26 अगस्त की लांगटांग लिरुंग आपदा को केवल भूकंप या सामान्य ग्लेशियल झील फटने की घटना समझना सही नहीं होगा। शुरुआती उपग्रह, भूकंपीय और मैदानी साक्ष्यों से संकेत मिलता है कि पहले चट्टान और ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा तेजी से ढहा। गिरता हुआ मलबा बर्फ-चट्टान के हिमस्खलन में बदला और नीचे आते-आते उसमें पानी, बोल्डर और तलछट शामिल हो गए। यही मिश्रण आगे चलकर मलबे के बहाव और विनाशकारी अचानक बाढ़ में बदल गया। इस प्रक्रिया की शुरुआत किस वजह से हुई, इसकी जांच अभी जारी है। 32627
आखिर क्या ढहा था?
घटना के बाद उपलब्ध कराई गई साफ उपग्रह तस्वीरों में केवल बर्फ के टूटने के संकेत नहीं मिले। भू-आकृति विज्ञानियों ने पाया कि ग्लेशियर के नीचे की आधारशिला भी ढह गई थी। इसके साथ ग्लेशियर का भारी हिस्सा लांगटांग लिरुंग की खड़ी उत्तरी ढलान से नीचे आ गिरा और ऊपरी नदी तंत्र में सैकड़ों मीटर नीचे जा पहुंचा। रास्ते में इसने चट्टानों, तलछट और पानी को अपने साथ मिला लिया। 32426
साइंस मीडिया सेंटर से बातचीत करने वाले विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती घटना समुद्र तल से करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई पर हुई बड़ी चट्टान-बर्फ हिमस्खलन थी। इसमें ग्लेशियर और उसके नीचे की आधारशिला का लगभग 1 से 1.3 किलोमीटर चौड़ा हिस्सा अलग हुआ होगा। इतनी तेज़ गति से हुए इस शुरुआती ढहाव के बारे में स्रोत पर चेतावनी देने का लगभग कोई अवसर नहीं था। 27
इसके बाद बना बहाव हिमालय की आपस में जुड़ी नदी घाटियों से नीचे बढ़ा और नेपाल तथा तिब्बत में इमारतों, पुलों और अन्य ढांचों को बहा ले गया। मलबे ने कुछ जगहों पर नदियों का रास्ता भी रोक दिया, जिससे अस्थायी प्राकृतिक बांध और झीलें बनीं। इन झीलों ने बाढ़ की श्रृंखला में एक और जोखिम जोड़ दिया। 625
भूकंप वाली शुरुआती धारणा क्यों बदली?
घटना के शुरुआती भूकंपीय संकेतों को 4.4 तीव्रता के भूकंप के रूप में समझा गया था। बाद में अमेरिकी भूगर्भीय सर्वेक्षण (USGS) और अन्य विश्लेषकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह संकेत किसी स्वतंत्र भूकंप से नहीं, बल्कि चट्टान और बर्फ के ढहने तथा उसके बाद हुए मलबे के बहाव से पैदा हुआ था। बाद की रिपोर्टों में इस घटना को 5.2 तीव्रता के ग्लेशियर-ढहाव संकेत के रूप में बताया गया। 3152123
यह अंतर अहम है। सिस्मोमीटर किसी बड़े भू-द्रव्यमान के खिसकने का संकेत पकड़ सकते हैं, लेकिन ढलान के विफल हो जाने के बाद संकेत दर्ज होना, उस विफलता का पहले से अनुमान लगा लेना नहीं है। इस घटना की अचानक और कई चरणों वाली प्रकृति के कारण बारिश, नदी के जलस्तर और ज्ञात ग्लेशियल झीलों पर आधारित चेतावनी प्रणालियां शुरुआती स्रोत पर उपयोगी अग्रिम सूचना नहीं दे सकीं। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी की धारा के नीचे की ओर कुछ अधिक चेतावनी समय मिल पाता तो जान-माल का नुकसान कम किया जा सकता था। 27
जलवायु परिवर्तन ने जोखिम कैसे बढ़ाया हो सकता है?
वैज्ञानिकों ने यह स्थापित नहीं किया है कि 26 अगस्त को जलवायु परिवर्तन ही तत्काल और एकमात्र कारण था। अधिक सावधान निष्कर्ष यह है कि बढ़ते तापमान ने पूरे पर्वतीय तंत्र को कमजोर किया होगा और ऐसी विफलता की संभावना बढ़ाई होगी। ग्लेशियरों के पीछे हटने से खड़ी ढलानों को मिलने वाला बर्फ का सहारा बदल सकता है। दूसरी ओर, पिघलता पर्माफ्रॉस्ट—जमी हुई मिट्टी, चट्टान और जैविक पदार्थ की परत—दरारों वाली आधारशिला को बांधे रखने वाली प्राकृतिक 'गोंद' को कमजोर कर सकता है। 3843
यह घटना ऊंचे हिमालय में बढ़ती अस्थिरता के व्यापक पैटर्न के बीच हुई है। शोध से पता चलता है कि कुछ हिमालयी क्षेत्रों में बर्फ-चट्टान हिमस्खलन अधिक आम हो रहे हैं, क्योंकि ग्लेशियरों का पीछे हटना, पर्माफ्रॉस्ट का क्षरण और अत्यधिक वर्षा ढलानों की स्थिति बदल रहे हैं। हालांकि, अलग-अलग स्थानों पर ये रुझान एक जैसे नहीं हैं। 40
एक अलग अध्ययन के अनुसार, पिछले चार दशकों में हिमालय में बर्फ के नुकसान की गति बढ़ी है। 21वीं सदी में औसत बर्फ-हानि की दर 20वीं सदी के अंत की तुलना में दोगुनी तेज रही। 41
ये क्षेत्रीय बदलाव जोखिम का बदलता हुआ माहौल दिखाते हैं, लेकिन किसी एक ढलान के ढहने की पूरी फोरेंसिक व्याख्या नहीं देते। तत्काल कारण जानने के लिए ढह चुकी ढलान, मौसम, ग्लेशियर की बनावट और भूकंपीय रिकॉर्ड का आगे विश्लेषण करना होगा।
तबाही के बाद भी खत्म नहीं हुआ खतरा
बचाव दलों के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचने के साथ मृतकों और लापता लोगों के आंकड़े तेजी से बदले। रॉयटर्स के अनुसार 28 अगस्त तक नेपाल में कम-से-कम 579 और चीन के तिब्बत क्षेत्र में सात लोगों की मौत की सूचना थी। नेपाल में लापता लोगों की संख्या 1,924 तक पहुंच गई थी। ये आंकड़े अस्थायी थे, क्योंकि कई लोग अब भी लापता थे और मलबे से ढकी घाटियों तक पहुंच सीमित थी। 18
बचाव अभियानों को टूटी सड़कों, अस्थिर ढलानों, खराब मौसम और आगे बाढ़ आने की आशंका का सामना करना पड़ा। हेलीकॉप्टर दलों तथा नेपाली और चीनी टीमों ने जीवित लोगों की तलाश जारी रखी। अधिकारियों ने मलबे से ऊपर की ओर बनी कम-से-कम दो अवरोधक झीलों पर निगरानी रखी। चेतावनी दी गई कि इन झीलों का पानी प्राकृतिक बांध के ऊपर से बह निकला या बांध टूट गया तो पहले से तबाह घाटियों में एक और बाढ़ आ सकती है। एक झील के बह निकलने की भी सूचना दी गई। 18203134
मलबे से बनी झीलों को नियंत्रित तरीके से खाली करने या जलनिकासी चैनल बनाने जैसे इंजीनियरिंग उपाय कुछ परिस्थितियों में पानी का दबाव घटा सकते हैं। लेकिन ऐसे काम स्वयं जोखिमपूर्ण होते हैं और इनके लिए स्थल की स्थिरता का विस्तृत आकलन जरूरी है। उपलब्ध विश्वसनीय जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट नहीं है कि घटनास्थल पर किसी खास जलनिकासी परियोजना को मंजूरी मिल चुकी है या वह लागू की जा चुकी है।
शुरुआती चेतावनी व्यवस्था से क्या सबक मिला?
हिमालयी आपदा-योजना केवल बारिश मापने वाले उपकरणों, नदी के गेज या पहले से दर्ज ग्लेशियल झीलों पर निर्भर नहीं रह सकती। अस्थिर चट्टान, बर्फ और पर्माफ्रॉस्ट वाली ढलानों की निगरानी के लिए उपग्रह तस्वीरों, भूकंपीय आंकड़ों और जमीन पर किए गए निरीक्षणों को एक साथ इस्तेमाल करना होगा। नेपाल और चीन के बीच सीमा-पार चेतावनी प्रोटोकॉल भी जरूरी होंगे, क्योंकि ऐसी घटनाओं का असर कुछ ही मिनटों में कई घाटियों और दोनों ओर के इलाकों तक पहुंच सकता है।
लांगटांग लिरुंग ने दिखाया कि एक ढलान के टूटने के बाद ग्लेशियर ढहना, चट्टानी हिमस्खलन, मलबे का बहाव और अचानक बाढ़ एक ही आपदा में बदल सकते हैं—और तब चेतावनी देने के लिए बचा समय बेहद कम हो सकता है। 2740