स्थानीय रिपोर्टों में इस सत्र को युवाओं, टेक्नोलॉजी, शिक्षा सुधार, इनोवेशन और अफ्रीका के डिजिटल भविष्य से जुड़े संवाद के रूप में बताया गया । कुछ अन्य रिपोर्टों ने इसे संस्कृति, कलाकारों और युवा वक्ताओं वाले सत्र के रूप में पेश किया
। लेकिन मूल बात एक ही थी: मैक्रों को लगा कि दर्शकों की बातचीत मंच पर बोल रहे लोगों की आवाज़ दबा रही है
।
MarketScreener पर प्रकाशित प्रतिलिपि के अनुसार, मैक्रों ने हॉल से कहा:
“माफ कीजिए, सब लोग। Hey, hey, hey. मुझे खेद है, लेकिन इतने शोर में संस्कृति पर बात करना असंभव है, जब इतने प्रेरित लोग यहाँ भाषण देने आए हैं। यह सम्मान की पूरी कमी है। अगर आप द्विपक्षीय बातचीत करना चाहते हैं या किसी और विषय पर बात करना चाहते हैं, तो आपके पास अलग कमरे हैं या आप बाहर जा सकते हैं। अगर आप यहाँ रहना चाहते हैं, तो हम लोगों को सुनते हैं और उसी नियम से चलते हैं।”
कई रिपोर्टों ने इसी केंद्रीय पंक्ति — “a total lack of respect” — को प्रमुखता से उद्धृत किया और लिखा कि मैक्रों दर्शकों से मंच पर बोल रहे लोगों के दौरान साइड बातचीत रोकने को कह रहे थे ।
सीधी बात यह है कि मैक्रों किसी वास्तविक व्यवधान पर प्रतिक्रिया दे रहे थे: कई रिपोर्टों में कहा गया कि शोर या साइड बातचीत के कारण वक्ताओं को सुनना मुश्किल हो रहा था । लेकिन वीडियो सिर्फ “कृपया शांति रखें” की कहानी बनकर नहीं फैला। यह सत्ता, भाषा और प्रतीकवाद की कहानी बन गया।
ऑनलाइन आलोचना में यह सवाल उठा कि एक फ्रांसीसी राष्ट्रपति का अफ्रीकी मंच पर सार्वजनिक रूप से दर्शकों को डाँटना कैसा संदेश देता है, खासकर तब जब वही समिट फ्रांस-अफ्रीका रिश्तों को कम पदानुक्रमित और अधिक बराबरी वाला दिखाने के लिए आयोजित थी ।
Associated Press ने Africa Forward Summit को फ्रांस की नई अफ्रीका नीति का प्रदर्शन बताया — यानी एक ऐसी कोशिश जिसमें फ्रांस, पूर्व औपनिवेशिक शक्ति के रूप में “हावी” दिखने वाली छवि से हटकर “बराबरी की साझेदारी” का दावा कर रहा है । इसी संदर्भ में Irish Times ने लिखा कि नैरोबी का वायरल डाँट वाला क्षण फ्रांस के अफ्रीका-रीसेट के लिए “बेसुरा” साबित हुआ
।
मैक्रों की केन्या यात्रा किसी अकेले आयोजन का हिस्सा नहीं थी। यह फ्रांस की उस व्यापक कोशिश से जुड़ी थी जिसमें वह अफ्रीका में अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करना चाहता है। Le Monde के मुताबिक, मैक्रों सत्ता में आए थे तो उन्होंने फ्रांस और उसके पूर्व उपनिवेशों के रिश्ते बदलने का वादा किया था, लेकिन संकटों, गलतफहमियों, निराशाओं और झटकों ने इस परियोजना को बार-बार पटरी से उतारा ।
केन्या का चुनाव भी प्रतीकात्मक था। यह समिट एक अंग्रेज़ी-भाषी अफ्रीकी देश में हो रही थी, यानी फ्रांस के पारंपरिक फ्रांकोफोन प्रभाव-क्षेत्र — जहाँ फ्रेंच भाषा और फ्रांसीसी प्रभाव ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहे — से दूर । मैक्रों ने केन्या में यह भी कहा कि फ्रांकोफोन अफ्रीका में फ्रांस के पुराने “sphere of influence” यानी प्रभाव-क्षेत्र का दौर खत्म हो चुका है
।
यह संदेश आसान पृष्ठभूमि में नहीं दिया जा रहा था। AP ने लिखा कि समिट के दौरान पश्चिम अफ्रीका से फ्रांसीसी सैनिकों की वापसी, जो पिछले साल पूरी हुई, और क्षेत्र में फ्रांस के घटते प्रभाव पर भी ध्यान जाना तय था । Africanews के अनुसार, मैक्रों ने नैरोबी में यूरोप की अफ्रीका में भूमिका का बचाव किया, चीन के दृष्टिकोण से तुलना की, और कहा कि अफ्रीका की आज की चुनौतियों को केवल औपनिवेशिक अतीत से नहीं जोड़ा जा सकता — हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि 2017 में सत्ता संभालने के बाद उन्होंने औपनिवेशिकता की कड़ी निंदा की थी
।
नैरोबी की घटना को एक स्तर पर बहुत सामान्य कहा जा सकता है: हॉल में शोर था, वक्ता बाधित हो रहे थे, और मैक्रों ने शांति की माँग की। लेकिन कूटनीति में सिर्फ शब्द नहीं, मुद्रा और दृश्य भी मायने रखते हैं।
समस्या यह नहीं थी कि मैक्रों ने चुप रहने को कहा। समस्या यह बनी कि बराबरी की साझेदारी दिखाने वाले मंच पर फ्रांस के राष्ट्रपति का अफ्रीकी दर्शकों को इस तरह डाँटना कई लोगों को उसी पुराने असंतुलन की याद दिला गया, जिसे फ्रांस पीछे छोड़ने की बात कर रहा है ।
Comments
0 comments