लेकिन इन घोषणाओं में से अधिकांश के लिए न तो तुरंत अनुबंध हुए और न ही कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौते सामने आए। इसलिए इन्हें अधिकतर संभावित कदम या बातचीत का प्रारंभिक ढाँचा माना गया।
चीनी अधिकारियों और विश्लेषकों ने समिट के आर्थिक नतीजों को प्रारंभिक (preliminary) बताया क्योंकि कई विवरण अभी स्पष्ट नहीं थे।
उदाहरण के लिए, अमेरिकी अधिकारियों ने जिन बड़े कृषि या विमान खरीद सौदों का उल्लेख किया, उन्हें बीजिंग ने तुरंत औपचारिक रूप से पुष्टि नहीं की। इसके अलावा मौजूदा टैरिफ विराम (tariff truce) का भविष्य और संभावित टैरिफ कटौती का दायरा भी अस्पष्ट रहा।
कूटनीति में आम तौर पर तब तक किसी घोषणा को अंतिम समझौता नहीं माना जाता जब तक अनुबंध पर हस्ताक्षर, मात्रा तय और नीतिगत बदलाव आधिकारिक रूप से लागू न हों। इसी वजह से चीन ने इन नतीजों को अभी शुरुआती चरण का बताया।
हालाँकि एजेंडा में व्यापार प्रमुख था, लेकिन समिट के बाद ताइवान से जुड़ा मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में आ गया।
शी जिनपिंग से बातचीत के बाद ट्रंप ने कहा कि उन्होंने अभी तय नहीं किया है कि लगभग 14 अरब डॉलर के अमेरिकी हथियार पैकेज को ताइवान को दिया जाए या नहीं—जबकि इस पैकेज को अमेरिकी कांग्रेस पहले ही मंजूरी दे चुकी थी।
ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि यह हथियार सौदा चीन के साथ बातचीत में दबाव बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और इसे एक “नेगोशिएटिंग चिप” बताया।
इस टिप्पणी ने ताइवान में तुरंत चिंता पैदा कर दी। ताइवान अपनी सुरक्षा के लिए काफी हद तक अमेरिकी हथियारों पर निर्भर है, जबकि चीन इस द्वीप को अपना हिस्सा मानता है और अमेरिका द्वारा हथियार बेचने का कड़ा विरोध करता है।
जब हथियार बिक्री को बातचीत का साधन बताया गया, तो ताइवान और कुछ अमेरिकी विश्लेषकों को डर हुआ कि कहीं द्वीप की सुरक्षा बड़े अमेरिका–चीन समझौते में सौदेबाज़ी का हिस्सा न बन जाए।
लंबे समय से अमेरिकी नीति यह रही है कि औपचारिक कूटनीतिक संबंध न होने के बावजूद अमेरिका ताइवान को अपनी रक्षा करने की क्षमता बनाए रखने में मदद करेगा। इसलिए इस मुद्दे पर किसी भी अस्पष्ट संकेत से ताइपे और क्षेत्रीय सहयोगियों में चिंता पैदा हो सकती है।
बीजिंग में ट्रंप–शी शिखर वार्ता ने रिश्तों को स्थिर करने का संदेश जरूर दिया, लेकिन ठोस परिणाम सीमित रहे। व्यापार से जुड़े अधिकतर कदम अभी संभावित या प्रारंभिक स्तर पर हैं, इसी कारण चीन ने उन्हें “प्रारंभिक” बताया।
दूसरी ओर, ताइवान हथियार सौदे को लेकर ट्रंप की टिप्पणी ने आर्थिक घोषणाओं से भी अधिक राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया और यह सवाल उठाया कि अमेरिका भविष्य में चीन के साथ बातचीत और ताइवान की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाएगा।
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