एस्टोनिया के रक्षा मंत्री हन्नो पेवकुर ने कहा कि ड्रोन की दिशा को देखते हुए उसे गिराना जरूरी था ताकि देश के हवाई क्षेत्र के लिए कोई खतरा न रहे।
बाद में यूक्रेन ने इस घटना के लिए माफी मांगी और इसे “अनजाने में हुआ हादसा” बताया। अधिकारियों का मानना है कि ड्रोन मूल रूप से रूस के अंदर किसी लक्ष्य की ओर जा रहा था लेकिन रास्ता भटक गया।
कई रिपोर्टों के अनुसार यूक्रेन युद्ध के दौरान यह पहला मामला है जब बाल्टिक क्षेत्र में नाटो के किसी लड़ाकू विमान ने संदिग्ध यूक्रेनी ड्रोन को गिराया।
यूक्रेन और बाल्टिक देशों के कुछ अधिकारियों का कहना है कि रूस की इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (Electronic Warfare) तकनीक ड्रोन के नेविगेशन सिस्टम में दखल देकर उन्हें गलत दिशा में भेज सकती है।
ड्रोन आमतौर पर सैटेलाइट आधारित नेविगेशन पर निर्भर होते हैं। यदि कोई देश जैमिंग (सिग्नल बाधित करना) या स्पूफिंग (झूठा सिग्नल भेजना) जैसी तकनीक का इस्तेमाल करे, तो ड्रोन की दिशा बदल सकती है।
रिपोर्टों में कहा गया है कि यूक्रेन जिन ड्रोन हमलों से रूस के उत्तर‑पश्चिमी लेनिनग्राद क्षेत्र के बंदरगाहों और तेल सुविधाओं को निशाना बना रहा है, वे कभी‑कभी भारी इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के कारण रास्ता बदल देते हैं।
यूक्रेनी अधिकारियों का यह भी आरोप है कि रूस जानबूझकर कुछ ड्रोन को नाटो देशों की दिशा में मोड़ देता है ताकि राजनीतिक दबाव और प्रचार का माहौल बनाया जा सके।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर घटना का तकनीकी कारण तुरंत तय करना आसान नहीं होता—यह इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप, तकनीकी खराबी या ऑपरेशन की त्रुटि भी हो सकती है।
रूस ने आरोप लगाया है कि यूक्रेन बाल्टिक देशों की जमीन से हमले करता है। लेकिन लातविया, लिथुआनिया और एस्टोनिया ने इन आरोपों को सख्ती से खारिज किया है।
इन देशों का कहना है कि उनके क्षेत्र से यूक्रेन द्वारा हमले किए जाने का कोई सबूत नहीं है। बाल्टिक सरकारें इसे मॉस्को की राजनीतिक और प्रचार रणनीति का हिस्सा बताती हैं।
ड्रोन घटनाओं के दौरान इन देशों ने एहतियाती कदम भी उठाए। उदाहरण के लिए, एक मामले में लातविया ने संभावित ड्रोन घुसपैठ की चेतावनी जारी की और सीमा के पास रहने वाले लोगों को घरों के अंदर रहने को कहा।
एस्टोनिया की यह घटना अकेली नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार लगभग दो महीनों में बाल्टिक क्षेत्र में करीब एक दर्जन ड्रोन घटनाएँ हुई हैं—जिनमें दुर्घटनाएँ, मार गिराए गए ड्रोन या हवाई क्षेत्र में घुसपैठ शामिल हैं।
कई मामलों में यूक्रेन के वे ड्रोन जो रूस के बाल्टिक तट के पास स्थित रणनीतिक ढाँचों को निशाना बना रहे थे, रास्ता बदलकर एस्टोनिया, लातविया या लिथुआनिया की ओर पहुँच गए।
यह स्थिति दिखाती है कि नाटो देशों का क्षेत्र रूस के उन रणनीतिक ठिकानों के बहुत करीब है जिन्हें यूक्रेन अपने लंबी दूरी के हमलों में निशाना बनाता है।
नाटो के लिए ऐसी घटनाएँ एक बड़ी चुनौती हैं। एयर‑पोलिसिंग बलों को बहुत कम समय में तय करना पड़ता है कि कोई अज्ञात ड्रोन दुर्घटनावश आया है, तकनीकी रूप से भटका है या जानबूझकर भेजा गया खतरा है।
इस तरह की अनिश्चितता गलत आकलन या तनाव बढ़ने का जोखिम बढ़ाती है—खासकर तब जब पास ही सक्रिय युद्ध चल रहा हो।
यूक्रेन के लिए चिंता अलग है। यदि इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप के कारण ड्रोन अक्सर रास्ता बदलते हैं, तो रूस के तेल ढाँचे और बंदरगाहों पर उसकी लंबी दूरी की ड्रोन रणनीति कम भरोसेमंद हो सकती है—और राजनीतिक रूप से संवेदनशील भी, खासकर जब ड्रोन नाटो देशों में पहुँच जाएँ।
बाल्टिक क्षेत्र धीरे‑धीरे एक ऐसे “ग्रे ज़ोन” में बदल रहा है जहाँ हवाई सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध और भू‑राजनीतिक संकेत एक‑दूसरे से टकरा रहे हैं।
हर नई ड्रोन घटना नाटो को दो मुश्किल विकल्पों के बीच संतुलन बनाने पर मजबूर करती है—तेज़ सुरक्षा कार्रवाई या तनाव बढ़ने से बचने के लिए संयम। साथ ही यह भी दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में ड्रोन और इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप किस तरह युद्धक्षेत्र और सहयोगी देशों की सीमाओं के बीच की रेखा को धुंधला कर सकते हैं।
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