निर्णायक समाधान या स्थायी शांति नहीं बनी है। मुख्य अनसुलझे मुद्दों में ईरान का परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत, निगरानी व्यवस्था और होर्मुज़ जलडमरूमध्य का नियंत्रण शामिल हैं।
ईरान पर हमलों, मिसाइल ड्रोन हमलों और नौसेना को हुए नुकसान से जुड़े कई आंकड़े विवादित हैं; इन्हें स्वतंत्र रूप से सत्यापित तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।