इस रैली की शुरुआत 2025 की शरद ऋतु से मानी जा सकती है, जब इंडोनेशिया में फ्रीपोर्ट-मैकमोरन (Freeport-McMoRan) की ग्रासबर्ग (Grasberg) खदान—जो दुनिया की सबसे बड़ी तांबा उत्पादकों में से एक है—में भयंकर कीचड़ बहाव आया और उसे फोर्स मेजर (बलपूर्वक कारण) घोषित करना पड़ा । इसके कुछ ही समय पहले, मई 2025 में, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) में इवानहो माइन्स (Ivanhoe Mines) की कामोआ-काकुला (Kamoa-Kakula) खदान में बाढ़ और आग लग गई थी । इन और अन्य दुर्घटनाओं के कारण 2025 में वैश्विक आपूर्ति से अनुमानित 1.5 मिलियन टन तांबे का उत्पादन चला गया । यह सिलसिला 2026 में भी जारी है। दुनिया की 17 सबसे बड़ी खदानों के उत्पादन अनुमान 199,000 टन घटाकर 13.8 मिलियन टन कर दिए गए हैं, और फर्स्ट क्वांटम (First Quantum) और रियो टिंटो (Rio Tinto) जैसी कंपनियों ने भी अपने अनुमानों में कटौती की है । इंटरनेशनल कॉपर स्टडी ग्रुप (International Copper Study Group) को उम्मीद है कि 2026 में रिफाइंड कॉपर उत्पादन में सिर्फ 0.9% की बढ़ोतरी होगी, जबकि बाजार पहले से ही लगभग 150,000 टन की कमी से जूझ रहा है । ट्रीटमेंट और रिफाइनिंग चार्जेज (Treatment and Refining Charges - एक अहम सूचक जो बताता है कि कितना कच्चा माल उपलब्ध है) लगभग शून्य पर आ गए हैं, जो सप्लाई में भयंकर तनाव को दर्शाता है ।
इस रैली में सबसे ज़्यादा फायदा तांबा खनन (कॉपर माइनिंग) करने वाली कंपनियों को हुआ। 2025 में तांबे की कीमत में 43.93% की बढ़त हुई, जबकि Nasdaq Sprott Copper Miners Index के अनुसार, तांबा खनन शेयरों में 74.59% का उछाल आया । ऊँची कीमतों का सीधा असर कंपनियों के मुनाफे पर पड़ता है और कई माइनिंग कंपनियों के शेयर अपने सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गए । BHP (दुनिया की सबसे बड़ी माइनिंग कंपनियों में से एक) के CEO ने चेतावनी दी है कि तांबे की ऊँची कीमतों में जल्द कमी आने की उम्मीद नहीं है और निवेश बैंकों का मानना है कि यह तेजी 2026 तक जारी रहेगी ।
अमेरिकी फेडरल रिज़र्व (Fed) ने 2025 में ब्याज दरों में कटौती का जो सिलसिला शुरू किया—सितंबर, अक्टूबर और दिसंबर में तीन बार 0.25% (25 बेसिस पॉइंट) की कटौती—उसने अमेरिकी डॉलर को कमज़ोर कर दिया । चूँकि तांबे का कारोबार डॉलर में होता है, इसलिए कमज़ोर डॉलर ने तांबे को दुनिया के दूसरे देशों के लिए सस्ता बना दिया, जिससे मांग बढ़ी । फेड ने संकेत दिया है कि 2026 की पहली तिमाही में भी यह कटौती का दौर जारी रह सकता है । ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के अनुसार, ऐतिहासिक रूप से जब भी मॉनेटरी इज़िंग (ब्याज दरों में ढील) का दौर आया है, धातुओं की कीमतों में बढ़त देखी गई है ।
अमेरिका में रिफाइंड कॉपर पर 15% से 25% टैरिफ (आयात शुल्क) लगने की आशंका ने अमेरिकी कंपनियों को पहले से ही भारी मात्रा में तांबा आयात करने के लिए मजबूर कर दिया । इसने अमेरिका के बाहर तांबे की कृत्रिम कमी पैदा कर दी, जिससे LME की कीमतें ऊपर चली गईं । गोल्डमैन सैक्स रिसर्च का कहना है कि यह 'टैरिफ रूलेट' की स्थिति है और इसने तांबे की कीमतों को नई ऊँचाई पर पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई है । इस नीति ने क्षेत्रीय कीमतों को भी अलग-अलग कर दिया है: जहाँ LME के गोदामों में तांबे के स्टॉक गिर गए हैं, वहीं अमेरिका में भंडार बढ़ गया है ।
तीन मुख्य कारण हैं जो तांबे की मांग को लगातार बढ़ा रहे हैं:
हालाँकि, सभी विश्लेषक इस रैली को टिकाऊ नहीं मानते। गोल्डमैन सैक्स ने जनवरी 2026 में चेतावनी दी थी कि इस बढ़त का ज़्यादातर हिस्सा सट्टेबाजों (स्पेकुलेटर्स) के पैसे से आया है। 2025 में बेस मेटल मार्केट में $30 बिलियन से अधिक का रिकॉर्ड निवेश आया, जिसमें से आधा से अधिक सिर्फ तांबे में लगा । मैक्वेरी बैंक के अनुसार, 2025 की शुरुआत से दिखने वाले स्टॉक (विज़िबल स्टॉक्स) में 870,000 टन से अधिक की बढ़ोतरी हुई है । गोल्डमैन सैक्स और मैक्वेरी दोनों का कहना है कि अगर टैरिफ की अनिश्चितता दूर होती है या बुनियादी कारक कमज़ोर पड़ते हैं, तो कीमतों में गिरावट (करेक्शन) आ सकती है । लेकिन ग्लोबल माइनिंग रिव्यू (Global Mining Review) का तर्क है कि इस रैली को सिर्फ सट्टेबाजी कहना सही नहीं होगा, क्योंकि बाजार रिकॉर्ड कीमतों पर भी पर्याप्त आपूर्ति जुटाने के लिए संघर्ष कर रहा है ।