गैलेक्टिक एनर्जी का पहला तरल-ईंधन वाला प्रक्षेपण यान 1 सितंबर 2026 को अपनी पहली उड़ान में सफल रहा। घरेलू तौर पर Zhishenxing-1 और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में PALLAS-1 नाम से पहचाना जाने वाला 52 मीटर लंबा रॉकेट, बीजिंग समयानुसार सुबह 10 बजे जिउक्वान के डोंगफेंग वाणिज्यिक अंतरिक्ष नवाचार क्षेत्र से रवाना हुआ और निर्धारित कक्षा में पहुंच गया।
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इस सफलता का महत्व केवल कक्षा हासिल करने में नहीं है। यह उड़ान गैलेक्टिक एनर्जी के लिए एक नए प्रक्षेपण तंत्र का योग्यता-परीक्षण थी—कंपनी को पूरे रॉकेट का उड़ान डेटा मिला और कक्षीय मिशन की बुनियादी क्षमता सत्यापित हुई। लेकिन इसकी पुन:उपयोग रणनीति का सबसे अहम हिस्सा, यानी पहले चरण को वापस पृथ्वी पर उतारना, अगली उड़ानों के लिए बचा रहा।
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सफल कक्षीय उड़ान, लैंडिंग परीक्षण नहीं
Pallas-1 की पहली उड़ान का मुख्य उद्देश्य पूरे रॉकेट और कक्षा तक पहुंचने की इसकी क्षमता को जांचना था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार रॉकेट सूर्य-समकालिक कक्षा की ओर बढ़ा। इसके पहले चरण को सात CQ-50 इंजनों ने शक्ति दी और चरण अलग होने के बाद दूसरे चरण ने मिशन पूरा किया।
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इस उड़ान में पहले चरण की वापसी का कोई प्रयास नहीं किया गया। शुरुआती रॉकेट में नियंत्रित वापसी के लिए जरूरी लैंडिंग उपकरण और ग्रिड फिन जैसे हार्डवेयर लगाए ही नहीं गए थे। इसलिए चरण अलग होने के बाद उसे वापस उतरने के बजाय पृथ्वी की ओर गिरने दिया गया।
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यह अंतर महत्वपूर्ण है। सफल कक्षीय उड़ान से प्रक्षेपण और चरण-विभाजन की क्षमता साबित होती है, लेकिन इससे बूस्टर की रिकवरी, उसकी मरम्मत या दोबारा उड़ान की क्षमता अपने-आप सिद्ध नहीं होती। गैलेक्टिक एनर्जी का अगला कदम भविष्य की उड़ानों में ऊर्ध्वाधर लैंडिंग और रिकवरी के लिए जरूरी हार्डवेयर तथा उड़ान प्रक्रियाएं शामिल करना है।
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Pallas-1 की तकनीकी रूपरेखा
Pallas-1 दो-चरणीय तरल-प्रणोदक रॉकेट है। इसकी लंबाई 52 मीटर और मुख्य चरण का व्यास 3.35 मीटर है। कंपनी की बताई गई क्षमता के अनुसार यह निम्न-पृथ्वी कक्षा में लगभग 7 टन तक का पेलोड पहुंचा सकता है।
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रॉकेट तरल ऑक्सीजन और केरोसिन को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करता है। पहले चरण में सात CQ-50 इंजन समानांतर रूप से लगाए गए हैं। यह इंजन परिवार अलग-अलग थ्रस्ट स्तरों पर काम करने और भविष्य में पुन:उपयोग के लिए डिजाइन किया गया है। प्रत्येक CQ-50 इंजन का थ्रस्ट लगभग 50 टन बताया गया है, जबकि इनके जमीनी परीक्षणों में लंबे समय तक हॉट-फायर परीक्षण भी शामिल रहे हैं।
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सात इंजनों का संयोजन केवल अधिक शक्ति के लिए नहीं है; यह एक तरह की प्रणोदन-विश्वसनीयता रणनीति भी है। गैलेक्टिक एनर्जी के अनुसार, यदि किसी चरण में एक इंजन या उसका नियंत्रण तंत्र विफल हो जाए, तो बचे हुए इंजनों के बीच कमांड दोबारा बांटकर रॉकेट को नियंत्रित उड़ान में बनाए रखने की क्षमता रखी गई है। हालांकि, 1 सितंबर की उड़ान के दौरान ऐसी इंजन-विफलता हुई थी, इसका कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
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कंपनी के कारोबार में क्यों अहम है यह उड़ान
गैलेक्टिक एनर्जी अब तक मुख्य रूप से Ceres परिवार के ठोस-ईंधन रॉकेटों के लिए जानी जाती रही है। Pallas-1 कंपनी के लिए काफी बड़ा तरल-प्रणोदन मंच जोड़ता है और उसकी घोषित ठोस-तरल, यानी “डुअल-ड्राइव”, रणनीति की शुरुआत करता है।
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इस रणनीति का व्यावसायिक तर्क सीधा है। Ceres छोटे प्रक्षेपणों की जरूरत पूरी कर सकता है, जबकि Pallas-1 बड़े पेलोड के लिए इस्तेमाल किया जाना है। यदि इसका पहला चरण आगे चलकर सफलतापूर्वक वापस लाकर दोबारा उड़ाया जा सका, तो इससे संचालन की लागत घटाने और अधिक नियमित प्रक्षेपणों का रास्ता खुल सकता है। इसलिए यह उड़ान कंपनी के उत्पाद पोर्टफोलियो का विस्तार तो करती है, लेकिन तरल-रॉकेट कारोबार के लिए अभी केवल पहला परिचालन प्रमाण है।
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पुन:उपयोग की असली परीक्षा आगे
Pallas-1 के पहले चरण को कम-से-कम 25 बार इस्तेमाल किए जाने के लक्ष्य के साथ डिजाइन किया गया है। CQ-50 इंजन की संरचना, सात इंजनों का क्लस्टर और भविष्य में जोड़े जाने वाले लैंडिंग उपकरण इसी दीर्घकालिक लक्ष्य का हिस्सा हैं।
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फिर भी 1 सितंबर के मिशन को सटीक शब्दों में समझना जरूरी है: यह सफल पहली कक्षीय उड़ान और रॉकेट-सत्यापन मिशन था, बरामद बूस्टर की उड़ान नहीं। आगे के महत्वपूर्ण पड़ाव होंगे—रिकवरी हार्डवेयर जोड़ना, पहले चरण को नियंत्रित ढंग से नीचे लाना, ऊर्ध्वाधर लैंडिंग कराना और अंततः बरामद हार्डवेयर को किसी दूसरी उड़ान में इस्तेमाल करना। इन चरणों के पूरा होने तक गैलेक्टिक एनर्जी ने पुन:उपयोग की एक विश्वसनीय दिशा जरूर दिखाई है, लेकिन पुन:उपयोग स्वयं अभी साबित नहीं किया है।
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