इज़रायली पुलिस के अनुसार, 4 सितंबर को तड़के करीब 3:45 बजे पूर्वी यरुशलम के 33 वर्षीय निवासी इब्राहिम अल-हेंदी को दमिश्क गेट के पास गोली मारी गई। पुलिस का कहना था कि उन्होंने बॉर्डर पुलिस के जवानों पर चाकू से हमला करने की कोशिश की थी। फ़िलिस्तीनी रिपोर्टिंग ने अल-हेंदी को बैत हनीना का निवासी बताया और चाकू मारने के प्रयास को पुलिस के दावे के रूप में पेश किया। घटनास्थल पर ही उनकी मौत की पुष्टि की गई। उपलब्ध रिपोर्टिंग इस कथित चाकू हमले की परिस्थितियों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करती।
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गोलीबारी के बाद इज़रायली बलों ने दमिश्क गेट और यरुशलम के पुराने शहर के आसपास अपनी तैनाती बढ़ा दी। फ़िलिस्तीनी सूत्रों के मुताबिक, सैन्य घेराबंदी और कड़े आवागमन प्रतिबंधों से लोगों को सुबह-सुबह की नमाज के लिए पहुंचने में कठिनाई हुई।
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कुसरा में क्या स्थिति थी?
पश्चिमी तट में नाब्लुस के पास कुसरा से आई अलग रिपोर्टों में कहा गया कि 9 अगस्त से तीन फ़िलिस्तीनी परिवारों के घरों को बसने वालों ने घेर रखा था। शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार, पानी और बिजली की आपूर्ति काट दी गई थी तथा घरों में मौजूद लोगों को सुरक्षित ढंग से बाहर निकलने या जरूरी सामान हासिल करने में परेशानी हुई।
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4 सितंबर की रिपोर्टों में इसे घेराबंदी का 28वां दिन बताया गया। इन रिपोर्टों के अनुसार, इज़रायली सेना ने क्षेत्र को “क्लोज़्ड मिलिट्री ज़ोन” घोषित किया था, यानी वहां प्रवेश और आवाजाही सीमित कर दी गई थी। आरोप था कि इससे परिवारों का घरों में आना-जाना रोका गया। पीस नाउ और समकालीन समाचार रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 100 शांति कार्यकर्ता भोजन और दवाइयां लेकर पहुंचे, लेकिन उन्हें घरों तक जाने नहीं दिया गया।
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हालांकि स्थिति को लेकर एक महत्वपूर्ण संदर्भ भी है। संयुक्त राष्ट्र ने 17 अगस्त को कहा था कि मानवीय सहायता दल परिवारों तक पहुंचे थे और पानी, भोजन, दवाइयां तथा अन्य सामग्री दी गई थी। इससे संकेत मिलता है कि इस पूरे प्रकरण के दौरान कुछ चरणों में पहुंच की स्थितियां बदलीं, भले ही 4 सितंबर की रिपोर्टों में घरों के आसपास लगातार प्रतिबंधों का उल्लेख था।
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दोनों घटनाओं में आवाजाही क्यों केंद्र में रही
दमिश्क गेट और कुसरा अलग जगहों और अलग परिस्थितियों के मामले हैं, लेकिन दोनों में सुरक्षा तैनाती के व्यावहारिक असर—फ़िलिस्तीनियों की आवाजाही पर रोक—का मुद्दा सामने आया। यरुशलम में इसका कथित असर सुबह की नमाज के लिए जा रहे लोगों पर पड़ा; कुसरा में परिवारों के बाहर निकलने और बाहरी समर्थकों के सहायता पहुंचाने पर।
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इज़रायली पुलिस और सैन्य अधिकारियों ने इन उपायों के लिए सुरक्षा संबंधी वजहें बताईं। कुसरा में आईडीएफ पहले कह चुकी थी कि इलाका बंद सैन्य क्षेत्र है। सहायता पहुंचाने की एक शुरुआती कोशिश के दौरान उसने निवासियों के इस आरोप से भी इनकार किया था कि कार्यकर्ताओं को सीधे सामान देने से रोका गया।
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व्यापक तनाव और अलग-अलग आंकड़े
कुसरा की घटनाएं पश्चिमी तट में बसने वालों की हिंसा और इज़रायली सैन्य अभियानों की व्यापक रिपोर्टों के बीच सामने आईं। इनमें नाब्लुस और जनीन में छापों तथा हिरासत में लिए जाने की खबरें भी शामिल थीं।
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हिंसा के आंकड़े रिपोर्टिंग संस्था, कटऑफ तारीख और परिभाषाओं के आधार पर काफी अलग हैं। अगस्त के मध्य में फ़िलिस्तीनी अधिकारियों ने 2026 में बसने वालों के 1,476 हमले दर्ज किए जाने की बात कही थी।
53 संयुक्त राष्ट्र ने कहा कि 10 अगस्त तक उसने उस वर्ष 1,430 से अधिक घटनाएं दर्ज की थीं और बसने वालों की हिंसा, ध्वस्तीकरण तथा बेदखली के कारण लगभग 3,800 फ़िलिस्तीनियों के विस्थापित होने का उल्लेख किया था।
55 बाद में एक फ़िलिस्तीनी आयोग ने 2026 के पहले सात महीनों में 4,113 हमलों का आंकड़ा बताया।
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इन संख्याओं को सीधे एक-दूसरे के बराबर नहीं माना जाना चाहिए, क्योंकि इनके स्रोत, तारीखें और घटनाओं की परिभाषाएं अलग हैं। फिर भी, ये रिपोर्टें इस निष्कर्ष का समर्थन करती हैं कि 2026 में पश्चिमी तट में हिंसा और विस्थापन का स्तर ऊंचा था।
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हकाबी की असामान्य रूप से कड़ी टिप्पणी
इज़रायल में अमेरिकी राजदूत माइक हकाबी ने कुसरा की घेराबंदी को “आतंक का भयावह कृत्य” कहा और जिम्मेदार लोगों को “इज़रायली आतंकवादी” बताया। उनके दूतावास ने कहा कि उसने इज़रायली सेना और पुलिस से उन्हें हटाने के लिए दबाव डाला था।
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हकाबी की टिप्पणी इसलिए भी ध्यान खींचने वाली थी क्योंकि वे इज़रायली बस्तियों के समर्थन से सार्वजनिक रूप से जुड़े रहे हैं। इन टिप्पणियों से कुसरा में पहुंच संबंधी प्रतिबंध समाप्त नहीं हुए और न ही हर आरोप की जिम्मेदारी तय हुई, लेकिन यह घेराबंदी पर अमेरिका की असाधारण रूप से तीखी कूटनीतिक प्रतिक्रिया थी।
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