मंत्री के अनुसार, समय भी सोच‑समझकर चुना गया ताकि वैश्विक तेल कीमतों या अन्य उत्पादक देशों पर इसका बड़ा असर न पड़े। उनका कहना था कि इस समय कदम उठाने से बाज़ार में अस्थिरता पैदा होने की संभावना कम है।
OPEC का मुख्य काम सदस्य देशों के बीच तेल उत्पादन को समन्वित करना है। इसके लिए संगठन अक्सर उत्पादन कोटा तय करता है ताकि आपूर्ति नियंत्रित रहे और कीमतें स्थिर रहें।
लेकिन OPEC छोड़ने के बाद यूएई अब इन कोटा नियमों से बंधा नहीं रहेगा। इसका मतलब है कि देश अपने तेल उत्पादन का स्तर खुद तय कर सकेगा।
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक इससे तेल उत्पादन को घरेलू औद्योगिक विकास, विनिर्माण जरूरतों और वैश्विक मांग के साथ अधिक सीधे तरीके से जोड़ा जा सकेगा।
अल मज़रूई का कहना है कि यूएई की अर्थव्यवस्था अब सिर्फ कच्चे तेल के निर्यात तक सीमित नहीं है। देश रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल्स और ऊर्जा‑गहन उद्योगों में भी तेजी से निवेश कर रहा है। ऐसे में उत्पादन नीति को अधिक लचीला बनाना जरूरी माना जा रहा है।
हालांकि यूएई आधिकारिक तौर पर इस फैसले को गैर‑राजनीतिक बता रहा है, लेकिन कई विश्लेषकों का कहना है कि OPEC के भीतर लंबे समय से उत्पादन लक्ष्य और रणनीति को लेकर मतभेद मौजूद रहे हैं।
यूएई पहले भी यह तर्क देता रहा है कि उसकी उत्पादन क्षमता बढ़ी है, इसलिए उसे अधिक उत्पादन सीमा मिलनी चाहिए। इसी तरह के कोटा विवादों को कुछ विशेषज्ञ इस फैसले की पृष्ठभूमि मानते हैं।
यदि समूह के बड़े उत्पादक सदस्य बाहर निकलते हैं, तो OPEC के लिए वैश्विक तेल नीति पर एकजुट रुख बनाए रखना कठिन हो सकता है।
यूएई खाड़ी क्षेत्र के सबसे आधुनिक और तेजी से विस्तार करने वाले तेल उत्पादकों में से एक है। ऐसे में उसका OPEC से बाहर होना वैश्विक आपूर्ति समन्वय को थोड़ा अधिक जटिल बना सकता है।
फिर भी यूएई अधिकारियों ने संकेत दिया है कि देश अन्य उत्पादक देशों के साथ सहयोग जारी रखेगा और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में स्थिर आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश करेगा। फर्क सिर्फ इतना होगा कि अब उत्पादन संबंधी फैसले स्वतंत्र रूप से लिए जाएंगे, न कि OPEC के सामूहिक कोटा ढांचे के तहत।
कुल मिलाकर, यूएई का यह कदम वैश्विक ऊर्जा नीति में एक बड़े रुझान को दिखाता है—जहाँ बड़े उत्पादक देश बदलती मांग, औद्योगिक रणनीतियों और भू‑राजनीतिक जोखिमों के बीच अपने ऊर्जा संसाधनों पर अधिक स्वायत्त नियंत्रण चाहते हैं।