साल की शुरुआत में जो ऊँचाई सोने ने छुई थी, उसके बाद कीमतों में आई कमजोरी कई बड़े आर्थिक कारकों से जुड़ी हुई है।
1. बढ़ती बॉन्ड यील्ड और वास्तविक ब्याज दरें
जब वास्तविक ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो सोना रखने की आकर्षण कम हो जाती है क्योंकि यह कोई ब्याज या आय नहीं देता। इससे निवेशक अक्सर बॉन्ड जैसे आय देने वाले साधनों की ओर झुक जाते हैं।
2. मजबूत अमेरिकी डॉलर
सोना आम तौर पर डॉलर में कीमत तय होता है। जब डॉलर मजबूत होता है, तो अन्य देशों के खरीदारों के लिए सोना महँगा हो जाता है, जिससे वैश्विक मांग पर असर पड़ सकता है।
3. लंबे समय तक ऊँची रहने वाली फेडरल रिज़र्व की दरों की उम्मीद
अगर बाज़ार को लगता है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक लंबे समय तक ब्याज दरें ऊँची रखेगा, तो यह डॉलर और बॉन्ड यील्ड दोनों को समर्थन देता है—और यही चीज़ अक्सर सोने की कीमतों पर दबाव डालती है।
इन कारकों ने मिलकर सोने को उसके शुरुआती साल के उच्च स्तर से नीचे खींचने में भूमिका निभाई।
अनुमान घटाने के बावजूद बैंक का मानना है कि सोने के दीर्घकालिक बुल मार्केट के मूल कारण अभी भी बरकरार हैं।
सबसे महत्वपूर्ण कारकों में से एक है केंद्रीय बैंकों की मजबूत खरीद। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार को विविध बनाने के लिए सोना जोड़ रहे हैं, और यह रुझान आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।
JPMorgan का यह भी मानना है कि वैश्विक स्तर पर डॉलर से दूर रिज़र्व विविधीकरण की प्रवृत्ति अभी खत्म नहीं हुई है। ऐसे में सोना एक रणनीतिक रिज़र्व एसेट के रूप में महत्वपूर्ण बना रह सकता है।
इस दृष्टिकोण से देखा जाए तो हाल की कमजोरी को कई विश्लेषक एक अस्थायी समायोजन या कंसोलिडेशन मानते हैं, न कि लंबे चक्र के अंत के रूप में।
हालाँकि निकट अवधि के अनुमान कम किए गए हैं, लेकिन कई विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के दौरान सोना फिर से मजबूती पकड़ सकता है।
संभावित कारणों में शामिल हैं:
यदि ये निवेश प्रवाह लौटते हैं और आर्थिक दबाव कुछ कम होते हैं, तो सोना फिर से ऊपर की दिशा पकड़ सकता है।
JPMorgan का कमोडिटी आउटलुक सिर्फ सोने तक सीमित नहीं है। बैंक चांदी (सिल्वर) को लेकर भी सकारात्मक है।
विश्लेषकों के अनुसार सिल्वर बाज़ार में आपूर्ति सीमित है और मांग मजबूत बनी हुई है। इस वजह से कीमतें केवल सट्टेबाज़ी की वजह से नहीं बल्कि एक संरचनात्मक रूप से मजबूत बाज़ार आधार के कारण बढ़ सकती हैं।
JPMorgan द्वारा 2026 के लिए गोल्ड प्राइस अनुमान में कटौती मुख्यतः अल्पकालिक बाजार परिस्थितियों को दर्शाती है—जैसे कमजोर निवेशक भागीदारी, ऊँची वास्तविक ब्याज दरें और मजबूत डॉलर।
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