अधिकारियों ने कहा कि:
फिलहाल जांच एजेंसियां ड्रोन की वास्तविक उड़ान‑मार्ग और स्रोत का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।
इसका कोई अंतिम तकनीकी कारण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। लेकिन रक्षा विश्लेषकों का कहना है कि एक बड़ी समस्या यह है कि छोटे या कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन पारंपरिक रडार सिस्टम से बच निकलते हैं, क्योंकि ये सिस्टम मुख्यतः विमानों और मिसाइलों को ट्रैक करने के लिए बनाए गए हैं।
पिछले महीनों में बाल्टिक देशों में हुई घटनाओं ने इसी तरह की खामियों को उजागर किया है। कई मामलों में अधिकारियों को तब पता चला जब स्थानीय लोगों ने धमाके या मलबे की सूचना दी।
कुछ रक्षा रिपोर्टों में यह भी संभावना जताई गई है कि इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) के कारण ड्रोन का रास्ता बदल सकता है। इससे यूक्रेनी ड्रोन, जो रूस के लक्ष्यों की ओर भेजे गए थे, गलती से NATO क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। हालांकि इस सिद्धांत की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
यह 2026 में लिथुआनिया में पहली ऐसी घटना नहीं है।
मार्च 2026 में एक संदिग्ध यूक्रेनी ड्रोन दक्षिणी लिथुआनिया के वारेना (Varėna) जिले में जमे हुए लावीसास झील (Lake Lavysas) पर गिरा था और टकराते ही विस्फोट हो गया था। उस घटना के बाद आपातकालीन प्रतिक्रिया और जांच शुरू की गई थी। अधिकारियों का मानना था कि वह ड्रोन रूस में किसी लक्ष्य के लिए भेजा गया था लेकिन रास्ता भटक गया।
मई की घटना उससे कम गंभीर दिखती है क्योंकि:
फिर भी, बार‑बार हो रही ऐसी घटनाएं बताती हैं कि युद्ध से जुड़े ड्रोन कभी‑कभी NATO देशों की सीमा में पहुंच सकते हैं।
लिथुआनिया की घटना से कुछ दिन पहले मई 2026 की शुरुआत में लातविया में भी दो संदिग्ध यूक्रेनी ड्रोन रूस की दिशा से लातवियाई हवाई क्षेत्र में आ गए थे। उनमें से एक तेल भंडारण सुविधा पर गिरकर फट गया, जिससे खाली ईंधन टैंकों को नुकसान पहुंचा, हालांकि कोई घायल नहीं हुआ।
इस घटना का राजनीतिक असर बड़ा रहा। सुरक्षा तैयारियों पर उठे सवालों के बाद लातविया के रक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
2026 में लिथुआनिया, लातविया और एस्टोनिया—तीनों बाल्टिक देशों में ऐसे ड्रोन प्रवेश की घटनाएं दर्ज की गई हैं। कई मामलों में ये ड्रोन रूस या बेलारूस के ऊपर से उड़ते हुए NATO क्षेत्र में आ गए।
अधिकांश मामलों में बड़ा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन एक समस्या साफ दिखाई दे रही है: सस्ते और लंबी दूरी तक उड़ने वाले ड्रोन अपने लक्ष्य से बहुत दूर तक पहुंच सकते हैं और पड़ोसी देशों के हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।
NATO के लिए यह एक जटिल स्थिति है—क्योंकि कई बार ये ड्रोन रूस के खिलाफ यूक्रेनी अभियानों से जुड़े होते हैं, लेकिन उनके भटक जाने से NATO सदस्य देशों के नागरिकों और बुनियादी ढांचे को जोखिम हो सकता है।
इन घटनाओं के बाद बाल्टिक देशों ने अपनी वायु‑रक्षा क्षमता बढ़ाने की मांग तेज कर दी है।
लिथुआनिया के राष्ट्रपति गीतानास नाउसैदा (Gitanas Nausėda) ने कहा है कि ड्रोन और हाइब्रिड खतरों के कारण एयर‑डिफेंस सिस्टम और ड्रोन डिटेक्शन तकनीक को तुरंत उन्नत करना जरूरी है।
लातविया और लिथुआनिया दोनों ने NATO सहयोगियों से भी आग्रह किया है कि वे गठबंधन के पूर्वी मोर्चे (Eastern Flank) पर हवाई सुरक्षा और निगरानी क्षमताओं को मजबूत करें।
अब तक इन क्रैश से ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है, लेकिन वे आधुनिक युद्ध की एक बड़ी चुनौती दिखाते हैं। आज के ड्रोन:
जैसे‑जैसे यूक्रेन युद्ध जारी है, सीमाओं के पार ऐसे ड्रोन‑घटनाओं की संभावना बनी रहेगी। इसी वजह से बाल्टिक देश अब उस वास्तविकता का सामना कर रहे हैं जिसमें NATO को लगातार बढ़ते ड्रोन खतरों के दौर के लिए अपनी रक्षा रणनीति को तेज़ी से बदलना पड़ सकता है।
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