फ्रांस में 5 नवंबर 2026 को मजदूरों और छात्रों ने वेतन, बढ़ती जीवन-यापन लागत और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर देशव्यापी हड़ताल और प्रदर्शन किए। इस कार्रवाई ने छात्र आंदोलन को व्यापक श्रमिक समर्थन दिया। भीड़ कितनी बड़ी थी, इस पर सरकार और प्रमुख यूनियन CGT के अनुमान में बड़ा अंतर रहा।
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भीड़ के आंकड़ों में इतना अंतर क्यों?
फ्रांस के गृह मंत्रालय ने दोपहर 1 बजे तक पेरिस के बाहर 180 मार्चों में 2.7 लाख प्रदर्शनकारियों की गिनती बताई। दिन के आगे बढ़ने के साथ सरकारी अनुमान करीब 6 लाख तक पहुंचा, लेकिन मंत्रालय ने बाद में देशभर का आंकड़ा घटाकर 5.75 लाख कर दिया। CGT—फ्रांस के प्रमुख श्रमिक संगठनों में से एक—ने करीब 16 लाख लोगों के शामिल होने का दावा किया। ये अलग-अलग संगठनों के अनुमान हैं; इन्हें किसी एक स्वतंत्र रूप से सत्यापित गिनती के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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प्रदर्शनकारियों की मांगें क्या थीं?
यूनियनों ने वेतन बढ़ाने, महंगाई के असर से राहत देने और सार्वजनिक सेवाओं को बेहतर ढंग से सुरक्षित रखने की मांग की। छात्रों ने शिक्षा से जुड़ी मांगों के साथ प्रदर्शन में हिस्सा लिया। CGT ने न्यूनतम वेतन में तुरंत 10% बढ़ोतरी की मांग भी की।
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इस हड़ताल ने छात्र आंदोलन से शुरू हुई लामबंदी को श्रमिकों की वेतन और कामकाजी परिस्थितियों से जुड़ी चिंताओं के साथ जोड़ा। प्रदर्शनकारियों की मांगों में महंगाई और आमदनी के साथ-साथ स्कूलों और अन्य सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति भी शामिल थी।
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ज्यादातर मार्च शांतिपूर्ण, कुछ शहरों में झड़पें
रॉयटर्स के अनुसार, देशभर के प्रदर्शन कुल मिलाकर काफी हद तक शांतिपूर्ण रहे, हालांकि पेरिस और ल्यों में पुलिस के साथ झड़पें हुईं।
32 CNN ने बताया कि पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया और 448 लोगों को हिरासत में लिया गया। AFP के मुताबिक शाम 6 बजे तक 448 गिरफ्तारियां हुई थीं और झड़पों में 53 पुलिसकर्मी घायल हुए थे।
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साफ तस्वीर क्या है?
गृह मंत्रालय का शुरुआती आंकड़ा, उसका बाद का संशोधित अनुमान और CGT का दावा अलग-अलग समय पर सामने आए और अलग-अलग संस्थाओं ने जारी किए। मंत्रालय ने अपना अनुमान 6 लाख से घटाकर 5.75 लाख किया, जबकि यूनियन का आंकड़ा इससे काफी अधिक रहा। इसलिए प्रदर्शन के पैमाने का वर्णन करते समय यह देखना जरूरी है कि किसका अनुमान उद्धृत किया जा रहा है।
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इतना स्पष्ट है कि 5 नवंबर को फ्रांस में वेतन, जीवन-यापन लागत और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर बड़े पैमाने पर मजदूर-छात्र लामबंदी हुई। देशभर में प्रदर्शन अधिकतर शांतिपूर्ण रहे, हालांकि कुछ जगहों पर झड़पें हुईं; कुल भीड़ की संख्या पर मतभेद कायम है।
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