जब वास्तविक यील्ड (real yields) बढ़ती हैं और डॉलर मजबूत होता है, तो अक्सर सोने की कीमतों में अल्पकालिक गिरावट देखी जाती है।
सोने के वैश्विक बाजार पर भारत की नीतियों का भी बड़ा असर होता है क्योंकि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में से एक है।
हाल ही में भारत ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाया है। इससे देश के भीतर सोने की कीमतें बढ़ सकती हैं क्योंकि अधिकांश सोना आयात किया जाता है।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है—जब कीमतें ज्यादा बढ़ती हैं तो उपभोक्ता, खासकर आभूषण खरीदने वाले, खर्च कम कर सकते हैं। इस तरह घरेलू कीमतें बढ़ने के बावजूद वास्तविक भौतिक मांग कुछ कम हो सकती है।
बाजार की नजर संभावित डोनाल्ड ट्रंप और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच होने वाली वार्ताओं पर भी है। व्यापार संबंधों में बदलाव निवेशकों की जोखिम भावना (risk sentiment) को प्रभावित कर सकता है।
अभी निवेशक इन घटनाओं पर नजर रखे हुए हैं, लेकिन फिलहाल यह कारक सोने की मौजूदा कमजोरी को पलटने के लिए पर्याप्त नहीं दिख रहा है।
इतिहास में जब भी वैश्विक तनाव बढ़ता है, सोना अक्सर सुरक्षित निवेश के रूप में मजबूत होता है। लेकिन हालिया बाजार व्यवहार अलग कहानी दिखा रहा है।
वर्तमान में निवेशकों का ध्यान ज्यादा मौद्रिक नीति, महंगाई और तरलता (liquidity) जैसे मैक्रो कारकों पर है, इसलिए भू‑राजनीतिक जोखिमों का असर अपेक्षाकृत कम दिख रहा है।
निकट अवधि में सोने की कीमतें मुख्यतः आर्थिक आंकड़ों और केंद्रीय बैंक की नीति पर निर्भर रहेंगी। खास तौर पर ये कारक महत्वपूर्ण रहेंगे:
फिलहाल संतुलन सोने के खिलाफ दिख रहा है—मजबूत महंगाई, ऊंची यील्ड और मजबूत डॉलर के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है, भले ही दुनिया में भू‑राजनीतिक अनिश्चितता जारी हो।
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