वीडियो के प्रसारित होने के बाद कई यूरोपीय नेताओं और सांसदों ने इसकी कड़ी आलोचना की। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने कहा कि वीडियो में दिखाया गया व्यवहार उन्हें “हैरान और स्तब्ध” कर देने वाला लगा।
यूरोप के कई सांसदों और अधिकारियों ने भी कहा कि हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं के साथ ऐसा व्यवहार मानवीय मूल्यों के अनुरूप नहीं है। कुछ नेताओं ने इस मामले में औपचारिक कूटनीतिक कार्रवाई या प्रतिबंधों की मांग भी उठाई।
इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो तायानी ने तो यूरोपीय संघ से सीधे बेन‑ग्विर पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करने की अपील की। उनका कहना था कि कार्यकर्ताओं को “उत्पीड़न और अपमान” का सामना करना पड़ा।
विवाद केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा। खबरों के मुताबिक कम से कम 11 देशों ने विरोध दर्ज कराने के लिए अपने यहां तैनात इज़राइली राजदूतों या राजनयिक प्रतिनिधियों को तलब किया।
इन देशों ने आधिकारिक तौर पर स्पष्टीकरण मांगा और वीडियो में दिखाए गए व्यवहार की निंदा की। उदाहरण के तौर पर फ्रांस ने भी इज़राइल के राजदूत को बुलाकर इस व्यवहार को अस्वीकार्य बताया।
पोलैंड ने इस मामले में विशेष रूप से सख्त रुख अपनाया। वारसॉ में इज़राइल के कार्यवाहक राजनयिक को तलब किया गया और हिरासत में लिए गए कार्यकर्ताओं—जिनमें पोलिश नागरिक भी शामिल थे—की रिहाई की मांग की गई।
पोलैंड के अधिकारियों ने यह भी कहा कि वे बेन‑ग्विर पर देश में प्रवेश प्रतिबंध (entry ban) लगाने की प्रक्रिया शुरू करना चाहते हैं। इस कदम का कारण वही वीडियो और उसमें दिखाया गया व्यवहार बताया गया।
जैसे‑जैसे अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ा, इज़राइल ने हिरासत में लिए गए फ्लोटिला प्रतिभागियों को रिहा कर उन्हें देश से बाहर भेजना शुरू किया। मानवाधिकार संगठन अदाला के अनुसार अधिकतर लोगों को दक्षिणी इज़राइल के रैमोन एयरपोर्ट से उनके देशों के लिए भेजा गया।
रिपोर्टों के अनुसार फ्लोटिला के सभी प्रतिभागियों को अंततः निर्वासित किए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी।
यह घटना दिखाती है कि आधुनिक कूटनीति में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी संवेदनशील हो चुकी है। गाज़ा की ओर जा रहे सहायता काफिले को रोकना, अंतरराष्ट्रीय कार्यकर्ताओं की हिरासत, और फिर एक वरिष्ठ मंत्री द्वारा उनका मज़ाक उड़ाते हुए वीडियो पोस्ट करना—इन सबके संयोजन ने इस मामले को जल्दी ही वैश्विक विवाद में बदल दिया।
परिणामस्वरूप यूरोप और अन्य देशों में न केवल सार्वजनिक आलोचना हुई, बल्कि राजनयिक तलब, प्रतिबंधों की मांग और यात्रा प्रतिबंध जैसे कदमों पर भी चर्चा शुरू हो गई।
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