यूरोपीय संसद की एक मसौदा रिपोर्ट इंडस्ट्रियल एक्सेलेरेटर एक्ट को अधिक मजबूत औद्योगिक-वरीयता और आर्थिक-सुरक्षा नीति के रूप में ढालना चाहती है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक खरीद और सरकारी सहायता को यूरोप में बने कम-कार्बन उत्पादों की ओर मोड़ना है, साथ ही संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में बड़े विदेशी निवेशों के लिए कड़ी शर्तें लगाना है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह अभी मसौदा है, लागू नियम नहीं। यूरोपीय आयोग ने मूल विनियमन 4 मार्च 2026 को पेश किया था; अब संसद को अपनी स्थिति अपनानी होगी, जिसके बाद EU सदस्य देशों के साथ अंतिम वार्ता होगी।
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2036 तक 50% ‘मेड इन यूरोप’ का प्रस्ताव
रिपोर्ट रणनीतिक क्षेत्रों के ‘मेड इन यूरोप’ और कम-कार्बन उत्पादों के लिए 2036 तक 50% की सीमा तय करने की मांग करती है। इसका व्यावहारिक अर्थ यह होगा कि सार्वजनिक धन और सरकारी खरीद का बड़ा हिस्सा यूरोप में स्थित उत्पादन तथा आपूर्ति शृंखलाओं को समर्थन दे।
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आयोग के मूल इंडस्ट्रियल एक्सेलेरेटर एक्ट में भी सार्वजनिक खरीद और सार्वजनिक सहायता योजनाओं के लिए ‘मेड इन EU’ तथा कम-कार्बन मानदंड प्रस्तावित हैं। संसद की रिपोर्ट इन प्राथमिकताओं को अधिक महत्वाकांक्षी बनाती है और यूरोपीय सामग्री पर ज्यादा जोर देती है।
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सोलर से हीट पंप तक: नेट-ज़ीरो तकनीक पर भी जोर
मसौदा रिपोर्ट में नेट-ज़ीरो तकनीकों में EU सामग्री बढ़ाने की बात है। इनमें सोलर पैनल, पवन टर्बाइन, हीट पंप और परमाणु बिजली संयंत्र शामिल हैं।
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यह इसलिए अहम है क्योंकि अधिनियम का दायरा जलवायु-लक्ष्यों और औद्योगिक क्षमता, दोनों से जुड़े क्षेत्रों तक फैला है। आयोग ने ऊर्जा-गहन उद्योगों, नेट-ज़ीरो तकनीकों और ऑटोमोबाइल निर्माण को इसके प्रमुख क्षेत्रों में रखा है।
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विदेशी निवेश की जांच-सीमा €50 मिलियन तक घट सकती है
आयोग के मूल प्रस्ताव के तहत, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, सोलर और महत्वपूर्ण कच्चे माल जैसे निर्दिष्ट रणनीतिक क्षेत्रों में ऐसे विदेशी निवेश पर शर्तें लग सकती हैं जिनका मूल्य कम से कम €100 मिलियन हो। यह प्रावधान उन गैर-EU निवेशकों के लिए है जिनका देश संबंधित क्षेत्र की वैश्विक विनिर्माण क्षमता के 40% से अधिक पर नियंत्रण रखता हो।
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रिपोर्टिंग के अनुसार, संसद के रैपोर्टेयरों की मसौदा रिपोर्ट इस जांच-सीमा को घटाकर €50 मिलियन करना चाहती है। नियम में किसी देश का नाम सीधे नहीं लिया गया है; कसौटी विनिर्माण क्षमता के संकेंद्रण पर आधारित है। फिर भी, कई अहम आपूर्ति शृंखलाओं में चीन की मजबूत स्थिति के कारण यह प्रस्ताव व्यापक रूप से EU की चीन-संबंधी चिंताओं के संदर्भ में देखा जा रहा है।
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निवेशकों पर किन शर्तों का बोझ पड़ सकता है?
आयोग के मूल ढांचे में भी ऐसे विदेशी निवेशों से औद्योगिक मूल्य पैदा करने वाली शर्तें पूरी कराने का विचार है। इनमें ये बातें शामिल हो सकती हैं:
- विदेशी स्वामित्व अधिकतम 49% हो;
- EU भागीदार के साथ संयुक्त उद्यम बनाया जाए;
- बौद्धिक संपदा या प्रौद्योगिकी साझा करने की प्रतिबद्धता हो;
- EU-आधारित अनुसंधान एवं विकास पर वार्षिक राजस्व का 1% खर्च किया जाए;
- कम से कम 30% इनपुट EU से लिए जाएं;
- और EU के कर्मचारियों का एक निश्चित अनुपात रखा जाए।
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मसौदा रिपोर्ट पर हुई रिपोर्टिंग बताती है कि रैपोर्टेयर और सख्त शर्तें चाहते हैं, जिनमें कम से कम 60% EU-आधारित कर्मचारियों की संभावित जरूरत भी शामिल है। कौन-सी शर्तें अंतिम पाठ में होंगी और वे एक साथ कैसे लागू होंगी, यह संसद की मंजूरी और सदस्य देशों के साथ होने वाली बातचीत पर निर्भर करेगा।
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नीति का मूल तर्क यह है कि निवेश केवल यूरोप में आयातित पुर्जों की असेंबली तक सीमित न रहे। उससे स्थानीय रोजगार, अनुसंधान, स्थानीय खरीद, तकनीकी क्षमता और लंबे समय तक टिकने वाला यूरोपीय औद्योगिक आधार बनना चाहिए।
चीन का संदर्भ क्यों अहम है?
यह मसौदा EU और चीन के बीच बढ़ते व्यापार तनाव के दौर में आया है। EU के व्यापार आयुक्त मारोश शेफचोविच ने कहा है कि व्यापार संबंधों को अधिक संतुलित बनाने के प्रयासों में बीजिंग को अक्टूबर तक “ठोस नतीजे” देने होंगे; ऐसा न होने पर EU अधिक कठोर कदम उठा सकता है।
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फिर भी, इंडस्ट्रियल एक्सेलेरेटर एक्ट केवल चीन-केंद्रित उपाय नहीं है। इसका घोषित उद्देश्य कम-कार्बन, यूरोप में निर्मित उत्पादों और तकनीकों की मांग बढ़ाना तथा EU की विनिर्माण क्षमता को मजबूत करना है।
17 लेकिन रणनीतिक आपूर्ति शृंखलाओं पर प्रभुत्व वाले देशों से आने वाले निवेश पर इसका फोकस इसे आर्थिक-सुरक्षा का स्पष्ट आयाम देता है।
आगे क्या होगा?
50% EU-सामग्री लक्ष्य, €50 मिलियन निवेश-सीमा और सख्त निवेश शर्तें—ये सभी अभी बातचीत के प्रस्ताव हैं, अंतिम नियम नहीं। पहले यूरोपीय संसद को अपना रुख मंजूर करना होगा। उसके बाद सदस्य देशों के साथ वार्ता में अंतिम विनियमन तय होगा।
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निर्माताओं, क्लीन-टेक आपूर्तिकर्ताओं और विदेशी निवेशकों के लिए संकेत साफ है: यूरोप के सार्वजनिक समर्थन और रणनीतिक बाजारों तक पहुंच में अब केवल कीमत और उत्सर्जन ही नहीं, बल्कि उत्पादन, कर्मचारियों, शोध और आपूर्ति शृंखला का स्थान भी पहले से अधिक निर्णायक हो सकता है।