बैठक में ईरान ने BRICS से कड़ा रुख अपनाने की अपील की। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरगची ने सदस्य देशों से आग्रह किया कि वे अमेरिका और इज़रायल द्वारा किए गए कथित अंतरराष्ट्रीय कानून उल्लंघनों की “स्पष्ट और बिना शर्त निंदा” करें।
तेहरान के लिए यह सिर्फ कूटनीतिक बयान का सवाल नहीं था। इसके पीछे कई रणनीतिक कारण थे:
ईरान ने यह भी कहा कि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम होरमुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) व्यावसायिक जहाजों के लिए खुला है, बशर्ते वे ईरानी नौसेना के साथ समन्वय करें। इससे साफ है कि यह संघर्ष सीधे वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है।
बैठक की मेज़बानी कर रहे भारत के लिए स्थिति बेहद संवेदनशील थी। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने शुरुआती वक्तव्य में अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों—खासतौर पर होरमुज़ जलडमरूमध्य और लाल सागर—में “सुरक्षित और निर्बाध समुद्री यातायात” की आवश्यकता पर जोर दिया।
इसका संदेश साफ था: भारत की प्राथमिकता वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा है, न कि किसी पक्ष के खिलाफ तीखा राजनीतिक बयान।
भारत की यह सावधानी कई रणनीतिक संबंधों से जुड़ी है:
ऐसे में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करना नई दिल्ली के लिए कूटनीतिक जोखिम बन सकता था।
बैठक में सामने आए मतभेद BRICS के भीतर मौजूद व्यापक भू‑राजनीतिक अंतर को भी दर्शाते हैं।
चीन और रूस अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अमेरिकी नीतियों की आलोचना करने के लिए अपेक्षाकृत अधिक तैयार रहते हैं। वॉशिंगटन के साथ उनकी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा उन्हें पश्चिमी हस्तक्षेप के खिलाफ कड़े शब्दों का समर्थन करने की ओर झुका सकती है।
भारत अक्सर "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति अपनाता है। यानी ऐसे विवादों में कठोर पक्ष लेने से बचता है जहां उसके दोनों पक्षों से महत्वपूर्ण संबंध हों।
संयुक्त अरब अमीरात, जो अब BRICS का सदस्य है, ईरान के भौगोलिक पड़ोस में है और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर उसकी अपनी चिंताएँ हैं। ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिया कि BRICS का एक पड़ोसी सदस्य संयुक्त बयान में तेहरान की आलोचना शामिल करने पर जोर दे रहा था, जिससे समूह के भीतर तनाव झलकता है।
सऊदी अरब की भूमिका भी कुछ रिपोर्टों में अनिश्चित बताई गई है। अमेरिका के साथ उसके घनिष्ठ सुरक्षा और आर्थिक संबंधों के कारण वह भी ऐसे किसी बयान से सावधान रह सकता है जो खुलकर ईरान के पक्ष में दिखे।
ईरान संघर्ष सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है।
इन अलग‑अलग आर्थिक हितों के कारण एक साझा नीति बनाना और कठिन हो जाता है।
नई दिल्ली बैठक ने BRICS के विस्तार की एक वास्तविकता उजागर की। नए सदस्य जुड़ने से समूह का वैश्विक प्रभाव बढ़ा है और यह दुनिया की बड़ी आबादी व अर्थव्यवस्थाओं का प्रतिनिधित्व करता है। लेकिन साथ ही इसके भीतर रणनीतिक मतभेद भी बढ़ गए हैं।
यानी समूह जितना व्यापक होता जा रहा है, उतना ही उसके लिए किसी सक्रिय सैन्य संघर्ष जैसे मुद्दों पर एक साझा आवाज़ निकालना कठिन हो रहा है।
इन मतभेदों को देखते हुए सबसे संभावित नतीजा एक सावधानी से तैयार किया गया बयान हो सकता है—जिसमें तनाव कम करने, अंतरराष्ट्रीय कानून के सम्मान, समुद्री सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर जोर दिया जाए, लेकिन सीधे किसी पक्ष को कठोर शब्दों में दोषी न ठहराया जाए।
नई दिल्ली की बैठक ने इसलिए BRICS की दोहरी वास्तविकता दिखा दी: उभरती शक्तियों का बड़ा मंच, लेकिन अभी भी ऐसी साझा कूटनीतिक आवाज़ की तलाश में जो बड़े वैश्विक संकटों में सभी सदस्यों को साथ रख सके।
Comments
0 comments