इस कूटनीतिक प्रयास का सबसे कठिन सवाल यह था कि हमास की ओर से हथियार छोड़ने की कथित सहमति को जमीन पर ऐसे कदमों में कैसे बदला जाए, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि हो सके। इसके साथ ही, इजरायल से प्रस्तावित सैन्य वापसी और युद्ध के बाद गाजा के प्रशासन से जुड़े प्रावधानों को स्वीकार कराने की चुनौती भी बनी हुई थी।
बातचीत मिस्र के भूमध्यसागरीय तटीय शहर एल-अलामीन में हुई। हमास के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अल-हय्या ने किया। मध्यस्थता की कोशिशों में मिस्र, कतर और तुर्किये के अधिकारी भी शामिल थे।
बैठक में अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय पक्षों की पूरी मौजूदगी को लेकर रिपोर्टों में कुछ अंतर है। एक रिपोर्ट में कुशनर के साथ तीन दूतों के समूह का उल्लेख है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से जुड़े निकोलाय म्लादेनोव और टोनी ब्लेयर को प्रतिभागी बताया गया। अधिकारियों और राजनयिकों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर जानकारी दी, इसलिए बैठक में शामिल सभी लोगों की कोई आधिकारिक सार्वजनिक सूची या प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं है।
कुशनर ने एल-अलामीन में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से भी मुलाकात की। मिस्र के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, बातचीत में इस बात पर जोर दिया गया कि गाजा युद्धविराम समझौते के तहत सभी पक्ष अपनी जिम्मेदारियां पूरी करें।
अमेरिकी प्रयास का जोर केवल एक और राजनीतिक आश्वासन हासिल करने पर नहीं, बल्कि उसे लागू करने की स्पष्ट प्रक्रिया पर था। रिपोर्टों के अनुसार, कुशनर ने हमास से कहा कि वह:
अमेरिका समर्थित व्यापक 15-सूत्रीय रोडमैप में इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी और नए नागरिक फिलिस्तीनी प्रशासन के तहत पुनर्निर्माण की परिकल्पना भी शामिल है।
यहां असली पेच ‘निरस्त्रीकरण’ के अर्थ और उसकी निगरानी का है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक, उद्देश्य हमास की जिम्मेदारियों को सामान्य वादे से आगे ले जाकर ऐसे चरणों में बदलना था, जिनकी निगरानी और पुष्टि की जा सके।
रिपोर्टों के अनुसार, हमास ने बैठक में समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इससे पहले की रिपोर्टों में कहा गया था कि समूह सैद्धांतिक रूप से अपने हथियार एक नई शासकीय समिति को सौंपने पर सहमत था।
हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि हमास ने कुशनर द्वारा उठाए गए हर कार्यान्वयन संबंधी विवरण को स्वीकार कर लिया है। सार्वजनिक रिपोर्टों में हमास की पूरी शर्तें, निरस्त्रीकरण का क्रम, प्रस्तावित सत्यापन व्यवस्था या समयसीमा स्पष्ट नहीं है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, बैठक के बाद हमास ने मध्यस्थों और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से इजरायल पर योजना लागू करने के लिए दबाव डालने की अपील की। इससे गतिरोध का दूसरा पहलू सामने आता है: वॉशिंगटन हमास से मापे और जांचे जा सकने वाले कदम चाहता है, जबकि हमास इजरायल से योजना के अनुरूप कदम उठाने की मांग कर रहा है।
कुशनर के सोमवार, 17 अगस्त को इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलने की उम्मीद थी। यह मुलाकात नेतन्याहू द्वारा 15-सूत्रीय रोडमैप को सार्वजनिक रूप से खारिज किए जाने के बाद होनी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, योजना में हमास का निरस्त्रीकरण, इजरायली सैनिकों की वापसी और गाजा के लिए नया नागरिक प्रशासन शामिल था।
इजरायल की असहमति इस समय सबसे बड़ी कूटनीतिक अड़चन है। उपलब्ध रिपोर्टें यह नहीं बतातीं कि नेतन्याहू ने योजना के हर किस प्रावधान का विरोध किया। इतना स्पष्ट है कि उन्होंने योजना या उसके प्रमुख हिस्सों को अस्वीकार किया, खासकर इजरायली वापसी और हमास के निरस्त्रीकरण की शर्तों से जुड़े पहलुओं को।
इसीलिए कुशनर की बैठकों का क्रम एक स्पष्ट कूटनीतिक रणनीति दिखाता है: पहले हमास से ठोस प्रतिबद्धता लेने की कोशिश, फिर नेतन्याहू पर उससे जुड़े “समानांतर कदम” उठाने का दबाव। यह रणनीति इजरायल की आपत्तियों को दूर कर पाएगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं था।
संयुक्त अरब अमीरात और सात अन्य अरब तथा इस्लामी देशों ने गाजा योजना को लागू करने की नई कोशिशों को इजरायल द्वारा खारिज किए जाने की निंदा की। रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त बयान पर यूएई, कतर, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्किये, सऊदी अरब और मिस्र के हस्ताक्षर थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, बयान में फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को इजरायल द्वारा खारिज किए जाने की भी आलोचना की गई। इसका महत्व मुख्य रूप से राजनीतिक था: क्षेत्रीय सरकारें सार्वजनिक रूप से गाजा में शांति प्रयासों के ठहराव की जिम्मेदारी इजरायल पर डाल रही थीं, जबकि कुशनर प्रत्यक्ष और मध्यस्थ-आधारित बातचीत के जरिए रोडमैप को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे।
कूटनीतिक हलचल के बीच गाजा में इजरायली हवाई हमले जारी रहने की खबरें भी सामने आईं। सीएनबीसी के अनुसार, अमेरिकी दूतों ने मिस्र, कतर और तुर्किये के मध्यस्थों से मुलाकात की, उसी दौरान इजरायल ने गाजा में हवाई हमले जारी रखे। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि युद्धविराम से हमलों में कमी आई, लेकिन वे पूरी तरह बंद नहीं हुए।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टिंग से हमलों की संख्या, उनके ठिकानों, हताहतों या किसी विशेष घटना के युद्धविराम की किसी निश्चित शर्त का उल्लंघन करने की विश्वसनीय पुष्टि नहीं होती। इसलिए इन कूटनीतिक विवरणों के आधार पर अतिरिक्त निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मिस्र की बैठक ने कूटनीति के फिर से सक्रिय होने का संकेत दिया, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं कराया। कुशनर ने हमास से निरस्त्रीकरण और शासन की जिम्मेदारी हस्तांतरित करने वाले ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता मजबूत करने या हासिल करने की कोशिश की। फिर भी सबसे कठिन सवाल खुले रहे—निरस्त्रीकरण की पुष्टि कौन और कैसे करेगा, हमास की वास्तविक शर्तें क्या हैं और क्या इजरायल गाजा से अपनी सेना हटाएगा।
अब अगली बड़ी परीक्षा नेतन्याहू के साथ प्रस्तावित बातचीत थी। जब तक दोनों पक्ष पारस्परिक और सत्यापन योग्य कदमों पर सहमत नहीं होते, तब तक नई बातचीत के बावजूद 15-सूत्रीय रोडमैप का लागू होना अटका रहेगा।
इस कूटनीतिक प्रयास का सबसे कठिन सवाल यह था कि हमास की ओर से हथियार छोड़ने की कथित सहमति को जमीन पर ऐसे कदमों में कैसे बदला जाए, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि हो सके। इसके साथ ही, इजरायल से प्रस्तावित सैन्य वापसी और युद्ध के बाद गाजा के प्रशासन से जुड़े प्रावधानों को स्वीकार कराने की चुनौती भी बनी हुई थी।
बातचीत मिस्र के भूमध्यसागरीय तटीय शहर एल-अलामीन में हुई। हमास के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व अल-हय्या ने किया। मध्यस्थता की कोशिशों में मिस्र, कतर और तुर्किये के अधिकारी भी शामिल थे।
बैठक में अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय पक्षों की पूरी मौजूदगी को लेकर रिपोर्टों में कुछ अंतर है। एक रिपोर्ट में कुशनर के साथ तीन दूतों के समूह का उल्लेख है, जबकि दूसरी रिपोर्ट में ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से जुड़े निकोलाय म्लादेनोव और टोनी ब्लेयर को प्रतिभागी बताया गया। अधिकारियों और राजनयिकों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर जानकारी दी, इसलिए बैठक में शामिल सभी लोगों की कोई आधिकारिक सार्वजनिक सूची या प्रतिलिपि उपलब्ध नहीं है।
कुशनर ने एल-अलामीन में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से भी मुलाकात की। मिस्र के राष्ट्रपति कार्यालय के अनुसार, बातचीत में इस बात पर जोर दिया गया कि गाजा युद्धविराम समझौते के तहत सभी पक्ष अपनी जिम्मेदारियां पूरी करें।
अमेरिकी प्रयास का जोर केवल एक और राजनीतिक आश्वासन हासिल करने पर नहीं, बल्कि उसे लागू करने की स्पष्ट प्रक्रिया पर था। रिपोर्टों के अनुसार, कुशनर ने हमास से कहा कि वह:
अमेरिका समर्थित व्यापक 15-सूत्रीय रोडमैप में इजरायली सैनिकों की गाजा से वापसी और नए नागरिक फिलिस्तीनी प्रशासन के तहत पुनर्निर्माण की परिकल्पना भी शामिल है।
यहां असली पेच ‘निरस्त्रीकरण’ के अर्थ और उसकी निगरानी का है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के मुताबिक, उद्देश्य हमास की जिम्मेदारियों को सामान्य वादे से आगे ले जाकर ऐसे चरणों में बदलना था, जिनकी निगरानी और पुष्टि की जा सके।
रिपोर्टों के अनुसार, हमास ने बैठक में समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। इससे पहले की रिपोर्टों में कहा गया था कि समूह सैद्धांतिक रूप से अपने हथियार एक नई शासकीय समिति को सौंपने पर सहमत था।
हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि हमास ने कुशनर द्वारा उठाए गए हर कार्यान्वयन संबंधी विवरण को स्वीकार कर लिया है। सार्वजनिक रिपोर्टों में हमास की पूरी शर्तें, निरस्त्रीकरण का क्रम, प्रस्तावित सत्यापन व्यवस्था या समयसीमा स्पष्ट नहीं है।
एक रिपोर्ट के अनुसार, बैठक के बाद हमास ने मध्यस्थों और ‘बोर्ड ऑफ पीस’ से इजरायल पर योजना लागू करने के लिए दबाव डालने की अपील की। इससे गतिरोध का दूसरा पहलू सामने आता है: वॉशिंगटन हमास से मापे और जांचे जा सकने वाले कदम चाहता है, जबकि हमास इजरायल से योजना के अनुरूप कदम उठाने की मांग कर रहा है।
कुशनर के सोमवार, 17 अगस्त को इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलने की उम्मीद थी। यह मुलाकात नेतन्याहू द्वारा 15-सूत्रीय रोडमैप को सार्वजनिक रूप से खारिज किए जाने के बाद होनी थी। रिपोर्टों के मुताबिक, योजना में हमास का निरस्त्रीकरण, इजरायली सैनिकों की वापसी और गाजा के लिए नया नागरिक प्रशासन शामिल था।
इजरायल की असहमति इस समय सबसे बड़ी कूटनीतिक अड़चन है। उपलब्ध रिपोर्टें यह नहीं बतातीं कि नेतन्याहू ने योजना के हर किस प्रावधान का विरोध किया। इतना स्पष्ट है कि उन्होंने योजना या उसके प्रमुख हिस्सों को अस्वीकार किया, खासकर इजरायली वापसी और हमास के निरस्त्रीकरण की शर्तों से जुड़े पहलुओं को।
इसीलिए कुशनर की बैठकों का क्रम एक स्पष्ट कूटनीतिक रणनीति दिखाता है: पहले हमास से ठोस प्रतिबद्धता लेने की कोशिश, फिर नेतन्याहू पर उससे जुड़े “समानांतर कदम” उठाने का दबाव। यह रणनीति इजरायल की आपत्तियों को दूर कर पाएगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं था।
संयुक्त अरब अमीरात और सात अन्य अरब तथा इस्लामी देशों ने गाजा योजना को लागू करने की नई कोशिशों को इजरायल द्वारा खारिज किए जाने की निंदा की। रिपोर्ट के अनुसार, संयुक्त बयान पर यूएई, कतर, जॉर्डन, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, तुर्किये, सऊदी अरब और मिस्र के हस्ताक्षर थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, बयान में फिलिस्तीनी राज्य की स्थापना को इजरायल द्वारा खारिज किए जाने की भी आलोचना की गई। इसका महत्व मुख्य रूप से राजनीतिक था: क्षेत्रीय सरकारें सार्वजनिक रूप से गाजा में शांति प्रयासों के ठहराव की जिम्मेदारी इजरायल पर डाल रही थीं, जबकि कुशनर प्रत्यक्ष और मध्यस्थ-आधारित बातचीत के जरिए रोडमैप को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे।
कूटनीतिक हलचल के बीच गाजा में इजरायली हवाई हमले जारी रहने की खबरें भी सामने आईं। सीएनबीसी के अनुसार, अमेरिकी दूतों ने मिस्र, कतर और तुर्किये के मध्यस्थों से मुलाकात की, उसी दौरान इजरायल ने गाजा में हवाई हमले जारी रखे। एक अन्य रिपोर्ट में कहा गया कि युद्धविराम से हमलों में कमी आई, लेकिन वे पूरी तरह बंद नहीं हुए।
हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टिंग से हमलों की संख्या, उनके ठिकानों, हताहतों या किसी विशेष घटना के युद्धविराम की किसी निश्चित शर्त का उल्लंघन करने की विश्वसनीय पुष्टि नहीं होती। इसलिए इन कूटनीतिक विवरणों के आधार पर अतिरिक्त निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
मिस्र की बैठक ने कूटनीति के फिर से सक्रिय होने का संकेत दिया, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं कराया। कुशनर ने हमास से निरस्त्रीकरण और शासन की जिम्मेदारी हस्तांतरित करने वाले ढांचे के प्रति प्रतिबद्धता मजबूत करने या हासिल करने की कोशिश की। फिर भी सबसे कठिन सवाल खुले रहे—निरस्त्रीकरण की पुष्टि कौन और कैसे करेगा, हमास की वास्तविक शर्तें क्या हैं और क्या इजरायल गाजा से अपनी सेना हटाएगा।
अब अगली बड़ी परीक्षा नेतन्याहू के साथ प्रस्तावित बातचीत थी। जब तक दोनों पक्ष पारस्परिक और सत्यापन योग्य कदमों पर सहमत नहीं होते, तब तक नई बातचीत के बावजूद 15-सूत्रीय रोडमैप का लागू होना अटका रहेगा।