एक और महत्वपूर्ण घटना तब हुई जब अमेरिका ने ईरान पर प्रस्तावित सैन्य हमले को टाल दिया ताकि वार्ता जारी रह सके। यह संकेत था कि तत्काल सैन्य टकराव की संभावना कम हो गई है।
घोषणा के बाद तेल की कीमतों में गिरावट आई क्योंकि निवेशकों ने क्षेत्र में बड़े युद्ध के जोखिम को कम आंका।
तेल बाजार अक्सर संभावित व्यवधानों को पहले ही कीमतों में शामिल कर लेते हैं। इसलिए जैसे ही सैन्य कार्रवाई का खतरा कम होता है, कीमतें तेजी से नीचे आ सकती हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक पेट्रोलियम आपूर्ति का लगभग पाँचवां हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
यदि इस रास्ते में व्यवधान का खतरा हो तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। लेकिन जब कूटनीतिक प्रगति से यह संभावना कम दिखने लगती है कि शिपिंग बाधित होगी, तो बाजार उस जोखिम प्रीमियम को हटाने लगता है जो पहले कीमतों में शामिल था।
इन सभी घटनाओं—कूटनीतिक प्रगति, सैन्य तनाव में कमी और सप्लाई जोखिम घटने—का संयुक्त असर तेल बाजार पर पड़ा।
20 मई को Brent क्रूड लगभग 6.4% गिरकर करीब $100.32 प्रति बैरल पर आ गया, जबकि WTI लगभग 6.5% गिरकर $97.25 पर पहुंच गया। यह फरवरी के अंत में संघर्ष शुरू होने के बाद की सबसे बड़ी एक‑दिवसीय गिरावटों में से एक थी।
भले ही अमेरिकी इन्वेंट्री घट रही थी, लेकिन बाजार ने यह मान लिया कि यदि तनाव कम होता है तो वैश्विक सप्लाई बेहतर हो सकती है—और यही कारक ज्यादा प्रभावी साबित हुआ।
फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद से तेल की कीमतें लगातार भू‑राजनीतिक खबरों के अनुसार झूलती रही हैं। कीमतें खास तौर पर इन घटनाओं पर तेज प्रतिक्रिया देती रही हैं:
हर नई खबर बाजार की उस संभावना को बदल देती है कि कहीं बड़े पैमाने पर सप्लाई बाधित तो नहीं होगी।
इस पूरे घटनाक्रम से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है: कमोडिटी बाजारों में अक्सर उम्मीदें (expectations) वास्तविक मौजूदा डेटा से ज्यादा असर डालती हैं।
अमेरिकी इन्वेंट्री में गिरावट जैसे आंकड़े आम तौर पर कीमतों को ऊपर ले जाते हैं। लेकिन जब भू‑राजनीतिक जोखिम तेजी से कम होता दिखे—और अतिरिक्त सप्लाई की संभावना बढ़े—तो वही बाजार कीमतों को नीचे धकेल सकता है।
जब तक मध्य‑पूर्व में वार्ता और तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हो जाते, Brent और WTI दोनों में अस्थिरता जारी रहने की संभावना बनी रहेगी।
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