इस योजना को आगे बढ़ाने में कई क्षेत्रीय देश मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। रिपोर्टों में कहा गया है कि कतर और पाकिस्तान इसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं, जबकि सऊदी अरब, तुर्की और मिस्र भी समाधान तैयार करने की कोशिशों में शामिल हैं।
बताया जाता है कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक चैनल के रूप में भी काम किया है।
तनाव का मुख्य कारण यह है कि दोनों नेताओं की रणनीति अलग दिखाई देती है।
ट्रंप ने नेतन्याहू को बताया कि मध्यस्थ कूटनीतिक प्रस्ताव को आगे बढ़ा रहे हैं और अमेरिका इस रास्ते को परखने पर विचार कर रहा है। इज़राइली सूत्रों के अनुसार नेतन्याहू ने इस दृष्टिकोण का जोरदार विरोध किया।
इससे एक बड़ा रणनीतिक मतभेद सामने आता है:
लगभग 10 सप्ताह से चल रहा युद्ध पहले ही क्षेत्रीय तनाव और आर्थिक दबाव बढ़ा चुका है। विशेष रूप से होर्मुज़ जलडमरूमध्य—जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है—में व्यवधान ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ारों को प्रभावित किया है।
इसी संदर्भ में ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि व्यवहार्य समझौता संभव हो तो वे कूटनीतिक रास्ते को आजमाने के लिए तैयार हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने ईरान पर नियोजित अमेरिकी हमले को भी अस्थायी रूप से रोक दिया, ताकि बातचीत के लिए समय मिल सके।
हालांकि अमेरिकी रुख पूरी तरह स्थिर नहीं है। इससे पहले ट्रंप ने ईरान की प्रतिक्रिया को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताया था।
रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने वार्ता के लिए कुछ प्रमुख शर्तें रखी हैं:
होर्मुज़ जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच एक संकीर्ण समुद्री मार्ग है। वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यहां किसी भी सैन्य तनाव का असर दुनिया भर के ऊर्जा बाज़ारों पर पड़ता है।
मौजूदा संघर्ष के कारण यहां जहाज़रानी प्रभावित हुई है, जिससे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक चिंता बढ़ी है।
संभावित समझौते में इसलिए इन मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया जा सकता है:
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच यह तनाव सिर्फ एक फोन कॉल की कहानी नहीं है। यह उस बड़े सवाल को दर्शाता है कि ईरान के साथ संघर्ष का अंत किस तरह होना चाहिए।
इज़राइल का झुकाव सैन्य दबाव बनाए रखने की ओर दिखाई देता है, जब तक कि ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं पर कठोर नियंत्रण न हो जाए। वहीं अमेरिका, सैन्य विकल्प खुले रखते हुए भी, पहले तनाव कम करने और फिर बातचीत के जरिए कठिन मुद्दों को हल करने का रास्ता तलाशता दिख रहा है।
फिलहाल प्रस्तावित ढांचा अभी केवल चर्चा के स्तर पर है। कोई अंतिम समझौता घोषित नहीं हुआ है, और यह भी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका, ईरान या इज़राइल अंततः इस योजना को स्वीकार करेंगे या नहीं। लेकिन इतना तय है कि युद्ध के अगले चरण को अब कूटनीति बनाम सैन्य दबाव की बहस ही आकार दे रही है।
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