यह अंत कूटनीति का पूरी तरह बंद हो जाना नहीं है, लेकिन इससे संघर्ष को सीमित रखने वाला सबसे स्पष्ट अंतरिम ढांचा जरूर हट गया है। अब परमाणु विवाद, प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई और होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला समुद्री व्यापार फिर एक-दूसरे से जुड़ी सौदेबाजी का हिस्सा बन गए हैं।
14 सूत्री इस समझौते का उद्देश्य लड़ाई रोकना और स्थायी समाधान पर बातचीत के लिए समय देना था। इसमें ईरान की परमाणु प्रतिबद्धताओं, अमेरिकी पाबंदियों और होरमुज़ जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाज़ों के लिए फिर खोलने से जुड़े प्रावधान शामिल थे।
60 दिन की बातचीत को आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता था। लेकिन बातचीत जारी रहने की संभावना और समझौते, युद्धविराम या जहाज़रानी प्रावधानों के औपचारिक विस्तार में अंतर है। जब तक वॉशिंगटन और तेहरान इसकी अवधि, शर्तों और दायित्वों की संयुक्त घोषणा नहीं करते, तब तक केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर विस्तार मान लेना उचित नहीं होगा।
समझौते को कायम रखना तब मुश्किल होता गया जब अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे पर शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया और होरमुज़ को फिर खोलने की शर्तों पर सहमति नहीं बन सकी। जुलाई की रिपोर्टों में दोबारा शुरू हुई शत्रुताओं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस घोषणा का उल्लेख था जिसमें उन्होंने शुरुआती युद्धविराम व्यवस्था को “खत्म” बताया।
समयसीमा आते-आते विवाद अंतरिम ढांचे को लागू करने से आगे बढ़कर परस्पर विरोधी मूल मांगों पर आ गया। ईरान ने होरमुज़ को पूरी तरह खोलने को अमेरिकी नीति में बदलाव से जोड़ा, जबकि वॉशिंगटन जलमार्ग पर नियंत्रण और व्यापक रियायतों के लिए दबाव डालता रहा।
इसलिए समस्या केवल राजनीतिक मतभेद की नहीं, बल्कि समझौते को लागू कराने की भी थी। जब दोनों पक्ष किसी डील की एक जैसी व्याख्या स्वीकार न करें, तो वह सैन्य या समुद्री तनाव को भरोसेमंद तरीके से रोक नहीं सकती।
उपलब्ध रिपोर्टों में समझौते की जगह लेने वाली किसी स्पष्ट और पुष्ट नई व्यवस्था का उल्लेख नहीं है। लगातार हमले, एक-दूसरे पर आरोप और प्रतिबद्धताओं का निलंबन या अस्वीकार किया जाना उन व्यावहारिक सीमाओं को कमजोर कर चुका है जिन्हें जून का समझौता बनाना चाहता था।
इससे जानबूझकर व्यापक युद्ध शुरू करने के बजाय किसी घटना के जरिए तनाव बढ़ने का खतरा पैदा होता है। किसी जहाज़ पर हमला, नौसैनिक बलों का आमना-सामना या किसी एक पक्ष से जुड़ी सैन्य कार्रवाई मध्यस्थों के लिए बातचीत बहाल करने की गुंजाइश तेजी से कम कर सकती है।
होरमुज़ इस समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया था। अंतरिम व्यवस्था ने लड़ाई रोकने और सुरक्षित वाणिज्यिक आवाजाही को आपस में जोड़ा, लेकिन बाद की बातचीत इस सवाल पर अटक गई कि जलडमरूमध्य किस व्यवस्था और किस प्राधिकरण के तहत खुलेगा।
ईरान का कहना है कि जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण है। कूटनीति विफल होने पर उसने रक्षात्मक नीति से अधिक आक्रामक रुख अपनाने की चेतावनी भी दी है। पूर्ण और औपचारिक बंदी न होने पर भी ऐसी बयानबाजी जहाज़ संचालकों के लिए अनिश्चितता बढ़ाती है। समयसीमा के आसपास टैंकरों की धीमी आवाजाही और किसी समझौते का न होना पहले ही बाज़ार और सुरक्षा संबंधी चिंता का हिस्सा बन चुका है।
व्यापारिक कंपनियों के लिए जोखिम केवल यह नहीं है कि जलमार्ग कानूनी रूप से खुला है या नहीं। जहाज़ों की सुरक्षा, संभावित देरी, मार्ग बदलने की जरूरत, बीमा लागत और स्थानीय टकराव से आवाजाही बाधित होने की आशंका भी महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध रिपोर्टें बढ़ी हुई अनिश्चितता का संकेत देती हैं, लेकिन तेल की कीमतों के किसी निश्चित भविष्य के परिणाम को साबित नहीं करतीं।
खाड़ी देश, ऊर्जा आयातक और नौसैनिक शक्तियां अब कठिन संतुलन का सामना कर रही हैं। वे वाणिज्यिक जहाज़रानी की सुरक्षा करना चाहेंगे, लेकिन होरमुज़ के आसपास सैन्य गतिविधियों को तेहरान जलमार्ग पर अमेरिकी नियंत्रण थोपने की कोशिश के रूप में पेश कर सकता है। इस टूटन से क्षेत्रीय सरकारों पर दबाव बढ़ता है और पुष्ट युद्धविराम से मिलने वाली पूर्वानुमेयता कम होती है।
जोखिम केवल तेल टैंकरों तक सीमित नहीं हैं। बंदरगाह, नौसैनिक बल, वाणिज्यिक जहाज़ और संघर्ष से जुड़े अन्य पक्ष भी निशाना बन सकते हैं या तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाई का स्रोत बन सकते हैं। ये संभावित जोखिम हैं—इस बात का प्रमाण नहीं कि हर घटना निश्चित रूप से होगी।
भविष्य की डील की संभावना खत्म नहीं हुई है, लेकिन अंतरिम प्रक्रिया की विफलता ने रास्ता कठिन बना दिया है। जून के समझौते ने बातचीत के लिए एक समय-सीमा बनाई थी; उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों, समुद्री पहुंच या उल्लंघनों की निगरानी से जुड़े मूल विवादों को हल नहीं किया था।
किसी अधिक टिकाऊ प्रक्रिया के लिए कम-से-कम इन बिंदुओं की जरूरत पड़ सकती है:
ये वे कमियां हैं जो अंतरिम समझौते के टूटने से सामने आई हैं; इन्हें किसी नई डील की तय शर्तें नहीं समझना चाहिए। अमेरिका और ईरान इन बुनियादी व्यवस्थाओं पर सहमत हो पाएंगे या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कूटनीति साझा ढांचा बना पाती है या दोनों देश केवल अपनी-अपनी सार्वजनिक मांगें दोहराते रहते हैं।
60-दिवसीय समझौता उस स्थायी समाधान तक नहीं पहुंच सका जिसके लिए उसे बनाया गया था। इसके खत्म होने से नई कूटनीतिक पहल असंभव नहीं हुई है, लेकिन अगला कदम पहले से कठिन हो गया है: युद्धविराम की विश्वसनीयता कम हुई है, होरमुज़ पर विवाद बढ़ा है, वाणिज्यिक जहाज़रानी अधिक अनिश्चित हो गई है और व्यापक समझौते की संभावना अब भरोसा तथा सत्यापन दोबारा बनाने पर निर्भर है।
इसलिए विस्तार की देर से आई खबरों को तब तक सावधानी से देखना चाहिए, जब तक वॉशिंगटन और तेहरान संयुक्त रूप से उसकी अवधि, शर्तों और दायित्वों की घोषणा न करें। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर समयसीमा तक कोई स्पष्ट प्रतिस्थापन समझौता लागू नहीं हुआ था।
यह अंत कूटनीति का पूरी तरह बंद हो जाना नहीं है, लेकिन इससे संघर्ष को सीमित रखने वाला सबसे स्पष्ट अंतरिम ढांचा जरूर हट गया है। अब परमाणु विवाद, प्रतिबंध, सैन्य कार्रवाई और होरमुज़ जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाला समुद्री व्यापार फिर एक-दूसरे से जुड़ी सौदेबाजी का हिस्सा बन गए हैं।
14 सूत्री इस समझौते का उद्देश्य लड़ाई रोकना और स्थायी समाधान पर बातचीत के लिए समय देना था। इसमें ईरान की परमाणु प्रतिबद्धताओं, अमेरिकी पाबंदियों और होरमुज़ जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक जहाज़ों के लिए फिर खोलने से जुड़े प्रावधान शामिल थे।
60 दिन की बातचीत को आपसी सहमति से आगे बढ़ाया जा सकता था। लेकिन बातचीत जारी रहने की संभावना और समझौते, युद्धविराम या जहाज़रानी प्रावधानों के औपचारिक विस्तार में अंतर है। जब तक वॉशिंगटन और तेहरान इसकी अवधि, शर्तों और दायित्वों की संयुक्त घोषणा नहीं करते, तब तक केवल मीडिया रिपोर्टों के आधार पर विस्तार मान लेना उचित नहीं होगा।
समझौते को कायम रखना तब मुश्किल होता गया जब अमेरिका और ईरान ने एक-दूसरे पर शर्तों के उल्लंघन का आरोप लगाया और होरमुज़ को फिर खोलने की शर्तों पर सहमति नहीं बन सकी। जुलाई की रिपोर्टों में दोबारा शुरू हुई शत्रुताओं और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उस घोषणा का उल्लेख था जिसमें उन्होंने शुरुआती युद्धविराम व्यवस्था को “खत्म” बताया।
समयसीमा आते-आते विवाद अंतरिम ढांचे को लागू करने से आगे बढ़कर परस्पर विरोधी मूल मांगों पर आ गया। ईरान ने होरमुज़ को पूरी तरह खोलने को अमेरिकी नीति में बदलाव से जोड़ा, जबकि वॉशिंगटन जलमार्ग पर नियंत्रण और व्यापक रियायतों के लिए दबाव डालता रहा।
इसलिए समस्या केवल राजनीतिक मतभेद की नहीं, बल्कि समझौते को लागू कराने की भी थी। जब दोनों पक्ष किसी डील की एक जैसी व्याख्या स्वीकार न करें, तो वह सैन्य या समुद्री तनाव को भरोसेमंद तरीके से रोक नहीं सकती।
उपलब्ध रिपोर्टों में समझौते की जगह लेने वाली किसी स्पष्ट और पुष्ट नई व्यवस्था का उल्लेख नहीं है। लगातार हमले, एक-दूसरे पर आरोप और प्रतिबद्धताओं का निलंबन या अस्वीकार किया जाना उन व्यावहारिक सीमाओं को कमजोर कर चुका है जिन्हें जून का समझौता बनाना चाहता था।
इससे जानबूझकर व्यापक युद्ध शुरू करने के बजाय किसी घटना के जरिए तनाव बढ़ने का खतरा पैदा होता है। किसी जहाज़ पर हमला, नौसैनिक बलों का आमना-सामना या किसी एक पक्ष से जुड़ी सैन्य कार्रवाई मध्यस्थों के लिए बातचीत बहाल करने की गुंजाइश तेजी से कम कर सकती है।
होरमुज़ इस समझौते की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया था। अंतरिम व्यवस्था ने लड़ाई रोकने और सुरक्षित वाणिज्यिक आवाजाही को आपस में जोड़ा, लेकिन बाद की बातचीत इस सवाल पर अटक गई कि जलडमरूमध्य किस व्यवस्था और किस प्राधिकरण के तहत खुलेगा।
ईरान का कहना है कि जलडमरूमध्य पर उसका नियंत्रण है। कूटनीति विफल होने पर उसने रक्षात्मक नीति से अधिक आक्रामक रुख अपनाने की चेतावनी भी दी है। पूर्ण और औपचारिक बंदी न होने पर भी ऐसी बयानबाजी जहाज़ संचालकों के लिए अनिश्चितता बढ़ाती है। समयसीमा के आसपास टैंकरों की धीमी आवाजाही और किसी समझौते का न होना पहले ही बाज़ार और सुरक्षा संबंधी चिंता का हिस्सा बन चुका है।
व्यापारिक कंपनियों के लिए जोखिम केवल यह नहीं है कि जलमार्ग कानूनी रूप से खुला है या नहीं। जहाज़ों की सुरक्षा, संभावित देरी, मार्ग बदलने की जरूरत, बीमा लागत और स्थानीय टकराव से आवाजाही बाधित होने की आशंका भी महत्वपूर्ण हैं। उपलब्ध रिपोर्टें बढ़ी हुई अनिश्चितता का संकेत देती हैं, लेकिन तेल की कीमतों के किसी निश्चित भविष्य के परिणाम को साबित नहीं करतीं।
खाड़ी देश, ऊर्जा आयातक और नौसैनिक शक्तियां अब कठिन संतुलन का सामना कर रही हैं। वे वाणिज्यिक जहाज़रानी की सुरक्षा करना चाहेंगे, लेकिन होरमुज़ के आसपास सैन्य गतिविधियों को तेहरान जलमार्ग पर अमेरिकी नियंत्रण थोपने की कोशिश के रूप में पेश कर सकता है। इस टूटन से क्षेत्रीय सरकारों पर दबाव बढ़ता है और पुष्ट युद्धविराम से मिलने वाली पूर्वानुमेयता कम होती है।
जोखिम केवल तेल टैंकरों तक सीमित नहीं हैं। बंदरगाह, नौसैनिक बल, वाणिज्यिक जहाज़ और संघर्ष से जुड़े अन्य पक्ष भी निशाना बन सकते हैं या तनाव बढ़ाने वाली कार्रवाई का स्रोत बन सकते हैं। ये संभावित जोखिम हैं—इस बात का प्रमाण नहीं कि हर घटना निश्चित रूप से होगी।
भविष्य की डील की संभावना खत्म नहीं हुई है, लेकिन अंतरिम प्रक्रिया की विफलता ने रास्ता कठिन बना दिया है। जून के समझौते ने बातचीत के लिए एक समय-सीमा बनाई थी; उसने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों, समुद्री पहुंच या उल्लंघनों की निगरानी से जुड़े मूल विवादों को हल नहीं किया था।
किसी अधिक टिकाऊ प्रक्रिया के लिए कम-से-कम इन बिंदुओं की जरूरत पड़ सकती है:
ये वे कमियां हैं जो अंतरिम समझौते के टूटने से सामने आई हैं; इन्हें किसी नई डील की तय शर्तें नहीं समझना चाहिए। अमेरिका और ईरान इन बुनियादी व्यवस्थाओं पर सहमत हो पाएंगे या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कूटनीति साझा ढांचा बना पाती है या दोनों देश केवल अपनी-अपनी सार्वजनिक मांगें दोहराते रहते हैं।
60-दिवसीय समझौता उस स्थायी समाधान तक नहीं पहुंच सका जिसके लिए उसे बनाया गया था। इसके खत्म होने से नई कूटनीतिक पहल असंभव नहीं हुई है, लेकिन अगला कदम पहले से कठिन हो गया है: युद्धविराम की विश्वसनीयता कम हुई है, होरमुज़ पर विवाद बढ़ा है, वाणिज्यिक जहाज़रानी अधिक अनिश्चित हो गई है और व्यापक समझौते की संभावना अब भरोसा तथा सत्यापन दोबारा बनाने पर निर्भर है।
इसलिए विस्तार की देर से आई खबरों को तब तक सावधानी से देखना चाहिए, जब तक वॉशिंगटन और तेहरान संयुक्त रूप से उसकी अवधि, शर्तों और दायित्वों की घोषणा न करें। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर समयसीमा तक कोई स्पष्ट प्रतिस्थापन समझौता लागू नहीं हुआ था।